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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 918

[ 2/60-61 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

[बायाँ स्तम्भ] लगी और उनका मन चञ्चल हो गया। उनके भाव उनको कहाँ ले जायेंगे, यह कोई नहीं समझ सकता। श्रीकृष्णके दर्शन नहीं होनेसे उनका मन जलने लगा। वे श्रीकृष्णसे ही पूछने लगे कि किस उपायसे आपके दर्शन मिलेंगे? ॥ 60 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य- 'चापल'- चापल्य, चपलता ॥ 60 ॥

श्रीकृष्णकर्णामृत (32) बिल्वमङ्गलवाक्य :- त्वच्छैशवं त्रिभुवनाद्भुतमित्यवेहि मच्चापलञ्च तव वा मम वाधिगम्यम्। तत् किं करोमि विरलं मुरलीविलासि मुग्धं मुखाम्बुजमुदीक्षितुमीक्षणाभ्याम् ॥ 61 ॥

अनुवाद- अनुभाष्य देखें ॥ 61 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य- हे वंशीविलासी कृष्ण! तुम्हारा शैशव (कैशोर) माधुर्य त्रिभुवनमें अद्भुत है। मेरे चापल्यको तुम जानते हो और मैं जानती हूँ, इसे और कोई नहीं जानता है। इन दो नेत्रोंके द्वारा निर्जन स्थानमें तुम्हारे मुखकमलके दर्शनके लिये अब मैं क्या करूँ? ॥ 61 ॥

अनुभाष्य- हे मुरलीविलासि (गोपीचित्तहारिवंशीवादक,) त्वत् (तव) शैशवं मत् (मम) चापलं च त्रिभुवनाद्भुतं (त्रिलोकमध्ये विचित्रं) - तव वा मम वा (आवयोरव इत्यर्थः) अधिगम्यं (अन्यः कोऽपि न जानाति) विरलं (दुर्लभदर्शनं निर्जने वा) मुग्धं (गोपीमनोहरं) मुखाम्बुजं (वदनकमलं) ईक्षणाभ्यां (नेत्राभ्यां) यथेष्टम् उदीक्षितुम् (अवलोकयितुं) किं करोमि, [तदुपायं कथय]।

श्लोक-भावानुवाद- हे अपनी मधुर वंशीवादनसे गोपियोंके चित्तको हरण करनेवाले! तुम्हारा कैशोर और मेरा चापल्य त्रिभुवनमें अद्भुत हैं। इन्हें मैं और तुम ही जानते हैं, अन्य कोई नहीं। इसलिये अब वह उपाय बताओ जिससे निर्जनमें तुम्हारे गोपीमनोहर मुखकमलका अपने नेत्रोंसे यथेष्ट रूपसे दर्शन कर सकूँ? ॥ 61 ॥


[दायाँ स्तम्भ] अमृतानुकणिका- श्रीमती राधिका कह रही हैं कि मेरा चापल्य भी तुम्हारे द्वारा उत्पादित होता है, इसलिये तुम इसे जानते हो। और (यह चापल्य) मेरा होनेके कारण मैं भी इसे जानती हूँ। जैसे कोई दूसरेके दुःखको सम्पूर्ण रूपसे नहीं जान सकता, इसी प्रकार मेरे चापल्यको पूर्णरूपसे मेरी सखियाँ भी नहीं जानती हैं। पुनः उद्वेगकी वृद्धि होनेसे राधाजी कहने लगीं कि तुम्हारे मुखकमलको अपने दोनों नेत्रोंके द्वारा मन भरके देखनेके लिये क्या उपाय करूँ? जिससे उसका दर्शन हो, वह उपाय तुम बतलाओ। यदि श्रीकृष्ण कहें कि दर्शन न करनेसे तुम्हारा क्या आता-जाता है? तब उसके उत्तरमें कह रही हैं कि तुम्हारे 'मनोहर' मुखकमलको देखे बिना ये नेत्र धारण करना विफल है। जैसे दानकेलिकौमुदी (श्लोक 55) में- "भवतु माधवजल्पमशृण्वतोः श्रवणयोरलमश्रवणिर्मम। तमवलोकयतोर्विलोकनिः सखि विलोचनयोश्च किलानयोः ॥" अर्थात् श्रीराधारानी वृन्दासे कह रही हैं, - "हे सखि ! मेरे कानोंने माधवका गुणानुवाद नहीं सुना है, इसलिये इनका बहरा हो जाना ही अच्छा है। मेरे दोनों नेत्रोंने उनका अवलोकन नहीं किया है, इसलिये इनका अन्धा हो जाना ही अच्छा है।" यदि श्रीकृष्ण कहें कि अभी नहीं देखनेसे क्या होगा? प्रतीक्षा करो, बादमें मेरे दर्शन होंगे। इसके उत्तरमें राधाजी कहती हैं 'विरलं' अर्थात् मैं कुलवधू हूँ, मेरे लिये यह बहुत दुर्लभ है। उसपर भी तुम गोचारणादिके लिये सारा दिन वनमें चले जाते हो, इसलिये तुम्हारे दर्शन अतीव दुर्लभ हैं। अतएव इस समय निर्जन स्थानमें अवसर पाकर भी दर्शनदान नहीं करते हो, तो यह तुम्हारी निष्ठुरता है। अथवा कोई कहे कि उनके समान किसी औरको देखो, तो कह रही हैं 'विरलं' अर्थात् श्रीकृष्ण अतुलनीय हैं। उसका कारण है-'मुरलीविलासि', अर्थात् ऐसा मुरलीवादन करता मुखकमल किसी औरका नहीं है ॥ 61 ॥

66 ।