भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 916, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 916

[ 2/52-57 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला उसको भी सङ्कुचित करके परम सुख प्रदान करता है ॥ 52 ॥ अनुभाष्य-पौर्णमासी नान्दीमुखीसे कह रही हैं- हे सुन्दरि, पीडाभिः (यातनाभिः) नवकालकूट-कटुतागर्वस्य (नवकालकूटस्य सुतीव्रविषस्य यः कटुतागर्वः अन्यावज्ञा- रूपोग्रतामयभावः तस्य) निर्वासनः (दूरीकरणशीलः), मुदां निस्यन्देन (क्षरणेन) सुधामधुरिमाहङ्कारसङ्कोचनः (सुधायाः अमृतस्य यः मधुरिमा माधुर्यं तेन यः अहङ्कारः गर्वः तं सङ्कोचयति खर्वीकरोति यः) नन्दनन्दनपरः (कृष्णोद्देशकः) प्रेमा यस्य अन्तरे (हृदये) जागर्त्ति, अस्य (प्रेम्णः) वक्रमधुराः (कुटिलमाधुर्यसमन्विताः) विक्रान्तयः (प्रभावाः) तेन (जनेन) एव स्फुटं (स्पष्टं) ज्ञायन्ते (अनुभूयन्ते)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 52 ॥ कृष्णदर्शनसे महाप्रभुकी महाभाव-चेष्टा :- ये काले देखि जगन्नाथ, श्रीराम-सुभद्रा-साथ, तबे जानि-आइलाम कुरुक्षेत्र। सफल हैल जीवन, देखिलुँ पद्मलोचन, जुड़ाइल तनु-मन-नेत्र ॥ 53 ॥ अनुवाद-महाप्रभु जब श्रीजगन्नाथका बलराम और सुभद्राके साथ दर्शन करते, तो उन्हें ऐसा लगता कि वे कुरुक्षेत्रमें आकर श्रीकृष्णका दर्शन कर रहे हैं। वे सोचते कि उनका जीवन सफल हो गया है, क्योंकि कमलनयन श्रीकृष्णके दर्शन करके उनके तन-मन और नेत्र शीतल हो जाते हैं ॥ 53 ॥ गरुड़ेर सन्निधाने, रहिं करे दरशने, से आनन्देर कि कहिब ब'ले। गरुड़-स्तम्भेरे तले, आछे एक निम्न खाले, से खाल भरिल अश्रुजले ॥ 54 ॥ अनुवाद-महाप्रभु गरुड़-स्तम्भके निकट खड़े होकर श्रीजगन्नाथजीके दर्शन करते थे और उनको जो आनन्द होता था, उसका वर्णन कैसे करें? गरुड़-स्तम्भके नीचे एक खड्डा था और वह महाप्रभुके आनन्दाश्रुओंसे भर जाता था ॥ 54 ॥ अनुभाष्य-श्रीजगन्नाथ-मन्दिरके सम्मुख जगमोहनके अन्तमें एक स्तम्भ है [इसपर गरुड़जी विराजमान हैं, इसलिये] इसे गरुड़-स्तम्भ कहते हैं। इस स्तम्भके पीछे भागकी भूमिमें एक खड्डा था, वह भगवान् महाप्रभुके प्रेमाश्रुजलसे भर जाता था ॥ 54 ॥ पुनः कृष्णविरहका उद्दीपन :- ताँहा हैते घरे आसिं, माटीर उपरे बसि' नखे करे पृथिवी लिखन। “हा-हा काँहा वृन्दावन, काँहा गोपेन्द्रनन्दन, काँहा सेइ वंशीवदन ॥ 55 ॥ काँहा से त्रिभङ्गठाम, काँहा सेइ वेणुगान, काँहा सेइ यमुना-पुलिन। काँहा से रासविलास, काँहा नृत्यगीत-हास, काँहा प्रभु मदनमोहन ॥” 56 ॥ उठिल नाना भावोद्वेग, मने हैल उद्वेग, क्षणमात्र नारे गोड़ाइते। प्रबल विरहानले, धैर्य हैल टलमले, नाना श्लोक लागिला पड़िते ॥ 57 ॥ अनुवाद-श्रीजगन्नाथ मन्दिरसे महाप्रभु घर लौटकर आते और भूमिपर बैठकर अपने नाखूनोंसे पृथ्वीपर कुछ लिखते। उस समय विषादकी दशामें क्रन्दन करते और कहते,―“हा! हा! कहाँ है वृन्दावन? नन्दनन्दन कृष्ण कहाँ हैं? कहाँ हैं वे वंशीवदन? कहाँ हैं वे त्रिभङ्ग-ललित कृष्ण? कहाँ है उनका मधुर वंशीगान? कहाँ है वह यमुनाका तट? कहाँ है वह रास-विलास? कहाँ है वह नृत्य-गान और हास-परिहास? कहाँ हैं मेरे प्रभु मदनमोहन?” इस प्रकार महाप्रभुके मनमें अनेक भावोंका वेग आता और उनका मन उद्विग्न हो जाता। इनसे वे एक क्षण भी नहीं निकल पाते। प्रबल विरहाग्निमें उनका धैर्य डगमगाने लगा और वे नाना श्लोक पढ़ने लगे ॥ 55-57 ॥ 64 ।