भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 928

[ 2/83-86 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला साधारण लोगोंका अधिकार नहीं है। अयोग्यपात्रसे ये भाव कहनेसे वे 'सहजिया', 'बाउल' आदि लोगोंके विकृत भावोंकी भाँति इनका रूपान्तर ग्रहण करेंगे। पाण्डित्यका अभिमान रखनेवाले व्यक्ति भी इस रसत्तत्त्वमें प्रवेश करने योग्य नहीं हैं॥83॥ श्रीदामोदर स्वरूप और श्रीरघुनाथसे भक्तोंके द्वारा महाप्रभुके भावोंका श्रवण :- चैतन्यलीला-रत्न-सार, स्वरूपेर भाण्डार, तेंहो थुइला रघुनाथेर कण्ठे। ताँहा किछु ये शुनिलुँ, ताँहा इँहा विस्तारिलुँ, भक्तगणे दिलुँ एइ भेटे ॥ 84 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी लीलाएँ समस्त रत्नोंकी शिरोमणि हैं जो श्रीस्वरूप दामोदरके भण्डारमें रखी हैं। श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीरघुनाथदास गोस्वामीको इन लीलाओंकी व्याख्या की थी। श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके द्वारा कण्ठस्थ उन लीलाओंमें जो कुछ मैंने (ग्रन्थकार) सुनी हैं, उन्हींका यहाँ विस्तारसे वर्णन किया है और यह भक्तोंके निमित्त भेंट है॥84॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुकी शेषलीलाको सूत्ररूपमें अपने कड़चामें लिखा था और उसे श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके कण्ठमें रखा था, अर्थात् उन्हें कण्ठस्थ करावकर श्रीकृष्णदास कविराजके द्वारा जगत्में इनका प्रचार करवाया। इसलिये श्रीस्वरूप दामोदरका कड़चा पृथक् पुस्तकके रूपमें नहीं लिखा गया है। यह श्रीचैतन्यचरितामृत ही श्रीस्वरूप दामोदरके कड़चाका निष्कर्ष है॥84॥ अनुभाष्य- 'भेटे'- उपहार ॥84॥ ग्रन्थकार की निरपेक्षता :- यदि केह हेन कय, ग्रन्थ कैल श्लोकमय, इतर-जने नारिबे बुझिते। प्रभुर येइ आचरण, सेइ करि वर्णन, सर्व-चित्त नारि आराधिते ॥ 85 ॥ अनुवाद-यदि कोई कहे कि इस ग्रन्थमें अनेक संस्कृतके श्लोक हैं जिन्हें साधारण लोग नहीं समझ सकते, तो मेरा यह कहना है कि महाप्रभुकी लीलाएँ जैसी हैं [और उन्होंने जिन श्लोकोंका पाठ किया है], मैंने उनका वैसा ही वर्णन किया है। मैं सभीके मनको प्रसन्न करनेके लिये महाप्रभुकी लीलाओंको तोड़-मरोड़कर नहीं लिख सकता॥85॥ अनुभाष्य-(श्रीकृष्णदास कविराजके भाव) श्रीगौरसुन्दरके चरित्रका यथायथ (अर्थात् जैसा है, वैसा) वर्णन करते हुए मैंने सभी मतवादियोंकी प्रशंसाका पात्र बननेकी इच्छा नहीं की है। वे लोग मेरी निन्दा करेंगे, यह विचार करके यहाँ महाप्रभुके चरित्रकी वास्तविक कथा न लिखकर कुछ अंशोंका वर्जन (त्याग) या वर्द्धन या आवरण (ढकना) या शोधन नहीं किया। इस ग्रन्थमें संस्कृत श्लोकोंको सम्मिलित करनेसे अनेक लोग तर्क कर सकते हैं कि संस्कृत न जाननेवाले लोग श्लोकोंके वास्तविक भावार्थको नहीं समझ सकेंगे ॥85॥ नाहि काँहा सविरोध, नाहि काँहा अनुरोध, सहज वस्तु करि विवरण। यदि हय राग Florist, ताँहा हये आवेश, सहज वस्तु ना याय लिखन ॥ 86 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्यचरितामृतमें कहीं भी किसी वस्तु अथवा व्यक्ति विशेषके विचारोंके न तो विरोध अथवा अनुरोधके प्रभावमें कुछ लिखा है। केवलमात्र महाप्रभुकी लीला और सिद्धान्तको सहज रूपसे जैसा मैंने श्रेष्ठ वैष्णवोंके मुखसे सुना है, वैसा ही लिखा है। यदि किसीसे मेरा रागका उद्देश्य होगा, तो मेरा उसमें आवेश होगा और मैं उन्नत भक्तोंके मुखसे श्रवण की गयी वाणीको यथायथ (जैसी है, वैसी) नहीं लिख पाऊँगा ॥86॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरे इस ग्रन्थमें कहीं भी किसीके भी सिद्धान्तका विरोध नहीं है, अथवा अन्य 76 ।