भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 945, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 945

[ 3/81-90 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला दिया है। इसलिये मैंने जितना खाना है, उतना आपको देना पड़ेगा॥”83॥ शुनि' नित्यानन्देर कथा ठाकुर अद्वैत। कहेन ताँहारे किछु पाइया पिरीत॥84॥ “भ्रष्ट अवधूत तुमि, उदर भरिते। संन्यास लइयाछ, बूझि, ब्राह्मण दण्डिते॥85॥ तुमि खेते पार दश-विश मानेर अन्न। आमि ताहा काँहा पाब, दरिद्र ब्राह्मण॥86॥ ये पाञाछ मुष्टिकान्न, ताहा खाञा उठ। पागलामि ना करिह, ना छाड़ाइओ झूठ॥”87॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुकी बातको सुनकर श्रीअद्वैताचार्य प्रभुने भी परिहास करते हुए कहा, — “तुम एक भ्रष्ट अवधूत हो। मैं जानता हूँ कि अपना पेट भरनेके लिये ही तुमने संन्यास लिया है और मुझ जैसे सरल ब्राह्मणोंको परेशान करते हो। तुम तो दस-बीस 'मान' चावल खा सकते हो। मैं दरिद्र ब्राह्मण हूँ। इतना चावल कहाँसे लाऊँगा ? इसलिये जो एक मुट्ठी अन्न मिला है, उसे खाकर उठ जाओ। पागलपन मत करो और कुछ झूठा भी मत छोड़ना॥”84-87॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'मान'-चार सेर (लगभग साढ़े तीन किलो) को एक 'मान' कहते हैं॥ 86॥ अनुभाष्य—'तैर्थिक संन्यासी'—श्रीनित्यानन्द प्रभु स्वयं अवधूत होनेपर भी तीर्थ भ्रमण करनेवाले बहुदक संन्यासीका अभिनय कर रहे थे। 85 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'भ्रष्ट'—प्राकृत-स्मार्त्तसमाज-भ्रष्ट अर्थात् विधि और निषेधसे अतीत, यहाँ निन्दाके छलसे स्तुतिके अर्थमें व्यवहार हुआ है। संन्यासकी चरम अवस्था—परमहंस कहलाती है; उसीका ही दूसरा नाम 'अवधूत' है। अवधूत स्वेच्छाचारी होते हैं। विषय ग्रहण करनेपर भी वे विषयोंके द्वारा बाध्य नहीं है। संन्यासके चिह्न वे कभी तो ग्रहण करते हैं और कभी परित्याग करते हैं। श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा कहे गये ये सब वचन परिहासमात्र हैं, वास्तवमें सत्य नहीं हैं। कोई-कोई खड़दहमें त्रिपुरासुन्दरीको श्रीश्यामसुन्दरके साथ अधिष्ठित देखकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके अवधूत आचरणको शाक्त सम्प्रदायके कौल-अवधूतका आचरण समझकर भ्रमित होते हैं— “अन्तः शाक्तः बहिः शैवः सभायां वैष्णवो मतः।” अर्थात् “अन्तरमें शाक्त, बाहरसे शैव और सभामें वैष्णव”—वास्तवमें ऐसा नहीं है। श्रीनित्यानन्दस्वरूप एक वैदिक-संन्यासीके अनुगत 'स्वरूप'-नामक ब्रह्मचारी हैं अर्थात् वैदिक-संन्यासी गुरुने उन्हें ब्रह्मचारी नाम 'स्वरूप' दिया था, परन्तु वास्तवमें वे स्वयं परमहंस हैं। और कोई-कोई कहते हैं कि श्रीलक्ष्मीपति तीर्थ ही उनके आचार्य (गुरु) हैं, किन्तु वैसा होनेपर भी वे श्रीमध्व सम्प्रदायके ही अन्तर्गत हैं, — वे बङ्गदेशीय तान्त्रिक नहीं हैं। 'झूट'—उच्छिष्ट ॥ 81-87 ॥ श्रीअद्वैत और श्रीनिताइ दोनों प्रभुओंके प्रीतिपूर्वक कलह-कौतुकको देखकर महाप्रभुका हँसना :— एइ मत हास्यरसे करेन भोजन। अर्ध-अर्ध खाञा प्रभु छाड़ेन व्यञ्जन ॥ 88 ॥ आचार्यकी इच्छानुसार महाप्रभुका परिपूर्ण भोजन :— सेइ व्यञ्जन आचार्य पुनः करेन पूरण। एइ मत पुनः पुनः परिवेशे व्यञ्जन ॥ 89 ॥ अनुवाद—इस प्रकार परस्पर हास-परिहास करते हुए दोनों प्रभु भोजन कर रहे थे। महाप्रभु थोड़ा-थोड़ा खाकर हर व्यञ्जन दोनेमें छोड़ रहे थे। श्रीअद्वैताचार्य उन-उन व्यञ्जनोंसे दोने पुनः भर देते थे। इस प्रकार श्रीअद्वैताचार्य बार-बार व्यञ्जन परोस रहे थे॥ 88-89 ॥ दोना व्यञ्जने भरि' करेन प्रार्थन। प्रभु बलेन,–“आर कत करिब भोजन ॥”90॥ 94 ।