श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 929, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय 2/86-89 ] किसी व्यक्तिके मतके प्रति अनुरोध भी नहीं है। मैंने सहजतत्त्व विचार करके लिखा है। जीवके लिये रागतत्त्व ही सहज है, परन्तु विचारतत्त्व सहज नहीं है। रागतत्त्वसे जो उदित होता है, वही श्रीमहाप्रभुके द्वारा प्रदर्शित भजनतत्त्व है। यदि किसी अन्यके मतसे या अन्य प्रकार तर्कसिद्धान्तसे रागका उद्देश्य हो, तो उसमें आविष्ट होकर निरपेक्षता दूर हो जाती है; इसलिये जीवका स्वतःसिद्ध सहजत्व लिखा नहीं जाता है॥86॥ मध्यलीला दूसरे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य-इस ग्रन्थमें किसी वस्तुकी अपेक्षा करके मैंने किसीके साथ विरोध या किसीके साथ अनुरोधके वशीभूत होकर कुछ नहीं लिखा है; मैंने केवलमात्र सहज-वस्तुका विवरण लिखा है। जिसमें महाप्रभुके प्रति राग हो जाय और उसमें आविष्ट हो जाय, तो वह सभी लिखित वर्णनके अर्थोंको सहज ही समझ लेगा। सहज वस्तु रागानुगजनोंके द्वारा ही अनुभव करनेकी वस्तु है। इस प्रकार लिखी लेखनी रागमें आविष्ट व्यक्तिके हृदयमें स्फुरित होगी; रागहीन व्यक्ति उस लेखनीमें उस प्रकार प्रवेश नहीं कर पायेंगे। सहज वस्तु अनुभव करनेकी वस्तु है। पाठान्तरमें—'यदि हय राग-द्वेष', उसका अर्थ इस प्रकार है—'यदि कृष्णसेवाका परित्याग करके कृष्णसे इतर वस्तुमें अनुराग अर्थात् अभिनिवेश एवं द्वेष या विराग आकर किसीको आविष्ट करेगा, तो उसके द्वारा शुद्धात्माके सहज अप्राकृत कृष्णप्रेमके विषयमें कुछ भी वर्णन करना सम्भव नहीं होगा॥86॥ अनुवाद-महाप्रभुके चरितको यदि कोई प्रारम्भिक अवस्थामें नहीं समझ पाये, तो भी इसे बार-बार श्रवण करनेसे धीरे-धीरे समझमें आने लगेगा। महाप्रभुका अद्भुत चरित श्रवण करनेसे श्रोताके हृदयमें कृष्णप्रेम उदित होगा। तब वह श्रीराधा-कृष्णकी लीलाके मधुररसकी रीतिको समझ सकेगा। इसलिये इसको बार-बार श्रवण करो, इससे तुम्हारा परम कल्याण होगा॥87॥ संस्कृत भाषामें लिखित भागवतके साथ उपमा :- भागवत-श्लोकमय, टीका तार संस्कृत हय, तबु कैछे बुझे त्रिभुवन। इँहा श्लोक दुइ चारि, तार व्याख्या-भाषा करि, केने ना बुझिबे सर्वजन ॥ 88 ॥ अनुवाद-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवतम् संस्कृतके श्लोकोंके द्वारा रचित है और उसकी टीकाएँ भी संस्कृतमें हैं, तो जगत्के लोग उसे कैसे समझ लेते हैं? इस ग्रन्थमें मैंने कहीं-कहीं ही श्लोक लिखे हैं और उसकी व्याख्या भी सरल भाषामें दी है, तब सभी उसे क्यों नहीं समझ सकेंगे ? ॥ 88 ॥ अनुभाष्य-पयर संख्या 85में वादियोंके वादके सम्बन्धमें मेरा यह कहना है—'श्रीमद्भागवत-ग्रन्थमें सभी श्लोक संस्कृतमें हैं; उसकी सभी व्याख्याएँ भी संस्कृत भाषामें लिखी गयी हैं। यदि उसे त्रिभुवनके लोग समझकर कृष्णभक्ति लाभ करते हैं, तब इस चैतन्यचरितामृतमें मैंने जो दो-चार संस्कृतके श्लोक उद्धृत करके उनकी बङ्गला कवितामें व्याख्या भी की है, उसे सभी गौरभक्त क्यों नहीं समझ सकेंगे ? ॥ 88 ॥ श्रद्धापूर्वक चैतन्यलीला श्रवणके फलस्वरूप कृष्णप्रीतिका उदय :- येबा नाहि जाने केह, शुनिते शुनिते सेह, कि अद्भुत चैतन्यचरित। कृष्ण उपजिबे प्रीति, जानिबे रसेर रीति, शुनिलेइ बड़ हय हित ॥ 87 ॥ महाप्रभुकी शेषलीला-वर्णन करनेकी इच्छा :- शेष-लीलार सूत्रगण, कैलुँ किछु विवरण, इँहा विस्तारिते चित्त हय। थाके यदि आयु-शेष, विस्तारिब लीला-शेष, यदि महाप्रभुर कृपा हय ॥ 89 ॥ । 77