भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 940

तीसरा अध्याय 3/41–55 ] सीता-ठाकुराणीके द्वारा रसोई और स्वयं श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा भोग-निवेदन :- प्रथमे पाक करियाछेन आचार्याणी। विष्णु-समर्पण कैल आचार्य आपनि॥ 41 ॥ दोनों प्रभु (महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द) और श्रीकृष्ण-इन तीनोंके लिये तीन पात्रोंमें नैवेद्यको सजाना :- तिनठाञि भोग बाड़ाइल सम करि'। कृष्णेर भोग बाड़ाइल धातु-पात्रोपरि ॥ 42 ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यकी पत्नी सीता ठाकुराणीने पहलेसे ही भोग बना रखा था और तब श्रीअद्वैताचार्यने उसे भगवान् विष्णुको निवेदन किया। उन्होंने उस भोगको तीन बराबर भागोंमें सजाया। उनमेंसे एक भागको धातुके पात्रके ऊपर रखकर उसे श्रीकृष्णको निवेदनके लिये रखा॥ 41-42 ॥ नैवेद्यका वर्णन :- बत्तिशा-आठिया-कलार आङ्गटिया पाते। दुइ ठाञि भोग बाड़ाइल भाल मते॥ 43 ॥ मध्ये पीत-घृतसिक्त शाल्यन्नेर स्तूप। चारिदिके व्यञ्जन-डोङ्गा, आर मुदगसूप ॥ 44 ॥ साद्रक, वास्तुक-शाक विविध प्रकार। पटोल, कुष्माण्ड-बड़ि, मानकचु आर ॥ 45 ॥ चङ्ग-मरिच-सुखुत दिया सब फल-मूले। अमृतनिन्दक पञ्चविध तिक्त-झाले ॥ 46 ॥ कोमल निम्बपत्र सह भाजा वार्त्ताकी। पटोल-फुलबड़ि-भाजा, कुष्माण्ड-मानचाकी ॥ 47 ॥ नारिकेल-शस्य, छाना, शर्करा मधुर। मोचाघण्ट, दुग्धकुष्माण्ड, सकल प्रचुर॥ 48 ॥ मधुराम्लबड़ा, अम्लादि पाँच-छय। सकल व्यञ्जन कैल लोके यत हय॥ 49 ॥ मुद्गबड़ा, माषबड़ा, कलाबड़ा, मिष्ट। क्षीरपुली, नारिकेल, यत पिठा इष्ट॥ 50 ॥ बत्तिशा-आठिया-कलार डोङ्गा बड़ बड़। चले हाले नाहि, डोङ्गा अति बड़ दृढ़ ॥ 51 ॥ पञ्चाश पञ्चाश डोङ्गा व्यञ्जने पूरिञा। तिन भोगेरे आशे पाशे राखिल धरिञा ॥ 52 ॥ सघृत-पायस नव-मृत्कुण्डिका भरिञा। तिन पात्रे घनावर्त्त-दुग्ध राखेत धरिञा ॥ 53 ॥ दुग्ध-चिड़ा-कला आर दुग्ध-लक्लकी। यतेक करिल, ताहा कहिते ना शक्ति ॥ 54 ॥ दुइ पाशे धरिल सब मृत्कुण्डिका भरि'। चाँपाकलि-दधि-सन्देश कहिते ना पारि॥ 55 ॥ अनुवाद-'बत्तिशा-आठिया-कला' अर्थात् जिस केलेके वृक्षकी डालपर कम-से-कम बत्तीस केलोंका गुच्छा आता है, उस वृक्षके अखण्ड (कहींसे भी न कटे) पत्तोंके ऊपर निम्नलिखित व्यञ्जनोंवाले भोगके बाकी दो भागोंको अच्छी प्रकार सजाकर रखा। भोगपात्रके बीचमें पीले रङ्गके घीसे युक्त उत्तम धानके चावलको स्तूपके आकारमें रखा गया तथा उस चावलके स्तूपके चारों ओर केलेके पत्तेसे बने दोनोंमें नाना प्रकारके व्यञ्जन सजाये गये। उनमें मूँगकी दाल, अनेक प्रकारके साग, परमल, कच्चे पेठेके साथ दाल मिलाकर बनायी गयी बड़ी, अरबी आदिको सजाया गया। तीखी मिर्च अथवा तीखे और कटु मसालोंके साथ कच्चे केले, पपीते, कन्दमूल, मूली आदिके द्वारा बनायी गयी पाँच प्रकारकी ऐसी तरकारियाँ, जो अमृतको भी निन्दित करने वाली थीं। इन व्यञ्जनोंमें कोमल-कोमल नीमके पत्तेसे युक्त बैंगन, परमल और नर्म बड़ीका भाजा तथा सरसोंका छौंक लगाकर कच्चे पेठे और अरबीकी सूखी सब्जी थी। नारियलके गूदे, पनीर और शक्करसे बना हुआ मधुर मिष्ठान, केलेके फूलसे बनी सब्जी, दूधमें कच्चे पेठेको डालकर बनाया गया व्यञ्जन-ये सभी प्रचुर मात्रामें बनाये गये थे। खट्टा-मीठा बड़ा, पाँच-छह । 89