भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 930, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 930

[ 2/89-94 শ্রীশ্রীচৈতন্যচরিতামৃত মধ্যলীলা अनुवाद—मैंने शेषलीलाका सूत्ररूपमें कुछ वर्णन किया है और अब मेरी यह इच्छा है कि मैं विस्तारसे इसका वर्णन करूँ। यदि मेरा जीवन रहा और मेरे सौभाग्यसे महाप्रभुकी कृपा हुई, तो मैं शेष लीलाको विस्तारसे कहूँगा॥89॥ ग्रन्थकारका अपनी अयोग्यता और दैन्य ज्ञापन :- आमि वृद्ध जरा Provideतुर, लिखते काँपये कर, मने किछु स्मरण ना हय। ना देखिये नयने, ना शुनिये श्रवणे, तबु लिखि-ए बड़ विस्मय॥90॥ अनुवाद—मैं वृद्ध हो गया हूँ और चलने-फिरनेमें असमर्थ हूँ। जब मैं लिखता हूँ, तो मेरे हाथ काँपते हैं। मुझे कुछ स्मरण भी नहीं रहता है और न ही मैं ठीकसे देख और सुन पाता हूँ। तो भी मैं लिख रहा हूँ, यह बहुत बड़ा आश्चर्य है॥90॥ महाप्रभुकी दिव्योन्मादात्मक अन्त्यलीला ही गौरभक्तोंके लिये नित्य आलोच्य :- एइ अन्त्यलीला-सार, सूत्रमध्ये विस्तार, करि’ किछु करिलुँ वर्णन। इहा-मध्ये मरि यबे, वर्णिते ना पारि तबे, एइ लीला भक्तगण-धन॥91॥ अनुवाद—इस अध्यायमें मैंने अन्त्यलीलाके सारका सूत्रोंके मध्य कुछ विस्तार करके वर्णन किया है। यदि मैं इसे विस्तार करते हुए बीचमें ही देह त्याग दूँगा, तो भी सूत्ररूपमें यह लीला भक्तोंके लिये दिव्य निधि होगी॥91॥ अभी संक्षेपमें और बादमें विस्तारकी इच्छा :- संक्षेपे एइ सूत्र कैल, येइ इँहा ना लिखिल, आगे ताहा करिब विचार। यदि तत दिन जिये, महाप्रभुर कृपा हये, इच्छा भरि’ करिब विस्तार॥92॥ अनुवाद—इस अध्यायमें मैंने अन्त्यलीलाको सूत्ररूपमें कहा है। इस लीलाके विषयमें जो कुछ मैंने नहीं कहा है, आगे उसपर विचार करके लिखूँगा। यदि महाप्रभुकी कृपासे मैं उतने दिनों तक जीवित रहूँगा, तो मन भरके इसका विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा॥92॥ भक्तों की वन्दना और श्रौतपन्थामें अवस्थान :- छोट बड़ भक्तगण, वन्दों सबार-चरण, सबे मोरे करह सन्तोष। स्वरूप-गोसाञिर मत, रूप-रघुनाथ जाने यत, ताइ लिखि, नाहि मोर दोष॥93॥ अनुवाद—मैं कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम भक्त, सभीके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ कि वे मुझसे सन्तुष्ट हों। मैंने श्रीस्वरूप गोस्वामीके विचारोंको जैसे श्रीरूप और श्रीरघुनाथ गोस्वामीसे श्रवण करके समझा, उसी रूपमें लिखा है। मैंने इसमें अपने विचारानुसार कोई संशोधन नहीं किया है, इसलिये मेरे लिखनेमें कोई दोष नहीं है॥93॥ अनुभाष्य—‘भजनविज्ञ’ (भजनमें दक्ष), ‘भजनशील’ और ‘कृष्णनाममें दीक्षित कृष्णनामकारी’—ये तीन प्रकारके छोटे-बड़े भक्त हैं, सभी मुझपर कृपा करें। कनिष्ठ भक्तोंकी तर्क करनेमें रुचि होती है। वे सिद्धान्त नहीं जानते हैं, परन्तु अपनेको रसिकभक्त मानते हैं। मैंने लीलाके साथ सिद्धान्तको भी लिखा है, परन्तु कहीं ये कनिष्ठ भक्त इसे मेरा पाण्डित्य, भक्तिहीनता और कुतर्कमें निष्ठाका फल मानकर मुझे दोषी समझकर मुझपर कृपा न करें, इस आशङ्कासे मैं विनीत-भावसे निवेदन कर रहा हूँ कि मैं इस विषयमें स्वतन्त्र नहीं हूँ। मैं जिनके चरणकमलोंमें बिका हुआ हूँ, उन श्रीरूप-रघुनाथ-श्रीदामोदरस्वरूपसे जो श्रीगौरलीला-तत्त्व मैंने जाना है, उसीको मैंने लिखा है॥93॥ पञ्चतत्त्व, गुरुवर्ग और हरिदास-पण्डितकी वन्दना :- श्रीचैतन्य, नित्यानन्द, अद्वैतादि भक्तवृन्द, शिरे धरि सबार चरण। 78