श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 3/96-102 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
उच्छिष्टका स्पर्श और सेवनरूपी सङ्ग सांसारिक जीवोंके हृदयमें स्थित हरि-विमुखताको सम्पूर्ण रूपसे दूर करके उनको अप्राकृत परमहंस-दास्यरूप शुद्ध ब्राह्मणत्वमें प्रतिष्ठित करता है, —यही आचार्य श्रीअद्वैतप्रभुने स्वयं मूढ़ जीवोंके मङ्गलके लिये बोला। ‘सहजे पागल’—आत्मा अर्थात् चेतनाके साथ ही उत्पन्न अप्राकृत परमहंस धर्मपरायण, प्रतिक्षण सभी इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णकी सेवामें रत (भाः 11/18/28-29) देखें। ‘आपणार सम’—अर्थात् सिद्धवैष्णव या विधि-निषेधसे अतीत परमहंस। श्रीगुरु नित्यानन्द और परमहंस या वैष्णव और उनके दास कभी भी हरिविमुख प्राकृत स्मार्त्त-समाजके भयसे उनके विधि-विधानसे नहीं चलते हैं—यही श्रीअद्वैताचार्यके कहनेका तात्पर्य है। शुद्धवैष्णव या परमहंसोंके दास चेतनमय महाप्रसादका सेवन और सम्मान करते हैं, उसे प्रकृतिसे उत्पन्न जड़ेन्द्रियोंकी तृप्ति करनेवाले चावल-दालके समान मानकर उसमें स्पर्शदोषका विचार नहीं करते। वे यह जानते हैं—शुद्ध वैष्णवकी तो बात दूर है, चण्डालके मुखसे भी गिरे महाप्रसादके सेवनके फलसे भी ब्राह्मणका ब्राह्मणत्व पूरी तरहसे अटूट रहता है, ब्राह्मणत्वमें किसी प्रकारकी अपवित्रता स्पर्श नहीं करती। महाप्रसादके सेवनसे जड़-जगत्की समस्त पवित्र और अपवित्र वस्तुएँ श्रीकृष्णकी सेवामें नियुक्त होकर अप्राकृत (दिव्य) पवित्र वस्तुके रूपमें दिखायी देती हैं॥96-98॥
किया है। यदि तुम सौ संन्यासियोंको भोजन कराओगे, तभी तुम्हारा यह अपराध दूर होगा॥”99-100॥ अनुभाष्य—बृहद्विष्णुपुराणमें— “नैवेद्यं जगदीशस्य अन्नपानादिकञ्च यत्। भक्ष्याभक्ष्यविचारश्च नास्ति तद्भक्षणे द्विजाः। ब्रह्मवनिर्विकारं हि यथा विष्णुस्तथैव तत्। विकारं ये प्रकुर्वन्ति भक्षणे तद्द्विजातयः॥ कुष्ठव्याधिसमायुक्ताः पुत्रदारविवर्जिताः। निरयं यान्ति ते विप्रास्तस्मान्नावर्त्तते पुनः॥” अर्थात् “हे ब्राह्मणों! श्रीहरिका नैवेद्य और अन्नपान आदि द्रव्य सेवन करते समय किसी प्रकारके खाद्य-अखाद्यका विचार न करें। श्रीहरिका नैवेद्य ब्रह्मकी भाँति निर्विकार और विष्णुके सदृश है। विष्णुका नैवेद्य आदि ग्रहण करनेमें जिनके चित्तमें संशय आदि विकार उत्पन्न होते हैं, उनको कुष्ठरोगसे युक्त और पुत्र-स्त्री-विहीन होकर नरकगामी होना पड़ता है। वहाँसे उनका पुनरागमन नहीं होता।” महाप्रसादको साधारण चावल-दालके समान मानकर उसमें भोग-बुद्धि रखनेके अपराधसे सावधान करनेके लिये ही ग्रन्थकारने महाप्रसादके माहात्म्यके विषयमें (अन्त्यलीला, 16/56-63 संख्यामें) लिखा है॥99-100॥
वैष्णव संन्यासके द्वारा स्मार्त्त विधिका लुप्त होना :— आचार्य कहे, —“ना करिब संन्यासि-निमन्त्रण। संन्यासी नाशिल मोर सब स्मृति-धर्म॥”101॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने उत्तर दिया,—“मैं आजके बाद किसी भी संन्यासीको निमन्त्रण नहीं दूँगा, क्योंकि एक संन्यासीने ही मेरे ब्राह्मण स्मृति-धर्मको नष्ट कर दिया है॥”101॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘स्मृतिधर्म’—स्मार्त्तधर्म॥101॥
श्रीनित्यानन्दके द्वारा श्रीअद्वैतको दण्डका भय दिखाना और उसके प्रायश्चित्तकी व्यवस्था :— नित्यानन्द बोले,—“एइ कृष्णेर प्रसाद। इहाके ‘झुठा’ कहिले, कैले अपराध॥99॥ शतेक संन्यासी यदि कराह भोजन। तबे एइ अपराध हइबे खण्डन॥”100॥
अनुवाद—तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,—“यह श्रीकृष्णका प्रसाद है। इसे 'झूठा' कहकर तुमने अपराध
आचमन देनेके बाद श्रीअद्वैतके द्वारा दोनों प्रभुओंकी समयके अनुसार सेवा :— एत बलि’ दुइ जने कराइल आचमन। उत्तम शय्याते लइया कराइल शयन॥102॥
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