भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 948, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 948

तीसरा अध्याय 3/102-113 ] लवङ्ग एलाची-बीज-उत्तम रसवास। तुलसी-मञ्जरीसह दिल मुखवास ॥ 103 ॥ सुगन्धि चन्दने लिप्त कैल कलेवर। सुगन्धि पुष्पमाला आनि' दिल हृदय-उपर ॥ 104 ॥ अनुवाद-यह कहकर श्रीअद्वैताचार्यने दोनों प्रभुओंको आचमन कराया और उनको शयनके लिये उत्तम शय्या प्रदान की। मुखके अच्छे स्वादके लिये लौंग, इलायचीके दानेसे बने उत्तम रसवासको तुलसी मञ्जरीके साथ दिया। श्रीअद्वैताचार्य प्रभुने तब सुगन्धित चन्दनके द्वारा उनके अङ्गोंका लेपन किया और सुगन्धित पुष्पमाला उनके वक्षःस्थलपर धारण करा दी ॥ 102-104 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'रसवास'-रसयुक्त गन्ध ॥ 103 ॥ श्रीअद्वैतके द्वारा महाप्रभुके पाद-सम्वाहनकी चेष्टा :- आचार्य करिते चाहे पाद-सम्वाहन। सङ्कुचित हञा प्रभु बलेन वचन ॥ 105 ॥ महाप्रभुकी लज्जा ओर श्रीअद्वैताचार्यको मुकुन्द तथा हरिदासके साथ भोजन करनेकी आज्ञा :- “बहुत नाचाइले तुमि, छाड़ नाचान। मुकुन्द-हरिदास लइया करह भोजन ॥” 106 ॥ तबे त' आचार्य सङ्गे लञा दुइ जने। करिल भोजन, इच्छा ये आछिल मने ॥ 107 ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुका पाद-सम्वाहन करना चाहते थे, परन्तु महाप्रभुने सङ्कोच करके कहा,-“आपने मुझे बहुत नचाया है, अब और नचाना छोड़ो। जाकर मुकुन्द और हरिदासके साथ भोजन करो।” तब श्रीअद्वैताचार्यने श्रीमुकुन्द तथा श्रीहरिदासको साथ ले जाकर, महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रसादको पाकर अपने मनकी इच्छाको पूर्ण किया ॥ 105-107 ॥ अनुभाष्य-संन्यासीको उत्तम शय्या, लौंग, इलायची, चन्दन, पुष्पमालादान ओर स्वयं श्रीअद्वैताचार्यकी पाद सम्वाहन अर्थात् चरण दबानेकी चेष्टाको देखकर (यह सब संन्यासीके लिये उचित नहीं है, ऐसा जनानेके लिये) महाप्रभुने कहा, - “तुमने मुझे बहुत नचाया है, अब और नचाना बन्द करो ॥" 106-107 ॥ स्थानीय लोगोंका महाप्रभुके दर्शनके लिये आना :- शान्तिपुरेर लोक शुनि' प्रभुर आगमन। देखिते आइला लोक प्रभुर चरण ॥ 108 ॥ चारों ओर हरिध्वनि और महाप्रभुके रूपका दर्शन कर लोगोंको आनन्दकी प्राप्ति :- 'हरि' 'हरि' बले लोक आनन्दित हञा। चमत्कार पाइल प्रभुर सौन्दर्य देखिञा ॥ 109 ॥ गौर-देह-कान्ति सूर्य जिनिया उज्ज्वल। अरुण-वस्त्रकान्ति ताहे करे झलमल ॥ 110 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके आगमनकी बात सुनकर शान्तिपुरके लोग उनके श्रीचरणोंके दर्शनके लिये आये। महाप्रभुका दर्शन करके लोग आनन्दसे 'हरि' 'हरि' बोलने लगे। महाप्रभुके सौन्दर्यको देखकर वे आश्चर्यचकित हो गये। उनके गौर-देहकी उज्ज्वल कान्ति सूर्यकी कान्तिको भी परास्त कर रही थी और संन्यासके गेरुए वस्त्र उनकी देहपर झलमल कर रहे थे ॥ 109-110 ॥ सारा दिन लोगोंका आना-जाना :- आइसे याय लोक सब, नाहि समाधान। लोकेर सङ्घट्टे दिन हैल अवसान ॥ 111 ॥ अनुवाद-कितने लोग आये और गये, इसका कोई हिसाब नहीं था। सारा दिन लोगोंका जमघट लगा रहा ॥ 111 ॥ अनुभाष्य - 'समाधान'- हिसाब, मीमांसा ॥ 111 ॥ सन्ध्याके समय श्रीअद्वैतका सङ्कीर्तन :- सन्ध्याते आचार्य आरम्भिल सङ्कीर्त्तन। आचार्य नाचेन, प्रभु करेन दर्शन ॥ 112 ॥ नित्यानन्द गोसाञि बुले आचार्य धरिञा। हरिदास पाछे नाचे हरषित हञा ॥ 113 ॥ । 97

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