श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 920, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 2/63-66 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 'रोष'—(भ.र.सि. दःविः चतुर्थ लः)— “अपराधदुरुक्त्यादिजातं चण्डत्वमुग्रता। वधबन्धशिरःकम्पभर्त्सनाताड़नादिकृत्॥” अर्थात् “अपराध और बुरे-वचनजनित क्रोधको 'उग्रता' या 'रोष' कहते हैं। इसमें वध, बन्धन, सिरका काँपना, भर्त्सना और ताड़नादि लक्षण होते हैं।” 'अमर्ष'—(भ.र.सि. दःविः चतुर्थ लः)— “अधिक्षेपापमानादेः स्यादमर्षोऽसहिष्णुता॥ तत्र स्वेदः शिरःकम्पो विवर्णत्वं विचिन्तनम्। उपायान्वेषणाक्रोशवैमुख्योत्थाड़नादयः॥” अर्थात् “व्यङ्ग या तिरस्कार और अपमानादिके लिये असहिष्णुताको 'अमर्ष' कहते हैं। इसमें पसीना आना, सिरका काँपना, विवर्णता (रङ्गहीन या कान्तिहीन होना), चिन्ता, उपायको ढूँढना, आक्रोश, विमुखता और ताड़नादि लक्षण होते हैं॥” 63 ॥ प्रियतम श्रीकृष्णके दर्शनकी आकाङ्क्षा :— श्रीकृष्णकर्णामृत (40) बिल्वमङ्गल-श्लोक— हे देव, हे दयित, हे भुवनैकबन्धो, हे कृष्ण, हे चपल, हे करुणैकसिन्धो। हे नाथ, हे रमण, हे नयनाभिराम, हा हा कदा नु भवितासि पदं दृशोर्मे॥ 65 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 65 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे देव! हे दयित! हे भुवनके एकमात्र बन्धु! हे कृष्ण! हे चपल! हे करुणासिन्धु! हे नाथ! हे रमण! हे नयनोंको आनन्द देनेवाले! आहा! तुम कब मुझे दर्शन दोगे? ॥ 65 ॥ अनुभाष्य— हे देव, हे दयित (प्रिय), हे भुवनैकबन्धो (व्रजभूम्येकपालक), हे चपल (स्वेच्छाराम), हे करुणैकसिन्धो, हे रमण (गोपीजनरमण), हे नयनाभिराम (नयनानन्द), हे कृष्ण (गोपवध्वाकर्षक), हा हा मे (मम) दृशोः (नयनयोः) पदं (गोचरं) कदा (कस्मिन्काले) नु (किं) भवितासि? श्लोक-भावानुवाद—हे देव! हे प्रियतम! हे व्रजके पालनहारे! हे चपल (स्वेच्छासे रमण करनेवाले)! हे करुणाके सिन्धु! हे गोपीजन-रमण! हे नयनानन्द! हे गोपवधु-आकर्षक! हा हा कब मेरे नयनोंके गोचर होओगे? ॥ 65 ॥ महाप्रभुके दिव्योन्मादका वर्णन :— उन्मादेर लक्षण, कराय कृष्ण-स्फुरण, भावावेशे उठे प्रणय-मान। सोल्लुण्ठ-वचन-रीति, मद, गर्व, व्याज-स्तुति, कभु निन्दा, कभु वा सम्मान॥ 66 ॥ अनुवाद—महाप्रभुमें उन्मादके लक्षण उन्हें श्रीकृष्णकी स्फूर्ति कराते। भावके आवेशमें प्रणय, मान, व्यङ्गात्मक वाक्य, मद, गर्व और परोक्ष-स्तुति आदि प्रेमके विकार और सञ्चारी भाव जाग्रत हो गये। वे कभी कृष्णकी निन्दा करते और कभी सम्मान करते॥ 66 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'सोल्लुण्ठ'—स्तुतिवाक्यके द्वारा निन्दा॥ 66 ॥ अनुभाष्य— उन्माद'—(भ.र.सि. दःविः चतुर्थ लः)— “उन्मादो हृद्भ्रमः प्रौढ़ानन्दापद्विरहादिजः। अत्राट्टहासो नटनं सङ्गीतं व्यर्थचेष्टितम्। प्रलाप-धावनक्रोश-विपरीत-क्रियादयः॥” अर्थात् “अत्यन्त आनन्द, विपत्ति एवं विरहादिसे उत्पन्न हृदयके भ्रमको 'उन्माद' कहते हैं। उन्मादमें अट्टहास, नृत्य, सङ्गीत, व्यर्थ-चेष्टा, प्रलाप, भागना, चीत्कार और विपरीत क्रियादि अनुभाव होते हैं।” 'प्रणय'—(भःरःसिः पःविः तृतीय लः)— “प्राप्तायां सम्भ्रमादीनां योग्यतायामपि स्फुटम्। तद्गन्धेनाप्यसंस्पृष्टा रतिः प्रणय उच्यते॥” अर्थात् “जिस रतिमें स्पष्टरूपसे सम्भ्रमादिकी प्राप्तिकी योग्यता रहते हुए भी यदि उसे सम्भ्रम लेशमात्र भी स्पर्श नहीं करता, तो उसे 'प्रणय' कहते हैं।” 68 ।