श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 951, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 3/127-135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
देखिया चिन्तित हैला यत भक्तगण। आचम्बिते उठे प्रभु करिया गर्जन ॥ 129 ॥ ‘बल्’ ‘बल्’ बले, नाचे, आनन्दे विह्वल। बुझन ना जाय, भाव-तरङ्ग प्रबल ॥ 130 ॥ अनुवाद-निर्वेद, विषाद, हर्ष, चापल्य, गर्व और दैन्य आदि भाव सैनिकोंके जैसे आकर महाप्रभुके साथ युद्ध कर रहे थे। उन सात्त्विक भावोंके प्रहारसे महाप्रभुका शरीर जर्जर हो गया और वे भूमिपर गिर पड़े तथा उनकी श्वास लगभग बन्द हो गयी। यह देखकर सभी भक्त चिन्तित हो गये। तभी महाप्रभु अचानक उठ खड़े हुए और जोरसे गर्जन करते हुए कहा 'बोलो' 'बोलो'। वे आनन्दमें विह्वल होकर नृत्य करने लगे। महाप्रभुके इस प्रकारके भावोंकी प्रबल तरङ्गोंको कोई नहीं समझ सकता ॥ 127-130 ॥ अनुभाष्य- 'हर्ष' - भःरःसिः, दःविः, चतुर्थ लः- “अभीष्टेक्षणलाभादिजाता चेतःप्रसन्नता। हर्षः स्यादिह रोमाञ्चः स्वेदोऽश्रुमुखफुल्लता। आवेगोन्मादजड़तास्तथा मोहादयोऽपि च॥” अर्थात् “अभीष्टके दर्शन प्राप्त करनेपर चित्तमें जो प्रसन्नता होती है, उसीका नाम 'हर्ष' है। हर्ष होनेपर रोमाञ्च, स्वेद (पसीना), अश्रु, मुख फूलना, आवेग, उन्माद, जड़ता और मोह आदि होता है।” 'गर्व'- भःरःसिः, दःविः, चतुर्थ लः- “सौभाग्यरूपतारुण्यगुणसर्वोत्तमाश्रयैः। इष्टलाभादिना चान्य-हेलनं गर्व ईर्य्यते॥ तत्र सोलुण्ठवचनं लीलानुत्तरदायिता। स्वाङ्गेक्षा निह्ववोऽन्यस्य वचनाश्रवणादयः॥” अर्थात् “इष्टवस्तुकी प्राप्तिसे अपने सौभाग्य, रूप, तारुण्य, गुण, सर्वोत्तम आश्रय आदिके सहारे दूसरोंकी जो अवहेलना होती है, वही 'गर्व' है। इसमें स्तुतिवाक्य, उत्तर न देना, अपने अङ्गोंको देखना, अपने अभिप्राय आदिको गोपन रखना और दूसरोंकी बातको श्रवण आदि न करने जैसी क्रियाएँ वर्तमान होती हैं॥ 127 ॥
महाप्रभुके साथ सतर्क श्रीनित्यानन्द :- नित्यानन्द सङ्गे बुले प्रभुके धरिञा। आचार्य, हरिदास बुले पाछे त' नाचिञा ॥ 131 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभु महाप्रभुको पकड़कर साथ चलने लगे ताकि वे गिरें नहीं और श्रीअद्वैताचार्य तथा श्रीहरिदास महाप्रभुके पीछे-पीछे नृत्य करते चल रहे थे॥ 131 ॥ महाप्रभुमें अनेक भावोंका वैचित्र्य :- एइ मत प्रहरेक नाचे प्रभु रङ्गे। कभु हर्ष, कभु विषाद, भावेर तरङ्गे ॥ 132 ॥ अनुवाद-इस प्रकार आनन्दमग्न होकर महाप्रभु एक प्रहर तक नृत्य करते रहे। भावोंकी तरङ्गोंमें कभी उनके हृदयमें हर्ष और कभी विषाद (दुःख) छा जाता ॥ 132 ॥ उपवासके बाद अधिक नृत्य करनेसे महाप्रभुको थकावट :- तिन दिन उपवासे करिया भोजन। उद्दण्ड-नृत्यते प्रभुर हैल परिश्रम ॥ 133 ॥ श्रीकृष्णप्रेममें महाप्रभुको थकावटका अनुभव नहीं होनेपर भी थकावटको दूर करना :- तबु त' ना जाने श्रम प्रेमाविष्ट हञा। नित्यानन्द महाप्रभुके राखिल धरिञा ॥ 134 ॥ आचार्य-गोसाञि तब राखिल कीर्त्तन। नाना सेवा करि' प्रभुके कराइल शयन ॥ 135 ॥ अनुवाद-तीन दिनके उपवासके बाद महाप्रभुने बहुत मात्रामें भोजन किया था। इसलिये उसके बाद उद्दण्ड नृत्य करनेमें महाप्रभुको कुछ थकान हो गयी। यद्यपि प्रेममें आविष्ट होनेके कारण महाप्रभुको थकान अनुभव नहीं हो रही थी, तथापि श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुको पकड़कर नृत्य करनेसे रोक दिया। तब श्रीअद्वैताचार्यने सङ्कीर्त्तनको विश्राम देकर महाप्रभुकी अनेक प्रकारसे सेवा करके उन्हें शयन कराया॥ 133-135॥
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