भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 952, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 952

तीसरा अध्याय [3/136-147] दस दिन तक शान्तिपुरमें वास :- एइमत दशदिन भोजन-कीर्त्तन। एकरूपे करि' करे प्रभुर सेवन ॥ 136 ॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीअद्वैताचार्यके घर दस दिन महाप्रभुने भोजन किया और कीर्त्तनका आनन्द लिया। प्रतिदिन ही श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुकी इसी प्रकारसे सेवा की ॥ 136 ॥ नवद्वीपके भक्तोंके साथ शचीमाताका पालकीमें आना :- प्रभाते आचार्य-रत्न दोलाय चड़ञा। भक्तगण-सङ्गे आइला शचीमाता लञा ॥ 137 ॥ नदीया-नगरेर लोक-स्त्री-बालक-वृद्ध। सब लोक आइल, हैल संघट्ट समृद्ध ॥ 138 ॥ अनुवाद- (महाप्रभुके शान्तिपुर आनेके) अगले दिन प्रातःकालमें श्रीचन्द्रशेखर आचार्य नवद्वीपसे शचीमाताको पालकीमें बैठाकर भक्तोंके साथ श्रीअद्वैताचार्यके घर ले आये। महाप्रभुके दर्शनके लिये नदीया नगरके सभी लोग, क्या स्त्री, क्या बालक और क्या वृद्ध-सभी वहाँ आये। उनके आनेसे वहाँ लोगोंकी भीड़ हो गयी ॥ 137-138 ॥ प्रातःकाल शचीमाताका महाप्रभुसे मिलन :- प्रातःकृत्य करि' करे नाम-सङ्कीर्त्तन। शचीमाता लञा आइला अद्वैत-भवन ॥ 139 ॥ अनुवाद-प्रातःकालकी क्रियाओंको समाप्त करके जब महाप्रभु नाम-सङ्कीर्तन कर रहे थे, उस समय श्रीचन्द्रशेखर शचीमाताको लेकर श्रीअद्वैत-भवनमें पहुँचे ॥ 139 ॥ महाप्रभुके दर्शनसे शचीमाताका स्नेहसे क्रन्दन :- शची-आगे पड़िला प्रभु दण्डवत् हञा। कान्दिते लागिला शची कोले उठाइञा ॥ 140 ॥ अनुवाद-शचीमाताको देखते ही महाप्रभुने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया और शचीमाता रोने लगीं और उन्होंने महाप्रभुको अपनी गोदमें ले लिया ॥ 140 ॥ शचीमाताका महाप्रभुके प्रति वात्सल्य-प्रेमका वर्णन :- दोँहार दर्शने दुँहे हइला विह्वल। केश ना देखिया शची हइला विकल ॥ 141 ॥ अङ्ग मुछे, मुख चुम्बे, करे निरीक्षण। देखिते ना पाय, — अश्रु भरिल नयन ॥ 142 ॥ अनुवाद-एक-दूसरेको देखकर दोनों ही विह्वल हो उठे। महाप्रभुके केशोंको न देखकर शचीमाता व्याकुल हो गयीं। पुत्र-स्नेहके कारण वे महाप्रभुके अङ्गोंको सहलाने लगीं। महाप्रभुका मुख चुम्बन करके वे उनके निरीक्षणका प्रयास करने लगीं, परन्तु आँखोंमें अश्रु भर जानेके कारण उन्हें देख न सकीं ॥ 141-142 ॥ शचीमाताका पुत्रके निकट विलाप और प्रार्थना :- कान्दिया कहेन शची,-"बाछारे निमाञि। विश्वरूपसम ना करिह निठुराइ ॥ 143 ॥ संन्यासी हइया पुनः ना दिल दरशन। तुमि तैछे कैले मोर हइबे मरण॥" 144 ॥ अनुवाद-रोते-रोते शचीमाता कहने लगीं, - 'हे पुत्र निमाइ ! तुम भी विश्वरूपकी भाँति निष्ठुर मत बनना। उसने संन्यासी होकर मुझे पुनः दर्शन नहीं दिया। यदि तुम भी वैसा ही करोगे, तो मैं अवश्य ही मर जाऊँगी ॥ "143-144 ॥ अनुभाष्य—'निठुराइ'–निष्ठुरता ॥ 143 ॥ शचीमाताको मातृभक्त-शिरोमणि महाप्रभुके द्वारा सान्त्वना प्रदान :- कान्दिया बलेन प्रभु,-"शुन, मोर आइ। तोमार शरीर एइ, मोर किछु नाइ ॥ 145 ॥ तोमार पालित देह, जन्म तोमा हैते। कोटि जन्मे तोमार ऋण ना पारि शोधिते ॥ 146 ॥ शचीमाताके प्रति महाप्रभुका चिरस्नेह :- जानि' वा ना जानि' यदि करिलुँ संन्यास। तथापि तोमारे कभु नहिब उदास ॥ 147 ॥ । 101