भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 946, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 946

तीसरा अध्याय 3/90-98 ] आचार्य कहे, — “ये दियाछि, ताहा ना छाड़िबा। एखन ये दिये, तार अर्द्धेक खाइबा ॥” 91 ॥ नाना यत्ने-दैन्ये प्रभुर कराइल भोजन। आचार्येर इच्छा प्रभु करिल पूरण ॥ 92 ॥ अनुवाद—इस प्रकार दोने व्यञ्जनोंसे भरकर श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुसे और भोजन करनेके लिये प्रार्थना करने लगे, तो महाप्रभु बोले, — “और कितना भोजन करूँगा?” श्रीअद्वैताचार्यने कहा, — “मैंने जो पहले दिया है, उसे मत छोड़ना। और अब जो दिया है, उसका आधा तो खाइयेगा ही।” इस प्रकार श्रीअद्वैताचार्यने बड़े यत्नसे और दीनतापूर्वक महाप्रभुको भोजन कराया। महाप्रभुने भी श्रीअद्वैताचार्यकी इच्छाको पूर्ण किया ॥ 90-92 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘दोना'—दोना। ‘करेन प्रार्थना'— खानेके लिये प्रार्थना करना ॥ 90 ॥ आधा पेट भरे होनेका भान करते हुए कृत्रिम क्रोध भरे श्रीनिताइका एक मुट्ठी अन्न फेंकना :— नित्यानन्द कहे, — “आमार पेट ना भरिल। लञा याह, तोर अन्न किछु ना खाइल ॥” 93 ॥ एत बलि' एकग्रास अन्न हाते लञा। उझालि' फेलिल आगे येन क्रुद्ध हञा ॥ 94 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा, — “मेरा पेट ही नहीं भरा। अपना भोजन वापिस ले जाओ, मैंने तुम्हारे अन्नमेंसे कुछ भी नहीं खाया है।” इतना कहकर उन्होंने चावलका एक ग्रास हाथमें लेकर फेंककर सामने भूमिपर बिखेर दिया जैसे वे क्रोधमें हैं॥ 93-94 ॥ अनुभाष्य—‘उझालि'—बिखेरना ॥ 94 ॥ श्रीनिताइके द्वारा फेंके हुए उच्छिष्टका अङ्गोंसे स्पर्श होनेसे श्रीअद्वैतका प्रेमपूर्वक नृत्य :— भात दुइ-चारि लागे आचार्येर अङ्गे। भात गाये लञा आचार्य नाचे बहुरङ्गे ॥ 95 ॥ “अवधूतेर झूटा मोर लागिल अङ्गे। परम पवित्र मोरे कैल एइ ढङ्गे ॥ 96 ॥ निन्दाके छलसे श्रीअद्वैतके द्वारा श्रीनित्यानन्द-स्तुति :— तोरे निमन्त्रण करि' पाइनु तार फल। तोर जाति-कुल नाहि, सहजे पागल ॥ 97 ॥ आपनार सम मोरे करिबार तरे। झूठा दिले, विप्र बलि' भय ना करिले ॥” 98 ॥ अनुवाद—फेंके हुए चावलके दो-चार दाने श्रीअद्वैताचार्यके अङ्गमें लगे। वे अङ्गोंमें चावल लगे-लगे ही तरह-तरहसे नाचने लगे और कहने लगे, — “इस अवधूतका जूठा मेरे अङ्गसे लगा है। इस प्रकार उसने मुझे परम पवित्र कर दिया है। तुम्हें निमन्त्रण देकर मैंने उसका फल पा लिया है। तुम्हारा जाति-कुल आदि कुछ भी निश्चित नहीं है। तुम तो स्वभावसे पागल हो। मुझे अपने जैसे पागल बनानेके लिये ही तुमने अपना जूठा मेरे अङ्गोंपर फेंका है। मैं ब्राह्मण हूँ, इस बातका भी तुम्हें भय नहीं हुआ।” (यह श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा श्रीनित्यानन्द प्रभुकी निन्दाके छलसे स्तुति ही है) ॥ 95-98 ॥ अनुभाष्य—‘अवधूत'—असंस्कृतदेह (भाः 3/1/19 श्लोककी श्रीधरस्वामी-टीका देखें)। परमहंस-आचरणकी लीला करनेवाले श्रीनित्यानन्द प्रभुने अन्नको फेंककर पागलपन जैसे व्यवहारको दिखानेका छल किया। अभक्त स्मार्त्तसमाजकी विधिके अनुसार उच्छिष्टके स्पर्शसे व्यक्ति अपवित्र हो जाता है, परन्तु इस उच्छिष्टके स्पर्शसे अपवित्र होनेके बदले वास्तवमें मैं (अद्वैताचार्य) परम पवित्र और शुद्ध हुआ था। वैष्णव अथवा परमहंसका उच्छिष्ट—महामहाप्रसाद होता है, वह स्वयं चेतनमय विष्णुके समान है। महामहाप्रसाद अभक्तोंकी इन्द्रियोंकी तृप्ति करनेवाला साधारण चावल-दाल नहीं है। वर्णाश्रमसे अतीत परमहंसश्रेष्ठ श्रीगुरुदेवके या परमहंस अर्थात् वैष्णवोंके । 95

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