भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 934

तीसरा अध्याय 3/4-6 ] एकदण्डी संन्यासी श्रीमत् केशव-भारतीसे संन्यास ग्रहणके समय पहले श्रीकेशव-भारतीके कानमें संन्यास-मन्त्र प्रदान करके उनको संन्यास प्रदान किया या परात्मनिष्ठामें परिनिष्ठित किया था। उसके बाद उनसे महाप्रभुने अपने द्वारा दिये हुए संन्यास-मन्त्रको ग्रहण किया। “सर्व-शिक्षागुरु-गौरचन्द्र वेदे बले। केशव-भारती-स्थाने ताहा कहे छले॥ 154॥ प्रभु कहे,-'स्वप्ने मोर कोन महाजन। कर्णे संन्यासेर मन्त्र करिल कथन॥ 155॥ बूझ देखि ताहा तुमि हय किंवा नहे।' एत बलि' प्रभु तार कर्णे मन्त्र कहे॥ 156॥ छले प्रभु कृपा करि' तारे शिष्य कैल। भारतीर चित्ते महा-विस्मय जन्मिल॥ 157॥ प्रभुर आज्ञाय तबे केशव भारती। सेइ मन्त्र प्रभुरे कहिला महामति॥” 159॥ अर्थात् “समस्त वेद श्रीगौरचन्द्रको 'सर्व-शिक्षागुरु' कहते हैं। उन्होंने श्रीकेशव-भारतीसे छलसे कहा, - 'स्वप्नमें किसी महाजनने मेरे कानमें यह संन्यास-मन्त्र दिया। देखो, आप इसे समझ पाते हो अथवा नहीं।' यह कहकर महाप्रभुने उनके कानमें मन्त्र कहा। छलसे महाप्रभुने उनपर कृपा करके उन्हें अपना शिष्य बना लिया। यह मन्त्र सुनकर श्रीभारतीके हृदयमें बड़ा विस्मय हुआ और महाप्रभुकी आज्ञासे तब श्रीकेशव भारतीने वही मन्त्र उनको प्रदान किया।” इस प्रकार स्वयं भगवान् श्रीगौरसुन्दरने शाङ्कर- संन्यासको अस्वीकार करके श्रीमद्भागवतीय त्रिदण्ड- संन्यास ग्रहणका ही दृष्टान्त स्थापित किया। उन्होंने उपरोक्त 'अश्वमेधं---' संन्यास निषेध करनेवाले पुराण- वाक्यके तात्पर्यको प्रकाशित करते हुए शास्त्रीय संन्यास-विधिकी परम सार्थकता स्थापित की। संन्यास ग्रहण करनेके पश्चात् उन्होंने श्रीमद्भागवतीय त्रिदण्डी- भिक्षु-गीतका कीर्तन करते हुए वृन्दावनकी ओर गमनकी लीला की। इसके द्वारा महाप्रभुने संन्यास ग्रहण करनेके तात्पर्य और त्रिदण्ड ग्रहणकर वृन्दावनधाम जानेकी विधिको प्रकाश किया। मनुसंहिता (12/10)— “वाग्दण्डोऽथ मनोदण्डः कायदण्डस्तथैव च। यस्यैते निहिता बुद्धौ त्रिदण्डीति स उच्यते॥” अर्थात् “जिसकी बुद्धिमें ये तीन-वाणीपर नियन्त्रण (वाग्दण्ड), मनपर नियन्त्रण (मनोदण्ड) और देहपर नियन्त्रण (कायदण्ड) दृढ़तासे स्थित हैं, उसे ही (वास्तविक) त्रिदण्डी कहा जाता है।” इसलिये वाग्दण्ड, मनोदण्ड और कायदण्ड-ग्रहणरूप त्रिदण्ड-विचारको अस्वीकार करनेसे जीव जिह्वा-मन-कायको अपने नियन्त्रणमें रखनेके स्थानपर उनके अधीन रहेगा। ऐसी अनियन्त्रित इन्द्रियाँ व्यक्तिको व्यभिचारमें प्रवृत्त होनेके लिये बाध्य करेंगी और वह केवल मायाके चङ्गुलमें ही फंसा रहेगा। ऐसा मायाबद्ध जीव श्रीचैतन्यदेवके द्वारा प्रदर्शित श्रीकृष्णसे विरहका कैसे अनुभव करेगा? अर्थात् वह विप्रलम्भात्मक (विरहमें) भजनमें कभी भी अधिकार नहीं प्राप्त कर सकता। (आदिलीला 3/20)— “आपनि आचरि' भक्ति शिखामु सबारे।” अर्थात् “महाप्रभुने स्वयं आचरण करके सभीको भक्तिकी शिक्षा दी।” सर्वलोकगुरु श्रीगौरसुन्दरकी यह त्रिदण्डसंन्यास- ग्रहणलीला एकमात्र उत्तमा-भक्तिकी प्राप्तिके इच्छुक साधक जीवोंके लिये एक विशेष उदाहरण स्थापित करनेके लिये ही हुई, किन्तु कलिसे प्रभावित जीव इसे समझ नहीं पाते॥ 4॥ एइ श्लोक पड़ि' प्रभु भावेर आवेशे। भ्रमिते पवित्र कैल सब राढ़-देशे॥ 5॥ अनुवाद—महाप्रभुने राढ़देशमें भ्रमण करते हुए उसे पवित्र कर दिया और भावावेशमें एक श्लोक पढ़ा॥ 5॥ श्रौतपन्था-अनुसरणसे ही त्रिदण्डिभिक्षुकी सिद्धि-प्राप्तिकी आशा :- (श्रीमद्भागवत 11/23/57 श्लोक)— एतां समास्थाय परात्म- निष्ठामुपासितां पूर्वतमैर्महद्भिः। अहं तरिष्यामि दुरन्तपारं तमो मुकुन्दाङ्घ्रिनिषेवयैव॥ 6॥ 83