श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 3/44-62 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला प्रकारके खट्टे पदार्थादि तथा जितने प्रकारके व्यञ्जन लोक-प्रसिद्ध हैं, उन्हें भी भोगमें सजाया। मूँगकी दालका बड़ा, उड़दकी दालका बड़ा, केलेका बड़ा, रबड़ी और नारियल और अनेक प्रकारका पीठा बनाया गया था। बत्तिशा-आठिया केलेके पत्तोंके दोने बड़े और बहुत मजबूत थे, इसलिये वे हिल-डुल नहीं रहे थे। इस प्रकार पचास-पचास दोने व्यञ्जनोंसे भरकर तीनों भोगोंके आस-पास रखे गये थे। घीसे बनी खीरको नये मिट्टीके बर्तनोंमें भरकर रखा गया था तथा तीन पात्रोंमें दूधको गाढ़ा करके बनायी रबड़ी भी रखी गयी। चिड़वा और केलेको दूधमें मिलाकर बनाये गये व्यञ्जन तथा लौकीकी खीर आदि जितने और व्यञ्जन प्रस्तुत किये गये, जिनका वर्णन करना सम्भव नहीं है, वे मिट्टीके कसोरोंमें रखे हुए थे। छोटे-छोटे केले, दही और सन्देश आदि विविध प्रकारके व्यञ्जन भी थे, जिनका वर्णन करना सम्भव नहीं है॥ 44-55 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- ‘बत्तिशा-आठिया-कलार आङ्गटिया’—जिसमें बत्तीस या अधिक केलोंका गुच्छा आता है, ऐसा केलेका वृक्ष। आङ्गटिया अर्थात् अखण्ड केलेका पत्ता ॥ 43 ॥ अनुभाष्य-ग्रन्थकार श्रील कविराज गोस्वामी अपनी पाक-कलाके नैपुण्यको सुन्दर रूपसे प्रदर्शित कर रहे हैं। ‘लोके’—जगत्में। ‘इष्ट’—प्रयोजनीय, वाञ्छित। ‘चले-हाले नाहि’—हिलता-डुलता नहीं। ‘दृढ़’—दृढ़, मजबूत। ‘शक्ति’—कर सकता हूँ॥ 44-55 ॥ नैवेद्यके ऊपर तुलसी और उसके साथ आचमन-जल प्रदान करना :- अन्न-व्यञ्जन-उपरि दिल तुलसीमञ्जरी। तिन जलपात्रे सुवासित जल भरि' ॥ 56 ॥ तिन शुभ्रपीठ, तार उपरि वसन। कृष्णेर भोग साक्षात् कृष्णे कराइल भोजन ॥ 57 ॥ अनुवाद—तब श्रीअद्वैताचार्यने उन सब अन्न और व्यञ्जनोंके ऊपर तुलसी मञ्जरी रख दी और तीन जलपात्रोंमें सुगन्धित जल भरकर रख दिया तथा भोग लगानेके उद्देश्यसे तीन सुन्दर लकड़ीके आसनोंपर कपड़ा बिछा दिया। इस प्रकार श्रीअद्वैताचार्यने भगवान् श्रीकृष्णके लिये सजाये गये भोगको साक्षात् श्रीकृष्ण (महाप्रभु)को भोजन कराया॥ 56-57 ॥ अनुभाष्य- ‘साक्षात् कृष्णे’—श्रीमन् महाप्रभुको ॥ 57 ॥ स्वयं श्रीअद्वैतके द्वारा आरती-सम्पादन और दोनों प्रभुओंका अपने भक्तोंके साथ आरती-दर्शन :- आरतिर काले दुइ प्रभु बोलाइल। प्रभु-सङ्गे सबे आसिं आरति देखिल ॥ 58 ॥ अनुवाद—भोग निवेदन करनेके बाद भोग-आरतीके समय श्रीअद्वैताचार्य प्रभुने महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुको बुलवा लिया। महाप्रभुके साथ आकर सभी भक्तोंने आरतीके दर्शन किये॥ 58 ॥ ठाकुरको शयन प्रदान करना :- आरति करिया कृष्णे करा'ल शयन। आचार्य आसिं प्रभुरे तबै कैला निवेदन ॥ 59 ॥ दोनों प्रभुओंका भोजन करनेके लिये घरके भीतर आना :- दुइ भाइ आइला तबै करिते भोजन। गृहेर भितरे प्रभु करेन गमन ॥ 60 ॥ अनुवाद-आरती करके श्रीअद्वैताचार्य प्रभुने श्रीकृष्णको शयन कराया और महाप्रभुके पास आकर घरके भीतर आनेका निवेदन किया। उनकी प्रार्थनाको सुनकर दोनों भाई भोजन करनेके लिये अन्दर आये॥ 59-60 ॥ मुकुन्द और हरिदासको भोजनके लिये प्रार्थना करनेपर उन दोनोंकी अपनी मर्यादाकी रक्षा और दैन्य-विनय :- मुकुन्द, हरिदास,–दुइ प्रभु बोलाइल। जोड़हाते दुइ जन कहिते लागिल ॥ 61 ॥ मुकुन्द बोले,–“मोर किछु कृत्य नाहि सरे। पाछे मुञि प्रसाद पामु, तुमि याह घरे ॥”62 ॥ 90 ।