श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 939, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 3/30-40 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीअद्वैताचार्यका आगमन :- गङ्गाय यमुना बहे हञा एकधार। हेनकाले आचार्य-गोसाञि नौकाते चड़िञा। पश्चिमे यमुना बहे, पूर्वे गङ्गाधार॥ ३६॥ आइल नूतन कौपीन-बहिर्वास लञा॥ ३०॥ महाप्रभुको नया कौपीन देना और निमन्त्रण :- श्रीअद्वैतके दर्शनसे महाप्रभुको सन्देह और जिज्ञासा :- पश्चिमधारे यमुना बहे, ताँहा कैले स्नान। आगे आचार्य आसि' रहिला नमस्कार करि'। आर्द्र कौपीन छाड़ि' शुष्क कर परिधान॥ ३७॥ आचार्य देखि' बले प्रभु मने संशय करि'॥ ३१॥ प्रेमावेशे तिन दिन आछ उपवास। “तुमि त' आचार्य-गोसाञि, एथा केने आइला। आजि मोर घरे भिक्षा, चल मोर वास॥ ३८॥ आमि वृन्दावने, तुमि केमते जानिला॥” ३२॥ कहीं महाप्रभु अस्वीकार न करें, इसी भयसे अपने घरमें श्रीअद्वैतका सरल भावसे महाप्रभुको उत्तर देना :- भिक्षाकी सामग्रीका सामान्य रूपसे वर्णन :- आचार्य कहे,–“तुमि याँहा, सेइ वृन्दावन। एकमुष्टि अन्न मुञि करियाछौं पाक। मोर भाग्ये गङ्गातीरे तोमार आगमन॥” ३३॥ शुखरुखा व्यञ्जन कैलुँ, सूप आर शाक॥” ३९॥ अनुवाद—उस समय श्रीअद्वैताचार्य नौकामें नये अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—“श्रीपाद नित्यानन्दके कौपीन और बहिर्वास (बाहर पहननेवाले कपड़े) लेकर वचन मिथ्या नहीं हैं। आपने अभी यमुनामें ही स्नान आये और महाप्रभुके सामने आकर उन्हें प्रणाम किया। किया है। (प्रयागके बाद) गङ्गा और यमुना मिलकर श्रीअद्वैताचार्यको देखकर महाप्रभुके मनमें संशय हुआ। एक धाराके रूपमें बहती हैं, पश्चिमकी ओरवाली धारा [महाप्रभु अभी आवेशमें ही थे, इसलिये] उन्होंने उनसे यमुना है और पूर्वकी ओरवाली धारा गङ्गा है। पश्चिम पूछा,—“आप तो अद्वैताचार्य हैं ना, आप यहाँ कैसे धारामें यमुना बह रही हैं, वहीं आपने स्नान किया। आये? मैं वृन्दावनमें हूँ, यह आपने कैसे जाना?” अब आप गीले कौपीनको छोड़कर सूखे वस्त्र धारण श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—“आप जहाँपर हैं, वह स्थान ही करें। प्रेमके आवेशमें आपने तीन दिनतक उपवास वृन्दावन है। यह मेरा सौभाग्य है कि आप गङ्गातटपर किया है। आज मेरे घर चलकर भिक्षा ग्रहण करें। आये हैं॥”३०-३३॥ मैंने केवल एक मुट्ठी भर अन्न (चावल) पकाया है। साथमें एक सूखी सब्जी, एक रसेवाली सब्जी और श्रीअद्वैतके समक्ष श्रीनिताइकी चतुरायीका वर्णन :- शाक है॥”३५-३९॥ प्रभु कहे,–“नित्यानन्द आमारे वञ्चिला। गङ्गाके आनिया मोरे यमुना कहिला॥” ३४॥ अनुभाष्य—‘शुखरुखा व्यञ्जन’—सूखी सब्जी; ‘सूप’—रसा॥३९॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने कहा,—“नित्यानन्दने मेरे महाप्रभुको शान्तिपुरमें अपने घरमें लाना और सत्कार :- साथ छल किया। मुझे गङ्गाके तटपर लाकर उन्होंने एत बलि' नौकाय चढ़ाञा निल निज-घर। इसे यमुना बतलाया॥” ३४॥ पादप्रक्षालन कैल आनन्द-अन्तर॥ ४०॥ श्रीअद्वैतके द्वारा श्रीनिताइ-वाक्यका समर्थन अनुवाद—यह कहकर श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुको और सत्यताका प्रतिपादन :- नौकापर चढ़ाकर अपने घर ले आये। घर पहुँचकर आचार्य कहे,–“मिथ्या नहे श्रीपाद-वचन। महाप्रभुके चरणोंको धोकर श्रीअद्वैताचार्यके हृदयमें बहुत यमुनाते स्नान तुमि करिला एखन॥ ३५॥ आनन्द हुआ॥ ४०॥ 88 ।