श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 922, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 2/68–70 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
वचन (परिहासयुक्त वचन, स्तुतिपूर्वक निन्दा) बोलने लगीं,–'हे भुवनैकबन्धो!' इसमें तुम्हारा क्या दोष है? तुम तो केवल मेरे ही बन्धु नहीं हो, सभी गोपियोंके भी केवल नहीं, वेणुनादसे समस्त भुवनोंके, अर्थात् समस्त भुवनोंमें रहनेवाली स्त्रियोंके तुम बन्धु हो, इसलिये उनके सब कार्योंके समाधान हेतु जाओ—यह अर्थ है। उसका लक्षण (उःनीः 5/35)— “धीरा तु वक्ति वक्रोक्त्या सोत्रासं सागसं प्रियम्॥” अर्थात् “जो नायिका अपने अपराधी प्रियतमके प्रति उपहासपूर्वक वक्रोक्तिका प्रयोग करती है, उसको 'धीरमध्या' कहा जाता है॥” पुनः श्रीकृष्ण जैसे चले गये, ऐसा मनमें जानकर औत्सुक्यके अनुगत मति–नामक भावके उदयसे कहने लगीं,–'हे कृष्ण!'–हे श्यामसुन्दर, तुम सबके चित्ताकर्षक हो। मेरा चित्त तो तुमने पहले ही हरण कर लिया था, अब मेरे मान करनेका क्या प्रयोजन है? इसलिये एकबार तो दर्शन दो—यह अर्थ है॥'68॥
तोमार चपल मति, एकत्र ना हय स्थिति, ता'ते तोमार नाहि किछु दोष। तुमि त' करुणासिन्धु, आमार पराण–बन्धु, तोमाय नाहि मोर कभु रोष॥69॥
अनुवाद–[हे चपल!] तुम्हारी मति अति चञ्चल है, तुम्हारे मनकी कहीं स्थिरता नहीं है। तुम्हारा मन किसी एक रमणीमें स्थिर नहीं रहता। [करुणैकसिन्धो!] तुम तो करुणाके सिन्धु हो। तुम तो मेरे प्राणोंसे प्रिय बन्धु हो, इसलिये मैं तुमसे कभी भी रुष्ट नहीं हो सकती॥69॥
अमृतानुकणिका—पुनः श्रीकृष्ण जैसे आकर विनय कर रहे हैं,–'प्रिये! मैं बाहर ही था, कहीं और गया नहीं था, अतः तुम प्रसन्न होओ।' इस प्रकार श्रीकृष्ण अनुनय कर रहे हैं, ऐसा मनमें जानकर राधाजीमें औग्रद्य या उग्रता नामक भाव उदय हो गया। उग्रता नामक भाव उदय होनेसे अधीरामध्या नायिकाके गुणोंका आश्रय करके रोषसहित राधाजी बोलीं,–'हे चपल!' हे चपलराज परस्त्री–चोर! जाओ जाओ, यहाँसे चले जाओ—यह अर्थ है।' अधीराके लक्षण (उःनीः 5/37)— “अधीरा परुषैर्वाक्यै र्निरस्येद्वल्लभं रुषा॥” अर्थात् “जो नायिका अपने रोषको प्रकाशकर अपने वल्लभको निष्ठुर वाक्योंसे फटकार लगाती है, उसको अधीरामध्या कहा जाता है।” राधाजीको लगा कि मेरे रोषपूर्ण वाक्य सुनकर श्रीकृष्ण चले गये हैं, तो अपने मनमें ग्लानिसे सोचने लगीं,–'हाय! मैंने उनका अनादर कर दिया, इस कारण वे चले गये हैं और अब वे नहीं आयेंगे'—इस प्रकार दैन्य उदय होनेसे सकाकु (मिनतीपूर्वक) बोलीं,–'हे करुणैकसिन्धो!' तुम तो करुणाके एकमात्र सिन्धु हो, यद्यपि मैं अपराधिनी हूँ, तथापि तुम करुणासे आर्द्र होकर दर्शन दो॥'69॥
श्रीकृष्णके प्रति क्षमा या प्रसन्न भाव :– तुमि नाथ—व्रजप्राण, व्रजेर कर परित्राण, बहु कार्ये नाहि अवकाश। तुमि आमार रमण, सुख दिते आगमन, ए तोमार वैदग्ध्य–विलास॥70॥
अनुवाद–[हे नाथ!] हे कृष्ण! तुम व्रजके नाथ, व्रजवासियोंके प्राण हो। व्रजवासियोंकी रक्षाके लिये तुम अनेक कार्योंमें व्यस्त रहते हो, इसलिये मेरे पास आनेका तुम्हें अवकाश नहीं है। [हे रमण!] तुम तो सदा ही मेरे हृदयमें रमण करते रहते हो और मुझे सुख प्रदान करनेके लिये मेरे पास आये हो, यह तुम्हारे विलासका वैदग्ध्य है॥70॥ अनुभाष्य–'वैदग्ध्य'–पटुता, पाण्डित्य, रसिकता, चतुरता, शोभा और भङ्गी॥70॥
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