भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 927

दूसरा अध्याय 2/79-83 ]


'बिल्वमङ्गल गोस्वामी' हुआ और इन्होंने 'श्रीकृष्णकर्णामृत' ग्रन्थकी रचना की। उनके प्रेमसे उन्मत्त भावोंको देखकर लोग उन्हें 'लीलाशुक' कहते थे॥ 79 ॥ अनुभाष्य- 'लीलाशुक'—इनके अन्य नाम 'लीलासुख', 'चित्सुखाचार्य' और 'बिल्वमङ्गल' थे। ये विष्णुस्वामी सम्प्रदायके त्रिदण्डिस्वामी थे। आदिलीला 1/57 का अनुभाष्य देखें॥ 79 ॥

आश्रयके प्रणयभावमय विषयविग्रह श्रीगौरसुन्दर :— पूर्व व्रजविलासे, येइ तिन अभिलाषे, सेइ यत्ने आस्वादन नहिल। श्रीराधार भावसार, आपने करि' अङ्गीकार, सेइ तिनवस्तु आस्वादिल॥ 80 ॥

अनुवाद— श्रीकृष्णकी पहले व्रजलीलामें जिन तीन भावोंको आस्वादन करनेकी अभिलाषा थी, परन्तु सब प्रकारसे यत्न करनेपर भी वे उन्हें पूरा नहीं कर पाये, क्योंकि ये भाव श्रीमती राधिकाकी सम्पत्ति हैं। इसलिये श्रीकृष्णने राधाजीके इन भावोंको अङ्गीकार करके महाप्रभुके रूपमें अवतरित होकर उन तीन भावोंका आस्वादन किया॥ 80 ॥ अनुभाष्य— आदिलीला 4/230 संख्या देखें॥ 80 ॥

महावदान्य महाप्रभुके द्वारा उसी आश्रयका सेवा-भाव-वितरण :— आपने करि' आस्वादने, शिखाइल भक्तगणे, प्रेमचिन्तामणिर् प्रभु धनी। नाहि जाने स्थानास्थान, यारे तारे कैल दान, महाप्रभु—दाता-शिरोमणि॥ 81 ॥

अनुवाद— श्रीकृष्णप्रेमके भावोंका महाप्रभुने स्वयं तो आस्वादन किया ही और अपने भक्तोंको भी इसकी शिक्षा दी। वे कृष्णप्रेमरूपी चिन्तामणिके धनसे धनी हैं। उन्होंने इस धनका पात्र-अपात्रका विचार न करके सर्वत्र ही इसका दान किया, इसलिये वे दान करनेवालोंमें शिरोमणि हैं॥ 81 ॥


अमृतप्रवाह भाष्य— प्रभु श्रीचैतन्यदेवका प्रेम-चिन्तामणि ही धन है ओर वे उस धनसे धनी हैं। प्राकृत-चिन्तामणिके कार्यके समान प्रेम-चिन्तामणि भी अनेक-अनेक प्रेम-चिन्ताणियोंका उत्पादन करनेपर भी महाप्रभुके भण्डारमें वह पूर्णरूपसे विराजमान है। और भक्त महाप्रभुके द्वारा दी गयी प्रेम-चिन्तामणिसे अनन्त-कोटि चिन्तामणियाँ समस्त जगत्में विस्तार करते हैं॥ 81 ॥

परम दयाल अवतार :— एइ गुप्त भाव-सिन्धु, ब्रह्मा ना पाय एक बिन्दु, हेन धन बिलाइल संसारे। ऐछे दयालु अवतार, ऐछे दाता नाहि आर, गुण केह नारे वर्णिवारे॥ 82 ॥

अनुवाद— महाप्रभुके हृदयमें जिन गुप्त भावोंका सिन्धु है, उसकी एक बूँद भी ब्रह्माजी जैसे ऐश्वर्य-भावके भक्त नहीं पा सकते। परन्तु महाप्रभु ऐसे दयालु अवतार हैं, जिन्होंने अहैतुककृपावश इस धनका संसार भरमें दान किया है। उन जैसा महान् दाता जगत्में और कोई नहीं है, इसलिये उनके दिव्य-गुणोंका कौन वर्णन कर सकता है ? ॥ 82 ॥

श्रीचैतन्य-आनुगत्यके बिना कृष्णसेवा-प्राप्ति असम्भव :— कहिबार कथा नय, कहिले केह ना बुझय, ऐछे चित्र चैतन्येर रङ्ग। सेइ से बुझिते पारे, चैतन्येर कृपा याँरे, हय ताँर दासानुदास-सङ्ग॥ 83 ॥

अनुवाद— कृष्णप्रेमके जो भाव महाप्रभु दिखला रहे हैं, उनकी चर्चा साधारण लोगोंमें नहीं करनी चाहिये, क्योंकि वे उन्हें समझ नहीं सकते। महाप्रभुकी ऐसी अद्भुत लीलाएँ हैं। यदि कोई इसे समझ सकता है, तो यह निश्चय जानना चाहिये कि वह महाप्रभुका कृपापात्र है जिसे उन्होंने अपने दासके दासका सङ्ग दिया है॥ 83 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— इस राधानुगत भावतत्त्वमें


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