श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 923, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय 2/70-72 ] अमृताणुकणिका—पुनः जैसे श्रीकृष्ण आकर बोले, — 'प्रिये ! किसलिये मान करके मुझे कटु वचन कह रही हो? मेरे प्रति प्रसन्न होओ।' इस प्रकार अनुनय कर रहे हैं, ऐसा मनमें जानकर अमर्षके अनुगत अवहित्था भाव राधाजीमें उदय हुआ। अवहित्था भाव उदय होनेपर राधाजी धीरप्रगल्भ भावके गुणका आश्रयकर उदासीनतासे कहने लगीं, — ' 'हे नाथ !' तुम तो हम ब्रजवासियोंके रक्षक हो, ऐसी कौनसी निर्बुद्धि (मूर्ख) रमणी है, जो तुम्हें सन्तुष्ट नहीं करेगी? किन्तु ब्राह्मणियोंके कहनेपर मैंने मौनव्रत धारण किया था, इस कारण मैं अब तक तुमसे बातचीत नहीं कर पायी, इसलिये मेरा यह अपराध क्षमा करो—यह भाव है।' धीरप्रगल्भाके लक्षण (उःनीः 5/53)— "उदास्ते सुरते धीरा सावहित्था च सादरा॥” अर्थात् “मानिनी अवस्थाको प्राप्त होकर सम्भोगके विषयमें उदासीना और अवहित्थाके द्वारा अपने मानके भावको गुप्त रखकर ऊपरसे कान्तके प्रति आदर दिखलानेवालीको 'धीरप्रगल्भा' कहते हैं।" पुनः श्रीकृष्ण जैसे चले गये हैं, ऐसा मन-ही-मनमें कहने लगीं, — 'बार-बार मेरे व्यवहारसे दुःखी होकर चले गये हैं, अब वे लौटकर नहीं आयेंगे।' ऐसा मनमें भाव आनेसे चापल नामक भावके उदय होनेसे मनमें चिन्तन करने लगीं, — 'यदि कृपापूर्वक पुनः वे दर्शन प्रदान करेंगे, तब मैं स्वयं ही उनके कण्ठको धारण करूँगी (गले लग जाऊँगी)।' इस प्रकार दैन्यसहित बोलने लगीं, — ' 'हे रमण !' तुम सदा ही मुझे आनन्द प्रदान करते हो, इसलिये पहलेके समान अब भी आकर मेरे साथ विहार करो—यह अर्थ है ॥'70॥
मोर वाक्य निन्दा मानि', कृष्ण छाड़ि' गेला जानि, शुन, मोर ए स्तुति-वचन। नयनेर अभिराम, तुमि मोर धन-प्राण, हाहा पुनः देह दरशन ॥" 71 ॥
अनुवाद—[हे नयनाभिराम!] मेरे वचनोंको निन्दा मानकर कृष्ण मुझे छोड़कर चले गये हैं, ऐसा मानकर श्रीराधिका कहने लगीं— हे कृष्ण! मेरे मधुर वचन सुनो। तुम मेरे नयनोंको आनन्द प्रदान करनेवाले हो, तुम ही मेरे प्राण-धन हो। हा-हा! मुझे पुनः दर्शन दो॥"71॥ अमृताणुकणिका—अब सामने श्रीकृष्ण आये हैं, यह जानकर सहज उत्सुकताके द्वारा मन आक्रान्त होनेपर राधाजीने आलिङ्गनके लिये दोनों भुजायें फैला दीं। किन्तु श्रीकृष्णको न पानेपर बाह्य स्फूर्ति होनेपर अत्यन्त विकलताके साथ कहने लगीं, — 'हे नयनाभिराम !' हे नयनोंके आनन्ददायक ! कब तुम मेरे नयनपथके पथिक होओगे ?' अर्थात् राधाजी अति खेदसे कह रही हैं, हाय हाय, कब तुम मेरे दृष्टिगोचर होओगे ? ॥ 71 ॥ महाप्रभुके महाभावके लक्षण :- स्तम्भ, कम्प, प्रस्वेद, वैवर्ण्य, अश्रु, स्वरभेद, देह हैल पुलके व्यापित। हासे, कान्दे, नाचे, गाय, उठि' इति-उति धाय, क्षणे भूमे पड़िया मूर्च्छित ॥ 72 ॥ अनुवाद—राधाभावाविष्ट महाप्रभुके शरीरमें श्रीकृष्ण विरहके कारण स्तम्भ, कम्प, स्वेद, वैवर्ण्य, अश्रु, स्वरभेद, पुलकादि सात्त्विकभाव उदित हो गये। वे कभी हँसते, कभी रोते, कभी नाचते, कभी गाते, कभी इधर-उधर दौड़ते और कभी मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ते ॥ 72 ॥ अनुभाष्य—'स्तम्भ'—अष्ट-सात्त्विक विकारोंमें एक। (भ.र.सि. दःविः तृतीय लः)— “चित्तं सत्त्वीभवत् प्राणे न्यस्यत्यात्मानमुद्धतम्। प्राणस्तु विक्रियां गच्छन् देहं विक्षोभयत्यलम्। तदा स्तम्भादयो भावा भक्तदेहे भवन्त्यमी ॥ स्तम्भं भूमिस्थितः प्राणस्तनोति। स्तम्भो हर्षभयाश्चर्यविषादामर्षसम्भवः । तत्र वागादि-राहित्यं नैश्चल्यं शून्यतादयः ॥” । 71