भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 937

[ 3/11-22 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाप्रभुके पीछे चलनेवाले निताइ, चन्द्रशेखर और मुकुन्द :- नित्यानन्द, आचार्यरत्न, मुकुन्द, — तिनजन। प्रभु-पाछे-पाछे तिने करेन गमन ॥ 11 ॥ **अनुवाद—**श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीचन्द्रशेखर आचार्य और श्रीमुकुन्द प्रभु, —ये तीनों भी महाप्रभुके पीछे-पीछे चले ॥ 11 ॥ महाप्रभुके दर्शन मात्रसे लोगोंका उद्धार :- येइ येइ प्रभु देखे, सेइ सेइ लोक। प्रेमावेशे 'हरि' बोले, खण्डे दुःख-शोक ॥ 12 ॥ बालकोंके प्रति महाप्रभुका स्नेह :- गोप-बालक सब प्रभुके देखिया। 'हरि' 'हरि' बलि' डाके उच्च करिया ॥ 13 ॥ शुनि' ता-सबार निकटे गेला गौरहरि। 'बल' 'बल' बोले सबार शिरे हस्त धरि' ॥ 14 ॥ ता'-सबार स्तुति करे, —“तोमरा भाग्यवान्। कृतार्थ करिले मोरे शुनाञा हरिनाम् ॥” 15 ॥ **अनुवाद—**जिस-जिसने महाप्रभुके दर्शन किये, वह भी प्रेमावेशमें 'हरि' 'हरि' बोलने लगता और उसके समस्त दुःख-शोक दूर हो जाते। वहाँके गोप-बालक भी महाप्रभुको देखकर उच्च स्वरसे 'हरि' 'हरि' बोलने लगे। श्रीगौरहरि उनकी हरिध्वनि सुनकर उन गोप-बालकोंके पास गये और उनके सिरोंपर हाथ रखकर उनसे पुनः पुनः 'हरि' 'हरि' बोलनेके लिये कहने लगे। तब महाप्रभुने उन सबकी स्तुति करते हुए कहा, —“तुम लोग बड़े सौभाग्यवान् हो। तुमने मुझे हरिनाम् सुनाकर कृतार्थ किया है॥” 12-15 ॥ श्रीनित्यानन्दकी चतुरायी और बालकोंको एकान्तमें उपदेश :- गुप्ते ता-सबाके आनि' ठाकुर नित्यानन्द। शिखाइला सबाकारे करिया प्रबन्ध ॥ 16 ॥ “वृन्दावन-पथ प्रभु पुछेन तोमारे। गङ्गातीर-पथ तबे देखाइह ताँरे ॥” 17 ॥ **अनुवाद—**श्रीनित्यानन्द प्रभुने उन गोप बालकोंको एकान्तमें जाकर कुछ बात बतलायी जिसका उन्हें विश्वास हो गया। श्रीनित्यानन्द प्रभुने उनसे कहा, —“यदि महाप्रभु तुमसे वृन्दावनका मार्ग पूछें, तो उन्हें गङ्गाके किनारेका मार्ग दिखला देना॥” 16-17 ॥ अनुभाष्य—'प्रबन्ध'—सुसङ्गत कहानीकी रचना ॥ 16 ॥ महाप्रभुके द्वारा बालकोंसे वृन्दावन जानेका मार्ग पूछनेपर बालकोंका उनको नवद्वीप-पथ दिखाना :- तबे प्रभु पूँछिलेन, —“शुन, शिशुगण। कह देखि, कोन् पथे याब वृन्दावन ॥” 18 ॥ शिशु सब गङ्गातीरपथ देखाइल। सेइ पथे आवेशे प्रभु गमन करिल ॥ 19 ॥ **अनुवाद—**तब महाप्रभुने उन बालकोंसे पूछा— “हे बच्चों सुनो! वृन्दावन जानेका कौनसा मार्ग है?” सब बालकोंने गङ्गाके किनारेका पथ उन्हें दिखला दिया। महाप्रभु आवेशमें उस पथपर चले गये ॥ 18-19 ॥ सब प्रकारकी आवश्यकताओंकी पूर्ति हेतु और चारों ओर महाप्रभुके आगमनकी सूचना देनेके लिये श्रीनिताइके द्वारा श्रीचन्द्रशेखरको शान्तिपुरमें भेजना :- आचार्यरत्नेरे कहे नित्यानन्द-गोसाञि। “शीघ्र याह तुमि अद्वैत-आचार्येर ठाञि ॥ 20 ॥ प्रभु लये याब आमि ताँहार मन्दिरे। सावधाने रहेन येन नौका लञा तीरे ॥ 21 ॥ तबे नवद्वीपे तुमि करह गमन। शचीमाता लञा आइस आर भक्तगण ॥” 22 ॥ **अनुवाद—**तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीचन्द्रशेखर आचार्यको कहा, —“आप तुरन्त ही श्रीअद्वैताचार्यके घर जाँय। मैं महाप्रभुको शान्तिपुर ले आऊँगा और श्रीअद्वैताचार्य वहीं गङ्गाके किनारे सावधानीपूर्वक एक 86 ।