भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 944, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 944

तीसरा अध्याय 3/74-83 ] उन्हें देकर जो कुछ बचे उसे मौन रहकर पूरा खा लेना चाहिये। दूसरे समयके लिये बचाकर न रखे और न ही अधिक माँगकर लाये।” उक्त श्लोककी श्रील विश्वनाथ चक्रवर्तीकी टीका— “विभज्य विष्णु ब्रह्मार्कभूतैभ्यः, अशेषमिति भोजनपात्रेऽवशिष्टं न रक्षणीयमित्यर्थः।” अर्थात् “विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य आदि देवताओं तथा अन्य प्राणियोंके उद्देश्यसे विभक्त करके बचे हुए भोजनको पूरा खाकर भोजनपात्रमें अवशिष्ट न छोड़े—यह अर्थ है॥”74॥ आचार्यका महाप्रभुपर आक्षेप और दीनता प्रदर्शन :- आचार्य बले,—“नीलाचले खाओ चौयान्नबार। एकबारे अन्न खाओ शत शत भार ॥ 75॥ तीन जनार भक्ष्यपिण्ड—तोमार एक ग्रास। तार लेखाय एइ अन्न नहे पञ्चग्रास ॥ 76॥ मोर भाग्ये, मोर घरे, तोमार आगमन। छाड़ह चातुरी, प्रभु, करह भोजन ॥”77॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य (महाप्रभुको श्रीजगन्नाथसे अभिन्न जानते हुए) कहने लगे,—“नीलाचलमें (श्रीजगन्नाथ रूपमें) तो आप चौवन बार भोजन करते हो और एक-एक बारमें सौ-सौ पात्रोंमें भरे हुए अन्न खा जाते हो। तीन लोग जितना भोजन करते हैं, उतना तो आपका एक ग्रास मात्र होता है। उस अनुपातमें तो यह अन्न आपके पाँच ग्रासके भी बराबर नहीं है। मेरे परम सौभाग्यसे आज आपका मेरे घरमें आगमन हुआ है। इसलिये हे प्रभो! अपनी चतुराईको छोड़कर भोजन करो॥”75-77॥ अनुभाष्य—'लेखाय'—अनुपातमें॥ 76॥ दोनों प्रभुओंका अलग-अलग जलसे आचमन करनेके बाद भोजन आरम्भ :- एत बलि' जल दिल दुइ गोसाञिर हाते। हासिया लागिला दुँहे भोजन करिते ॥ 78 ॥ अनुवाद—इतना कहकर श्रीअद्वैताचार्यने दोनों प्रभुओंके हाथोंमें आचमनके लिये जल दिया और दोनों हँसते हुए भोजन करने लगे॥78॥ श्रीअद्वैतके साथ श्रीनिताइका प्रेम कौतुकमय-कलह :- नित्यानन्द कहे,—“कैलुँ तिन उपवास। आजि पारणा करिते बड़ छिल आश ॥ 79॥ आजि उपवास हैल आचार्य-निमन्त्रणे। अर्धपेट ना भरिल एइ ग्रासेक अन्ने ॥”80॥ अनुवाद—तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने उपहास करते हुए कहा,—“मैं तीन दिनसे उपवास कर रहा हूँ और आज पारण करनेकी अर्थात् पेट भरकर खानेकी बड़ी आशा थी। श्रीआचार्यने मुझे अपने घरपर भोजनके लिये निमन्त्रण तो दिया है, परन्तु लगता है आज भी उपवास करना पड़ेगा, क्योंकि केवल इस एक ग्रास अन्नसे मेरा आधा पेट भी नहीं भरेगा॥”79-80॥ आचार्य कहे,—“तुमि तैर्थिक संन्यासी। कभु फल-मूल खाओ, कभु उपवासी ॥ 81 ॥ दरिद्र-ब्राह्मण-घरे ये पाइला मुष्टिकात्र। इहाते सन्तुष्ट हओ, छाड़ लोभ-मन ॥”82॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—“आप तीर्थोंमें भ्रमण करनेवाले एक संन्यासी हो। (वहाँ तो आपको भर पेट भोजन नहीं मिलता) इसलिये कभी मिल जाय, तो आप फल-मूल खाते हो और वह भी नहीं मिले, तो उपवास करते हो। इस दरिद्र ब्राह्मणके घर जो मुट्ठी भर अन्न आपको मिला है, उसीमें सन्तुष्ट रहो, मनमें अधिक लोभ मत करो॥”81-82॥ नित्यानन्द बले,—“यबे कैले निमन्त्रण। तत दिते चाह, यत करिये भोजन ॥”83॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,—“मैं जो भी हूँ, परन्तु आपने मुझे भोजनके लिये निमन्त्रण । 93