श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 3/6 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अवन्तीदेशके भिक्षुक ब्राह्मणने कहा,—“प्राचीन महात्माओंके द्वारा उपासित इस परात्म-निष्ठारूप भिक्षुक-आश्रमका आश्रय करके मैं श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सेवाके द्वारा इस दुस्तर संसाररूप तमः (अज्ञान) से तर जाऊँगा॥”६॥ अनुभाष्य—संसारमें त्रितापसे जलते हुए अवन्तीके त्रिदण्डिभिक्षुने समस्त कायमनोवाक्यके द्वारा भगवान्के एकान्त शरणागत होकर सेवा करनेके उद्देश्यसे यह गीत गान किया— पूर्वैस्तमैः (प्राचीनैः) महद्भिः (महाभागवतैः) उपासितां (सेविताम्) एतां परात्मनिष्ठां (परः “ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारण-कारणम्॥” इति वचनात् सर्वस्मात् परः यः आत्मा, तस्मिन् या निष्ठा अनर्थनिवृत्त्यनन्तरं नैसर्गिकभजनपरावस्थितिः तां) समास्थाय (आदौ श्रद्धादिक्रम- पन्थानुसारेण सम्यक् प्रकारेण श्रौतमार्गे भजनं कुर्वन्) मुकुन्दाङ्घ्रिनिषेवया (साधन-भावभक्ताख्या) एव दुरन्तपारं (दुस्तरं) तमः (कृष्णसेवारहित-जड़ाहङ्कार-भोगरूप संसाराख्यम् अज्ञानं) तरिष्यामि (कृष्णोतर-कैङ्कर्यवासनां त्यक्त्वा अतिक्रमिष्यामि)। श्लोक-भावानुवाद—“प्राचीनकालमें महाभागवतोंके द्वारा सेवित इस परात्म-निष्ठा [‘परः’—‘‘ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्॥” ब्रह्मसंहिताके इस वचनके द्वारा जो सबसे श्रेष्ठ आत्मा (श्रीकृष्ण) हैं, उनमें निष्ठा अर्थात् अनर्थ निवृत्तिके उपरान्त स्वाभाविक भजन-परायणता]के द्वारा [श्रद्धासे प्रेम तक क्रमपथका सम्पूर्णरूपसे श्रौतमार्ग (गुरुसे श्रवण किये ज्ञान)के अनुसार] भजन करते हुए श्रीकृष्णसेवासे इस दुस्तर अन्धकारसे [श्रीकृष्णसेवारहित जड़-अहङ्कार-भोगरूप संसार कहलानेवाले अज्ञानसे] तर जाऊँगा अर्थात् श्रीकृष्णके अतिरिक्त मैं अन्य किसीका सेवक हूँ, इस भावका अतिक्रमण कर जाऊँगा।” चौंसठ प्रकारके भक्तिके अङ्गोंमें ‘वैष्णवचिह्नधारण’के अन्तर्गत चतुर्थाश्रम (संन्यास)के लिये उचित वेष-धारण करना एक अङ्ग है। जो यह चतुर्थाश्रममोचित वेष धारण करते हैं, उनका ही मुकुन्दसेवाके द्वारा संसारसे उद्धार होता है। परमात्मनिष्ठ व्यक्ति त्रिदण्डिभिक्षुका वेष धारण करते हैं। पूर्वकालमें महर्षिगण त्रिदण्डिवेश धारण करते थे, बादमें विष्णुस्वामीने कलियुगमें त्रिदण्डवेशको ही ‘परात्मनिष्ठा’ कहकर मुकुन्दसेवामें निष्ठाका प्रचलन किया। ऐकान्तिक-भक्तिनिष्ठ वैष्णव उस त्रिदण्डके साथ चतुर्थ ‘जीवदण्ड’को जोड़ देते हैं, तो भी वैष्णव संन्यासी त्रिदण्डि-संन्यासी कहलाते हैं। मायावादी संन्यासी एकदण्ड ग्रहण करते हैं, वे त्रिदण्डके तात्पर्यको नहीं समझ पाते। विष्णुस्वामीके परवर्ती कालमें शिवस्वामी सम्प्रदायके लोगोंने निर्विशेष-ब्रह्मज्ञानको लक्ष्य करके शङ्कराचार्यके एकदण्ड संन्यासके आदर्शको अपनाकर सेव्य-सेवक-भाव अर्थात् मुकुन्दसेवाका परित्याग कर दिया। विष्णुस्वामी सम्प्रदायके द्वारा प्रवर्तित संन्यासके एक सौ आठ नामोंके स्थानपर केवलद्वैतवादी संन्यासी दस नामोंको ही ग्रहण करते हैं। श्रीगौरसुन्दरने यद्यपि भारतकी तात्कालिक प्रथाके अनुसार एकदण्ड-संन्यास ग्रहण किया था, तथापि उस एकदण्डके भीतर चतुष्दण्ड एकीभूत था,—यही प्रचार करनेके लिये उन्होंने श्रीमद्भागवतमें वर्णित त्रिदण्डि-भिक्षुके गीतका गान किया। श्रीगौरसुन्दरने कभी भी परात्मनिष्ठाके अभाववाले एकदण्ड संन्यासका अनुमोदन नहीं किया। त्रिदण्डी संन्यासी त्रिदण्डके साथ जीवदण्डके संयोगसे ऐकान्तिकी भक्तिका विधान करके रखते हैं। अप्राकृत भक्तिरहित एकदण्डि-संन्यासी निर्विशेष मतका अवलम्बन करनेके कारण परात्मनिष्ठासे विमुख होते हैं, इसलिये वे ब्रह्म नामक प्रकृतिमें लीन होकर निर्विशेष होनेको ही ‘मुक्ति’ मानते हैं। आर्यवर्त्तके (भारतके) मायावादी लोग श्रीचैतन्यदेवको उनके बाह्यज्ञानके कारण त्रिदण्डी न मानकर एकदण्डी संन्यासी ही मानते हैं, यह उनका भ्रम ही है। श्रीमद्भागवतमें एकदण्ड संन्यासका कहीं भी वर्णन नहीं है, त्रिदण्ड-धारणको ही चतुर्थ आश्रमका एकमात्र वेष कहा गया है। भगवान्की बहिरङ्गा शक्तिसे 84 ।