श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय 3/6-10 ]
मोहित मायावादी लोग यह समझ नहीं पाते हैं कि श्रीगौरसुन्दर श्रीमद्भागवतकी वाणीका बहुत आदर करते हैं। श्रीचैतन्यदेवकी शिक्षानुसार आज तक उनके अनुगत भक्तोंमें शिखा और सूत्र (जनेऊ) युक्त संन्यास प्रचलित है। एकदण्डि-मायावादी लोग शिखा और सूत्रका परित्याग करते हैं, इसलिये वे त्रिदण्डका माहात्म्य समझनेमें असमर्थ हैं, क्योंकि उनमें श्रीभगवान्की सेवा करनेकी वृत्ति नहीं है। उनका चित्त विषयकी सेवामें निमग्न होनेसे वे धैर्यहीन होकर सेव्य-सेवक-भावका त्याग करके ब्रह्ममें लीन होनेका विचार करते हैं। दैव-वर्णाश्रम (गीता एवं भागवतके अनुसार गुण-कर्मके आधारपर वर्णाश्रमका निर्णय) प्रवर्त्तनकारी आचार्यगण असुरवर्णाश्रम (जन्मके आधारपर वर्णाश्रमका निर्णय) वालोंके ज्ञान और चिन्तन-धारा आदि किसीको भी ग्रहण नहीं करते हैं। श्रीगौरसुन्दरके अत्यन्त अन्तरङ्ग भक्त, श्रीमद्भागवत शास्त्रमें परम प्रवीण श्रीमद् गदाधर पण्डित गोस्वामी प्रभुने स्वयं त्रिदण्ड संन्यासका विचार ग्रहण किया और श्रीमाधव उपाध्यायको त्रिदण्ड संन्यास प्रदान किया। इन्हीं श्रीमाधवाचार्यसे ही पश्चिम भारतमें वल्लभाचार्य-सम्प्रदायकी उत्पत्ति हुई है। गौड़ीय-वैष्णव- स्मृत्याचार्य श्रीगोपालभट्टने अपने श्रीगुरुदेव त्रिदण्डिस्वामी श्रीप्रबोधानन्द सरस्वतीसे किस प्रकार त्रिदण्ड-विधानमें दीक्षित होकर वेश ग्रहण किया, इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है। तथापि श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा रचित 'श्रीउपदेशामृत'के प्रथम श्लोकमें निहित त्रिदण्ड-विधानका आनुगत्य श्रीगोपालभट्ट गोस्वामीमें उत्तम रूपमें प्रकाशित होता था। श्रीगौरसुन्दरके अनुगत भक्त केवलाद्वैत-विचारसे 'एकदण्ड'-संन्यासको कभी भी ग्रहण नहीं करते। शिखाका मुण्डन और सूत्रका त्यागकर भगवान्को निर्विशेष ब्रह्म कहनेवाले संन्यासी अपनी विचार-प्रणालीको गौड़ीय-वैष्णव-सम्प्रदायमें प्रचलित करनेमें कभी सफल नहीं हुए हैं।
त्रिदण्डि-श्रीधर स्वामीकी प्रणालीका श्रीगौरसुन्दरने अनुमोदन किया है। केवलाद्वैतवादी लोग श्रीधर स्वामीकी शुद्धाद्वैत-विचार-प्रणालीको न समझकर उन्हें भी अपने सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त करना चाहते हैं, परन्तु श्रीगौरसुन्दरका यह विचार नहीं है॥ 6॥
त्रिदण्डि-भिक्षुकी कृष्णसेवा-निष्ठा-दर्शनसे सुख :- प्रभु कहे,—“साधु एइ भिक्षुक-वचन। मुकुन्द सेवन-व्रत कैल निर्धारण॥ 7॥ परात्मनिष्ठा-मात्र वेष-धारण। मुकुन्द-सेवाय हय संसार-तारण॥ 8॥ सेइ वेष कैल, एबे वृन्दावन गिया। कृष्णनिषेवण करि निभृते बसिया॥”9॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,– “इस भिक्षुकके वचन अति सुन्दर हैं, क्योंकि उसने मुकुन्दसेवाका व्रत ग्रहण किया है। परात्मनिष्ठा ही संन्यास वेश धारण करनेका एकमात्र तात्पर्य है। मुकुन्द सेवासे ही संसारसे मुक्ति मिलती है। संन्यास वेश धारण करके मैं अब वृन्दावन जाकर किसी एकान्त स्थानमें वास करके केवल श्रीकृष्णका भजन और सेवा करूँगा॥” 7-9॥
अमृतप्रवाह भाष्य—संन्यासवेश ग्रहण करके महाप्रभुने कहा,– “भिक्षुकके ये वचन साधु (सुन्दर) हैं, क्योंकि इनके द्वारा श्रीकृष्ण-चरणकमलोंकी सेवारूपी व्रत निर्धारित हुआ है।” जड़ात्म-निष्ठाका निषेध करके परात्मनिष्ठा ही संन्यासवेश धारण करनेका तात्पर्य है॥ 7-8॥
महाप्रभुकी प्रेमोन्मत्त अवस्थामें वृन्दावन-यात्रा :- एत बलि' चले प्रभु, प्रेमोन्मादेर चिह्न। दिक्-विदिक्-ज्ञान नाहि, किवा रात्रि-दिन॥ 10॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु वहाँसे वृन्दावनकी ओर चले। उनके शरीरमें प्रेमोन्मादके चिह्न उदित हो गये और उस प्रेमोन्मादमें उन्हें न तो दिशा-विदिशा और न ही रात्रि-दिनका ज्ञान रहा॥ 10॥
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