भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 931

दूसरा अध्याय 2/94-95 ] स्वरूप, रूप, सनातन, रघुनाथेर श्रीचरण, धूलि करों मस्तके भूषण ॥ 94 ॥ पाञा याँर आज्ञाधन, व्रजेर वैष्णवगण, वन्दों ताँर मुख्य हरिदास। चैतन्यविलास-सिन्धु- कल्लोलेर एक बिन्दु, तार कणा कहे कृष्णदास ॥ 95 ॥ गोस्वामी आदि भक्तोंके श्रीचरणोंकी धूलिको अपने मस्तकका भूषण बनाना चाहता हूँ। इस प्रकार मैं उनकी कृपाकी वाञ्छा करता हूँ। इन सभीकी और व्रजके सभी वैष्णवों, विशेषकर श्रीहरिदास पण्डित (श्रीगोविन्ददेवजीके पुजारी) की आज्ञा पाकर मैं, कृष्णदास, श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीला-विलासके समुद्रकी लहरकी एक बिन्दुके एक कणको कह रहा हूँ॥ 94-95 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे अन्त्यलीला सूत्रकथने प्रेमोन्माद-प्रलापवर्णनं नाम द्वितीय-परिच्छेदः। श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीलामें अन्त्यलीलाका सूत्ररूपमें प्रेमोन्माद-प्रलाप-वर्णन नामक दूसरे अध्यायका अनुवाद समाप्त। अनुवाद—मैं श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैतादि भक्तोंके चरणकमलोंको अपने शीशपर धारण करनेकी अभिलाषा करता हूँ। मैं श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी, श्रीरघुनाथ अनुभाष्य—आदिलीला 8/49-60 संख्या देखें ॥ 95 ॥ दूसरे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। । 79