श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 917, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय 2/58-60 ] श्रीकृष्णकर्णामृत (41) :- अमून्यधन्यानि दिनान्तराणि हरेस्त्वदालोकनमन्तरेण। अनाथबन्धो करुणैकसिन्धो हा हन्त हा हन्त कथं नयामि ॥ 58 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 58 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे हरि ! हे अनाथबन्धु ! हे करुणाके एकमात्र सिन्धु ! आपके दर्शनके बिना हाय-हाय मैं ये अशुभ दिन-रात कैसे काटूँगा ? ॥ 58 ॥ अनुभाष्य- हे अनाथबन्धो (अनाथानां विरहविधुराणां गोपीनां बन्धुर्यः एवम्बिध) करुणैकसिन्धो (दयैकसमुद्र) [कृष्णादृते माधुर्यप्रेम सम्पत्त्यभावात् कोऽप्यन्यः गोपीः अनुकम्पयितुं न समर्थ इति भावः] हे हरे (गोपीजनकायमनोवाक्यहारिन्), त्वदालोकनं (भवद्दर्शनम्) अन्तरेण (बिना) हा हन्त ! हा हन्त! अधन्यानि (अशुभानि) अमूनि दिनानि * कथं (केन प्रकारेण) [तव सेवां बिना] नयामि (अतिवाहयामि)।
- दिनान्तराणि- “दिनस्य अहोरात्रस्य अन्तराणि मध्यगतानि क्षणवृन्द्वानि इति" (सारङ्ग-रङ्गदा)। [अर्थात् दिन और रातमें जो सब क्षण हैं, वे, अथवा करोड़ों कल्पोंके समान जिनका अतिक्रमण करना असम्भव है।] श्लोक-भावानुवाद-हे अनाथबन्धु (विरह-विधुर गोपियोंके बन्धु)! हे करुणैकसिन्धु (अर्थात् कृष्ण द्वारा आदृत माधुर्यप्रेम सम्पत्तिकी स्वामिनी गोपीपर अन्य कोई अनुकम्पा करनेमें समर्थ नहीं है)! हे हरे (गोपियोंके काय-मन-वाक्यको हरण करनेवाले)! तुम्हारे दर्शनके बिना हाय-हाय ये अशुभ दिन किस प्रकार तुम्हारी सेवाके बिना कटेंगे? ॥ 58 ॥ अमृतानुकणिका-श्रीराधाके भावोंमें विभावित महाप्रभुके हृदयमें विरहज्वाला और भी प्रज्ज्वलित हो उठी और एक क्षणकाल भी अनेक दिनोंके समान प्रतीत होने लगा, तब अतिशय खेद और विषादके साथ प्रलाप करने लगे, -'हाय हाय! तुम्हारे दर्शनके बिना ये कोटि कल्पोंके समान क्षण कैसे कटेंगे? यह तुम ही बताओ। तुम्हारे अदर्शनके कारण ये दिन सभी विफल हैं।' इसलिये आगे कहने लगे, -'हे अनाथबन्धो !' अपने पति-पुत्रादिको दुःखप्रद जानकर उन्हें त्याग करनेवाली हम अनाथा गोपियोंके तुम ही एकमात्र बन्धु हो।' यदि श्रीकृष्ण कहें कि तुम अपने पति आदिकी सेवा करते हुए अपने नारी धर्मका पालन करते हुए सुखपूर्वक गृहमें अवस्थानको त्यागकर मुझसे मिलनकी प्रार्थना क्यों कर रही हो? तो इसके उत्तरमें राधाजी कह रही हैं,-'हरे!' हे चित्त-इन्द्रियोंको हरण करनेवाले। तुमने हमारे चित्त और इन्द्रियोंका हरण किया है, इसमें तुम्हारा ही दोष है।' यदि श्रीकृष्ण कहें कि कामिनियोंमें तुम ही चपला नारी हो, तो मैं कैसे अपने धर्मका त्याग करूँ (मैं तो ब्रह्मचारी हूँ)? इसलिये दैन्यसहित राधाजी कह रही हैं, -'हे करुणासिन्धो !' तुम तो करुणाके सिन्धु हो, इसलिये धर्मका भी उल्लङ्घनकर मुझ दीनके प्रति अनुग्रह करो अर्थात् कृपाकर दर्शन दो ॥ '58 ॥ कृष्णविरहमें महाप्रभुका विलाप :- “तोमार दर्शन-बिने, अधन्य ए रात्रि-दिने, एइ काल ना याय काटन। तुमि अनाथेर बन्धु, अपार करुणासिन्धु, कृपा करि' देह दरशन ॥" 59 ॥ अनुवाद - "तुम्हारे दर्शन बिना ये अशुभ दिन-रात काटे नहीं कटते। हे कृष्ण! तुम अनाथोंके बन्धु और करुणाके अपार सिन्धु हो। अपने दर्शन देकर इस दीनपर कृपा करो॥"59॥ कृष्णदर्शनके लिये पागल :- उठिल भाव-चापल, मन हइल चञ्चल, भावेर गति बुझन ना याय। अदर्शने पोड़े मन, केमने पाव दरशन, कृष्ण-ठाञि पुछेन उपाय ॥ 60 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके हृदयमें भावोंकी लहरियाँ आने । 65