श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 3/163-176 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला एइमत शचीदेवी वात्सल्ये विह्वल। यावत आचार्य-गृहे निमाञिर अवस्थान। हर्ष-भय-दैन्यभावे हइल विकल॥167॥ मुञि भिक्षा दिब, सबाकारे मागौँ दान॥"171॥ अनुवाद—महाप्रभु बार-बार पछाड़ खाकर गिर अनुवाद—श्रीवासादिको इच्छाको सुनकर शचीमाताने जाते, जिसे देखकर शचीमाता रोते हुए कहने लगतीं,—“ऐसे सभीसे प्रार्थना की,—“मुझे और फिर कहाँ निमाइका गिरनेसे तो लगता है निमाइका शरीर चूर-चूर हो दर्शन प्राप्त होगा? तुम लोगोंके साथ तो निमाइका जायेगा।” “हाय! हाय!” करती हुई शचीमाता विष्णुसे मिलन कहीं और भी अनेक बार हो जायेगा, परन्तु यही वर माँगने लगतीं,—“हे नारायण! बाल्यकालसे मैंने मुझ अभागिनीके लिये तो मात्र यहीं दर्शन है (मैं तो जो आपकी सेवा की है, उसका फल मुझे यही दो घरमें ही रहूँगी और संन्यासी घर लौटकर कभी नहीं कि जिस समय निमाइ पृथ्वीपर गिरे, उसके शरीरमें आता)। इसलिये मैं आप सबसे यही भिक्षा माँगती हूँ किसी प्रकारका कष्ट न हो।” इस प्रकार शचीमाता कि जब तक निमाइ अद्वैताचार्यके घरमें रहे, तब तक वात्सल्य रसमें विह्वल हो जातीं। (निमाइके दर्शनसे) मैं ही इसे भोजन कराऊँ॥”169-171॥ हर्ष, (निमाइको गिरनेसे कष्टसे) भय और (नारायणसे प्रार्थना करते हुए) दैन्य आदि भावोंसे व्याकुल हो अनुभाष्य—‘कति’—कहाँ॥169॥ जातीं॥163-167॥ भक्तोंकी सम्मति :— अनुभाष्य—‘बाल्यकाल हैते’—बालिका अवस्थासे ही, शुनि' सब भक्तगण कहे करि' नमस्कार। शैशवकालसे ही। नित्यसिद्धा मूर्तिमती-वात्सल्यकी विग्रहा “मातार ये इच्छा, सेइ सम्मत सबार॥”172॥ यशोदास्वरूपिणी शचीमाता जन्मसे ही श्रीकृष्णसेवा- परायणा हैं,—वे कभी भी प्राकृत (साधारण) जीव नहीं अनुवाद—यह सुनकर सभी भक्तोंने शचीमाताको हैं, यह इस स्थानपर उनके अपने ही मुखसे कहा गया प्रणाम करके कहा,—“माता! आपकी जो इच्छा है, हम है॥165॥ सब उससे सहमत हैं॥”172॥ भक्तोंकी महाप्रभुको निमन्त्रण करनेकी इच्छा :— माताकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये श्रीवासादि यत प्रभुर विप्र-भक्तगण। मातृभक्तशिरोमणि महाप्रभुका भक्तोंसे अनुरोध :— प्रभुके भिक्षा दिते हैल सबाकार मन॥168॥ मातार व्यग्रता देखि' प्रभुर व्यग्र मन। भक्तगण एकत्र करि' बलिला वचन॥173॥ अनुवाद—महाप्रभुके श्रीवासादि जितने ब्राह्मण भक्त आये थे, उन सबकी महाप्रभुको भोजन करानेकी इच्छा महाप्रभुकी भक्तवश्यता :— हुई॥168॥ “तोमा-सबार आज्ञा बिना चलिलाम वृन्दावन। याइते नारिल, विघ्न कैल निवर्त्तन॥174॥ शचीमाताके द्वारा भक्तोंका निवारण और स्वयं महाप्रभुको भिक्षा देनेका प्रस्ताव :— महाप्रभुका भक्तों और माताके प्रति वात्सल्य :— शुनि' शची सबाकारे करिल मिनति। यद्यपि सहसा आमि कर्याछोँ संन्यास। “निमाञिर दरशन आर मुञि पाब कति॥169॥ तथापि तोमा-सबा हैते नहिब उदास॥175॥ तोमा-सबा-सने हबे अन्यत्र मिलन। तोमा-सब ना छाड़िब, यावत आमि जीव'। मुञि अभागिनीर मात्र एइ दरशन॥170॥ मातारे तावत् आमि छाड़िते नारिब॥176॥ 104 ।