श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 932, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय कथासार-कटोया-ग्राममें संन्यास ग्रहणके बाद तीन दिनोंतक राढ़देशमें भ्रमण करते-करते महाप्रभुका श्रीनित्यानन्द प्रभुकी चतुराईसे शान्तिपुरके पश्चिम पारमें आगमन हुआ। महाप्रभुने गङ्गाको यमुना समझकर उनकी स्तव-स्तुति की। उसके बाद श्रीअद्वैतप्रभु नौका लेकर आये और महाप्रभुको स्नान करवाकर उन्हें अपने घर ले आये। वहाँपर नवद्वीप धामवासियों और श्रीशचीमाताके साथ महाप्रभुका मिलन हुआ। उनके साथ मिलनेके बाद शचीमाताने भोजन बनाया। जब महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु भोजन कर रहे थे, तब श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ श्रीअद्वैतप्रभुका नाना प्रकारसे कौतुक हुआ। दोपहरके बाद भक्त समुदायके साथ सङ्कीर्तन होने लगा। इस प्रकार वहाँ कुछ दिन बीतनेके बाद भक्तोंनें शचीमाताके साथ परामर्श करके महाप्रभुसे नीलाचलमें रहनेका अनुरोध किया। महाप्रभुने उसे स्वीकार करके श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीमुकुन्द, श्रीजगदानन्द पण्डित और श्रीदामोदर पण्डितको साथ लिया तथा शान्तिपुरके भक्तों और शचीमातासे विदायी लेकर छत्रभोग मार्गसे श्रीपुरुषोत्तमकी यात्रा की। -(अमृतप्रवाहभाष्य) संन्यास लेते ही भ्रमण करनेवाले श्रीगौरको प्रणाम :- न्यासं विधायोत्प्रणयोऽथ गौरो वृन्दावनं गन्तुमना भ्रमाद् यः। राढ़े भ्रमन् शान्तिपुरीमयित्वा ललास भक्तैरिह तं नतोऽस्मि ॥ १ ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ १ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - संन्यास ग्रहण करनेके बाद श्रीकृष्णप्रेममें वृन्दावन जानेकी इच्छा करनेपर भी भ्रान्तचित्तके कारण राढ़देशमें भ्रमण करते-करते शान्तिपुर पहुँचकर भक्तोंसे भेंट करके हर्षित हुए श्रीगौरचन्द्रको मैं नमस्कार करता हूँ॥ १॥ अनुभाष्य- यः गौरः (विश्वम्भरः) न्यासं (तुर्याश्रमं) विधाय (वेदविहित-संन्यास-संस्कारादिकं गृहीत्वा) उत्प्रणयः (प्रेमाकृष्टः सन्) वृन्दावनं गन्तुमनाः (व्रजगमनोत्सुकमानसः) भ्रमात् (प्राकृतनेत्रेषु भ्रमं प्रदर्शनात्, प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्ति-विलोचनपदं कृष्णधाम प्राकृतचेष्टया दुर्लभं शुद्धभजनलभ्यं चेति प्रदर्शयन्) राढ़े (गङ्गायाः पश्चिमे राष्ट्र (गत्वा) इह (अस्मिन् शान्तिपुर्यां) भक्तैः सह ललास, तं गौरं नतोऽस्मि। श्लोक भावानुवाद-जिन विश्वम्भरने वैदिक नियमानुसार संन्यास ग्रहण किया और श्रीकृष्णप्रेममें विह्वल होकर वृन्दावन जानेकी इच्छा की, किन्तु प्रेमावेशमें भ्रमवश राढ़देशमें भ्रमण करते हुए शान्तिपुर पहुँच गये और वहाँ भक्तोंसे मिलकर आनन्दित हुए, उन श्रीगौरचन्द्रको मैं नमस्कार करता हूँ। (श्रीकृष्णधामकी प्राप्ति केवल प्रेमरूपी अञ्जनसे रञ्जित भक्तिनेत्रोंके द्वारा ही सम्भव है। प्राकृत चेष्टासे इसका पाना अति दुर्लभ है। जड़ीय नेत्र और जड़ीय चेष्टा केवल भ्रम ही उत्पन्न करते हैं, वास्तव वस्तुका दर्शन नहीं, महाप्रभुकी लीला इसी सत्यको दिखानेके लिये हुई)। 'राढ़े'-गङ्गाका पश्चिम प्रदेश ॥ १ ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ २ ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो; श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो तथा समस्त गौरभक्तोंकी जय हो ॥ २ ॥ । 81