श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 949, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 3/112-118 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—सन्ध्यामें श्रीअद्वैताचार्यने सङ्कीर्तन आरम्भ किया। श्रीअद्वैताचार्य प्रेमावेशमें नाचने लगे और महाप्रभु उन्हें देख रहे थे। श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीअद्वैताचार्यको पकड़कर उनके साथ चलने लगे (कहीं वे गिर न जाँय)। श्रीहरिदास ठाकुर भी परमानन्दित होकर उनके पीछे-पीछे नृत्य करने लगे॥112-113॥ अनुभाष्य—'बुले'—नाचते हुए चल रहे थे॥113॥
विद्यापतिका पद :— कि कहिब रे सखि आजुक आनन्द ओर। चिरदिने माधव मन्दिरे मोर॥114॥ध्रु॥ एइ पद गाओयाइया हर्षे करेन नर्त्तन। स्वेद-कम्प-पुलकाश्रु-हुङ्कार-गर्जन॥115॥
अनुवाद—(श्रीअद्वैताचार्य इस पदको गाने लगे),—“हे सखि! आजके मैं अपने आनन्दकी सीमाके विषयमें क्या कहूँ? चिरकालके बाद आज माधव मेरे घरमें आये हैं।” इस पदको गाते हुए श्रीअद्वैताचार्य हर्षसे नृत्य करने लगे और उनके शरीरमें स्वेद, कम्प, पुलक, अश्रु, हुँकार तथा गर्जन आदि सात्त्विक भाव उत्पन्न हो गये॥114-115॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'ओर'—सीमा; यह विद्यापतिका पद है॥114॥
अनुभाष्य—विद्यापति द्वारा रचित गीत— “कि कहब रे सखि आजुक आनन्द ओर। चिरदिने माधव मन्दिरे मोर॥ पाप सुधाकर यत सुख देल। पियामुख-दरशने तत सुख भेल॥ आचर भरिया यदि महानिधि पाइ। तब् हाम् पिया दूरदेशे ना पाठाइ॥ *शीतेर ओड़नी पिया, गिरिशीर वा'। * वरिषार छत्र पिया, दरियार ना'॥ भणये विद्यापति, शुन, वरनारि। सुजनक दुख दिवस दुइ चारि॥”
अर्थात् “हे सखि! क्या बताऊँ, आज मेरे आनन्दकी कोई सीमा नहीं है, बड़े दिनोंके बाद माधव आज मेरे घरमें आये हैं। रात्रिमें चन्द्रमा जैसे सुख प्रदान करता है, माधवके मुखके दर्शन करके मैं वैसी ही सुखी हुई हूँ। आँचल भरकर भी यदि महानिधि कोई दे, तो भी मैं उसे छोड़कर अपने प्रियतमको अपने पास ही रखना चाहूँगी, उन्हें दूरदेश नहीं भेजूँगी। प्रियतमका सङ्ग शीतकालमें ओढ़नीके समान और ग्रीष्म एवं वर्षाकालमें छातेके समान सुखदायक होता है। हे सखि! विद्यापति कहते हैं कि सज्जनोंके दुःख दिन दो-चार ही होते हैं, एक न एक दिन उन्हें अपने प्रियतम मिल ही जाते हैं।”
श्रीलराधामोहन ठाकुरने 'पदामृत-समुद्र' ग्रन्थमें इस गीतकी पहली चार पंक्तियोंको नहीं लिखा। कोई-कोई 'माधव'-शब्दसे श्रीमाधवेन्द्रपुरीको लक्ष्य करके इसे श्रीअद्वैताचार्य प्रभुका गीत मानते हैं, किन्तु ऐसा विचार सङ्गत नहीं है। माथुर-विरहके बाद सम्भोग, इसकी यहाँ अधिक सङ्गति है, ऐसा जानना होगा॥114॥
श्रीअद्वैतके द्वारा महाप्रभुके निकट सविनय प्रार्थना :— फिरि' फिरि' कभु प्रभुर धरेन चरण। चरण धरिया प्रभुरे बलेन वचन॥116॥ “अनेक दिन तुमि मोरे बेड़ाइले भाण्डिया। घरेते पाञाछि, एबे राखिब बाँधिया॥”117॥ एत बलि' आनन्दे आचार्य करेन नर्त्तन। प्रहरेक-रात्रि आचार्य कैल सङ्कीर्त्तन॥118॥
अनुवाद—घूमते-घूमते श्रीअद्वैताचार्य कभी महाप्रभुके चरण पकड़ लेते और चरण पकड़कर उनसे कहते,—“बहुत दिनोंसे मुझे धोखा देकर भागते रहे हो, किन्तु अब आप मेरे घरमें हो, मैं आपको बाँधकर रखूँगा।” यह कहकर श्रीअद्वैताचार्यने आनन्दपूर्वक नृत्य करते हुए उस रात एक प्रहर तक सङ्कीर्तन किया॥116-118॥
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