भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 921, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 921

दूसरा अध्याय 2/66-68 ] 'मान'-(उज्ज्वलनीलमणि 14/96)- “स्नेहस्तूत्कृष्टता-व्याप्त्या माधुर्यं मानयन्नवम्। यो धारयत्यदाक्षिण्यं स मान इति कीर्त्यते॥” अर्थात् “जो स्नेह उत्कर्ष प्राप्तिके द्वारा श्रीराधाकृष्णयुगलको नव-नव माधुर्य अनुभव कराता है और अपने भावको गोपन रखनेके लिये बाहरसे कौटिल्यको धारण करता है, उसे 'मान' कहते हैं॥66॥ पूर्वोक्त 'हे देव' श्लोककी व्याख्या :- “तुमि देव-क्रीड़ारत, भुवनेर नारी यत, ताहे कर अभीष्ट क्रीड़न। तुमि मोर दयित, ताते वैस मोर चित, मोर भाग्ये कैले आगमन॥67॥ अनुवाद-[श्लोकके 'हे देव'का भाव]-'तुम देव हो अर्थात् तुम सदा अपनी क्रीड़ामें रत रहते हो। इसलिये जगत्की अन्य समस्त नारियोंके साथ तुम अपनी अभीष्ट क्रीड़ा करो। ['हे दयित'का भाव]-तुम मेरे प्रियतम हो, मेरे हृदयमें विश्राम करो। आज मेरा भाग्य उदित हुआ है, जो तुम्हारा यहाँ आगमन हुआ है॥67॥ अमृतानुकणिका-दिव्योन्माद दशामें महाप्रभु श्रीराधिकाके भावोंमें विभावित होकर 'हे देव...' यह श्लोक पढ़ने लगे। राधाजीकी कृष्णविरहजनित मूर्च्छा दूर हुई और वे चारों ओर देखकर कहने लगीं,–'अहो सखी! मैं नूपुरकी ध्वनि सुन रही हूँ, परन्तु वे तो कहीं दिखायी नहीं दे रहे। ऐसा लगता है कि इसी कुञ्जमें किसी और रमणीके विलास करते हुए वे शठ यहीं अवस्थान कर रहे हैं।' ऐसा कहकर पुनः उन्मादवश हेतु किसी अन्य रमणीके साथ सङ्गमसे चिह्नाङ्कित श्रीकृष्णको सामने देखकर उनके प्रति राधाजीमें अमर्ष उदित हो गया। और फिर वे चले गये, ऐसा मनमें चिन्तन करनेके बाद तापसे औत्सुक्य उदित हुआ (यहाँ अमर्ष और औत्सुक्य, दोनों भावोंकी सन्धि हुई)। पहले अन्य रमणीके साथ सम्भुक्त श्रीकृष्णका मनमें ही दर्शनकर स्वाभाविक अपना धीराधीर-मध्यत्व (नायिकाके गुण) का आश्रयकर नेत्रोंमें जल भरे हुए राधाजीने वक्रोक्तिसे सम्बोधन किया,–'हे देव!' अन्य रमणियोंके साथ क्रीड़ारत हो, इसलिये तुम देव (क्रीड़ाशील) हो। अतः तुम उन्हींके पास जाओ-यही अर्थ है।' (उःनीः 5/39)- “धीराधीरा तु वक्रोक्त्या सवाष्पं वदति प्रियम्॥” अर्थात् “जो नायिका अपराधी वल्लभके आनेपर अपने नेत्रोंसे आँसुओंको बहाती हुई वक्रोक्ति प्रयोग करती है, उसे धीराधीरमध्यया नायिका कहते हैं।” 'किसी अन्य रमणीके पास जाओ'–राधाजीके यह वचन सुनकर श्रीकृष्ण जैसे चले गये हैं, ऐसा मनमें सोचकर बादमें हृदयमें तापके उदय होनेसे उनके दर्शनकी उत्सुकतावश कहने लगीं,-' 'हे दयित!', तुम तो मेरे प्राणकोटि प्रियतम हो, मैं कैसे तुम्हारा त्याग कर सकती हूँ? इसलिये दर्शन दो-यह अर्थ है॥'67॥ भुवनेर नारीगण, सबा' कर आकर्षण, ताँहा कर सब समाधान। तुमि कृष्ण-चित्तहर, ऐछे कोन् पामर, तोमारे वा केबा करे मान॥68॥ अनुवाद-[हे भुवनैकबन्धौ!] जगत्में सभी रमणियोंके चित्तको तुम वंशीध्वनिके द्वारा आकर्षित करते हो और उन सबके मनकी सन्तुष्टिका विधान करते हो। [हे कृष्ण!] निज रूप-गुण-माधुर्यके द्वारा तुम सभीके चित्तको हरण करनेवाले हो। ऐसा कौन अधम है जो तुमसे मान करेगा? अर्थात् कोई भी नहीं कर सकता॥68॥ अमृतानुकणिका-पुनः श्रीकृष्ण आकर अनुनय कर रहे हैं, ऐसा मनमें जानकर राधाजीमें अमर्षके अनुगत असूयाका उदय हुआ। असूयाके उदय होनेसे धीराधीर-मध्य भावका आश्रयकर वक्रोक्तिसे सोलुण्ठ । 69