भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 933

[ 3/3-4 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला चौबीस वर्षके अन्तमें महाप्रभुका संन्यास-ग्रहण :- चब्बिश वत्सर शेष येइ माघ-मास। तार शुक्लपक्षे प्रभु करिल संन्यास ॥ ३ ॥ अनुवाद—चौबीस वर्षके अन्तमें माघ मासके शुक्लपक्षमें महाप्रभुने संन्यास ग्रहण किया ॥ ३ ॥ त्रिदण्डि भिक्षुकका गीत पढ़ते हुए महाप्रभुका राढ़देशमें तीन दिन तक भ्रमण :- संन्यास करि' प्रेमावेशे चलिला वृन्दावन। राढ़-देशे तिन दिन करिला भ्रमण ॥ ४ ॥ अनुवाद—संन्यास ग्रहण करनेके बाद महाप्रभु प्रेमके आवेशमें वृन्दावनकी ओर चले, परन्तु वे तीन दिनोंतक राढ़देशमें ही भ्रमण करते रहे ॥ ४ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'राढ़देश'—'राष्ट्र' बना है। गङ्गाके पश्चिमपार गौड़-भूमिको 'राढ़देश' कहते हैं; इसका एक नाम 'पौण्ड्र' पौण्ड्र राजधानी थी ॥ ४ ॥ अमृताणुकणा—(जावालोपनिषत्)— “यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत्।” अर्थात् 'जिस दिन कोई संसारसे विरक्त होगा, उसी दिन वह प्रव्रज्या (संन्यास) ग्रहण करेगा।' यह बात श्रीमद्भागवत (1/13/27)में और अधिक स्पष्ट रूपसे कहा गयी है— “यः स्वकात् परतो वेह जातनिर्वेद आत्मवान्। हृदि कृत्वा हरिं गेहात् प्रव्रजेत् स नरोत्तमः॥” अर्थात् “जो आत्मज्ञ-व्यक्ति अपने विवेकसे अथवा दूसरोंके उपदेशोंको सुनकर संसारको दुःखपूर्ण समझकर श्रीहरिको अपने हृदयमें धारण करके गृह त्याग करके संन्यास ग्रहण करते हैं, वे नरोत्तम (मनुष्योंमें उत्तम) हैं।” इस प्रकार शास्त्रोंमें संन्यास ग्रहण और अधिकारके विषयमें कहा गया है। पुराणोंमें सर्वश्रेष्ठ श्रीमद्भागवत, याज्ञवल्क्य यति-प्रकरण, पद्मपुराण, स्कन्दपुराण, हारित-संहिता, संवर्त्त-संहिता, दक्ष-संहिता, मनु-संहिता आदि विविध शास्त्रोंमें त्रिदण्ड-संन्यासकी विधिका वर्णन है। किन्तु तो भी कोई-कोई, “अश्वमेधं गवालम्भं संन्यासं पलपैतृकम्। देवरेण सुतोत्पत्तिं कलौ पञ्च विवर्ज्जयेत्॥” —इस ब्रह्मवैवर्त्त-पुराणके वाक्यके अनुसार कहते हैं कि कलियुगमें संन्यास ग्रहण करना वर्जित है। समस्त वेद-इतिहास-पुराण जिनके श्वाससे प्रकाशित हुए हैं, उनके भी जो अंशी हैं, वे सर्वावतारी स्वयं भगवान् श्रीगौरसुन्दरने कलियुगमें अवतरित होकर चतुर्थ आश्रमरूप संन्यासको ग्रहण करके महाभारतमें कहे गये विष्णुसहस्रनामके अन्तर्गत अपने 'संन्यासकृत्' नामको सार्थक किया। इसलिये उपरोक्त पुराण वाक्यका तात्पर्य अन्य प्रकारसे ग्रहण करना चाहिये। “कलियुगमें संन्यास वर्जित है, ऐसा कहनेका भाव यह है—आचार्य-शङ्करके द्वारा प्रवर्त्तित 'सोऽहं', 'अहं ब्रह्मास्मि' आदि अवैध चिन्तनसे उत्पन्न एकदण्ड संन्यास कभी भी ग्रहण करनेके योग्य नहीं है; इसलिये संन्यासको निषिद्ध कहा गया है। त्रिदण्ड संन्यास ही वास्तविक सनातन चतुर्थ आश्रम है। यह सदा ही ग्रहण योग्य है, कभी भी निषिद्ध नहीं है। त्रिदण्ड-संन्यास किसी-किसी समय बाहरसे एकदण्डाकारमें भी देखा जाता है। इस श्रेणीके एकदण्डी संन्यासी महाजन 'सेव्य-सेवक-सेवा'-रूप त्रिदण्डका नित्यत्व स्वीकार करके शङ्कर-प्रवर्त्तित 'एकदण्ड'-संन्यासको सभी प्रकारसे अवैध जानकर ग्रहण करनेके अयोग्य मानते हैं। इसलिये (रघुनन्दन)-स्मार्त्ताचार्यके द्वारा संग्रहीत उक्त वचनोंके बलपर भी निवृत्तिपथके साधकोंके पक्षमें त्रिदण्ड-संन्यास ग्रहण करना ही उक्त प्रमाणका तात्पर्य है।” (—त्रिदण्डीस्वामी श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज) श्रीचैतन्यभागवत (मध्यखण्ड 28/154-159)के पाठसे यह जाना जाता है कि श्रीगौरसुन्दरने शङ्कर-सम्प्रदायके 82 ।