श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 3/69-74 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला आसनोंपर बैठ जाइये।” यह कहकर श्रीअद्वैताचार्यने उनको हाथोंसे पकड़कर आसनपर बैठा दिया॥ ६९॥ महाप्रभुकी विधिमार्गमें आचार्योचित वैराग्य-लीला :- प्रभु कहे, — “संन्यासीर भक्ष्य नहे उपकरण। इहा खाइले कैछे हय इन्द्रिय-वारण॥” 70॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “संन्यासीके लिये इतने प्रकारके व्यञ्जनोंका भोजन करना उचित नहीं है। इन्हें खाकर अपनी इन्द्रियोंपर संयम कैसे रखा जा सकता है?” ॥ 70 ॥ अनुभाष्य — 'उपकरण'—दाल, सब्जी आदि जिनके साथ उत्तम स्वाद लेते हुए चावलका भोजन किया जा सकता है। परन्तु संन्यासीका जिह्वाको अच्छे लगनेवाले द्रव्योंमें अधिकार नहीं है। इन्द्रियोंको प्रिय लगनेवाली वस्तुओंके सेवनसे भोग प्रवृत्ति और अधिक प्रबल होती है, इसलिये महाप्रभुने वैराग्य प्रधान भक्तोंके सम्बन्धमें श्रीरघुनाथदास गोस्वामीको कहा था— “भाल ना परिबे आर भाल ना खाइबे।” अर्थात् “बहुत अच्छे-अच्छे वस्त्र मत पहनना और बहुत स्वादिष्ट वस्तुएँ मत खाना।” भक्तगण कृष्णप्रसादके अतिरिक्त कभी भी और कोई वस्तु ग्रहण नहीं करते। धनी गृहस्थ व्यक्ति अत्यन्त स्वादिष्ट लगनेवाले उत्तम-उत्तम द्रव्योंका श्रीकृष्णको भोग अर्पण करते हैं। श्रीकृष्णविलासके सहचर मुखशुद्धि ताम्बूल (पान), सुगन्धित मसाले, पुष्प-मालाएँ, पलङ्ग, वस्त्र, आभूषणादि प्रसादी वस्तुएँ यद्यपि वैष्णवोंके लिये आदरणीय हैं, तथापि महाप्रभुकी आज्ञानुसार अकिञ्चन वैष्णव अपनी देहको घृणित प्राकृत मानकर इन वस्तुओंको स्वीकार करनेमें अपनी अयोग्यता दिखलाते हैं कि इसके द्वारा अपराध होगा। वैष्णवाभिमानी अवैष्णव सहजिया आदि अनर्थोंमें प्रवृत्त व्यक्ति महाप्रभुके आदेशके तात्पर्यको समझनेमें असमर्थ हैं॥ 70॥ गौरगतप्राण आचार्यके द्वारा महाप्रभुको भोजनके लिये अत्यधिक अनुरोध :- आचार्य कहे, — “छाड़ तुमि आपनार चुरि। आमि जानि तोमार संन्यासेर भारिभूरि॥ 71॥ भोजन करह, छाड़ वचन चातुरी।” प्रभु कह, — “एत अन्न खाइते ना पारि॥” 72॥ आचार्य बोले, — “अकपटे करह आहार। यदि ना खाइते पार, रहिबेक आर॥” 73॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने कहा, — “आप अपने आपको छिपानेकी चेष्टा मत करो। मैं आपको और आपके संन्यास ग्रहणके रहस्यको भी अच्छी तरह जानता हूँ। अपनी वाक्-चातुरीको छोड़कर भोजन कीजिये।” यह सुनकर महाप्रभुने कहा, — “मैं इतना भोजन नहीं कर सकता।” श्रीअद्वैताचार्य कहने लगे, — “आप बहाने मत बनाइये और भोजन कीजिये। यदि पूरा नहीं खा सकते, तो उच्छिष्ट पत्तेमें ही छोड़ दीजिये॥” 71-73 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'भारिभूरि'— गोपनीय बात ॥ 71॥ भोजन-पात्रमें उच्छिष्ट छोड़ना संन्यासीके लिये निषेध :- प्रभु बोले, — “एत अन्न नारिब खाइते। संन्यासीर धर्म नहे उच्छिष्ट राखिते॥” 74॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “मैं इतना भोजन नहीं खा सकूँगा और उच्छिष्ट छोड़ना संन्यासीका धर्म नहीं है॥” 74॥ अनुभाष्य—संन्यासी उच्छिष्ट नहीं छोड़ते (भाः 11/18/19)— “बहिर्जलाशयं गत्वा तत्रोपस्पृश्य वाग्यतः। विभज्य पारितं शेषं भुञ्जीताशेषमाहृतम्॥” अर्थात् “संन्यासी भिक्षा प्राप्त करनेके पश्चात् ग्रामके बाहर स्थित जलाशयमें जाकर स्नान-आचमन करके जलके द्वारा भिक्षाको पवित्र कर ले। फिर शास्त्रोक्त पद्धतिसे जिन्हें भिक्षाका भाग देना चाहिये, 92 ।