श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 956, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय 3/173-183 ] वान्ताशी होना संन्यासीका कर्तव्य नहीं :- संन्यासीर धर्म नहे—संन्यास करिञा। निज जन्मस्थाने रहे कुटुम्ब लञा ॥ 177 ॥ फल्गु वैराग्यके कारण उनकी निन्दा न हो, इसलिये भक्तोंके निकट महाप्रभुकी युक्तिकी प्रार्थना :- केह येन एइ बलि' ना करे निन्दन। सेइ युक्ति कह, याते रहे दुइ धर्म॥"178 ॥ अनुवाद—शचीमाताकी व्याकुलताको देखकर महाप्रभुका मन भी विह्वल हो गया। तब महाप्रभुने सभी भक्तोंको एकत्रित करके कहा,—“मैं आप सबसे आज्ञा लिये बिना ही वृन्दावन जा रहा था। परन्तु कुछ विघ्न आनेसे मैं जा नहीं सका और वापिस लौट आया। यद्यपि मैंने अचानक संन्यास ग्रहण किया है, तथापि मैं आप सबके प्रति उदासीन नहीं हो सकता। जब तक मेरा जीवन है, तब तक मैं आप सबको नहीं छोड़ूँगा और न ही अपनी माताको छोड़ पाऊँगा। किन्तु संन्यास ग्रहण करनेके बाद संन्यासीका यह धर्म नहीं है कि वह अपने कुटुम्बके साथ अपने जन्मस्थानपर वास करे। कोई ऐसा कहकर मेरी निन्दा न करे, इसलिये कोई ऐसी युक्ति करो जिससे मेरे दोनों धर्मोंकी (संन्यासके कारण जन्मस्थानपर नहीं रहनेके धर्मकी, और आप सभीको न छोड़नेके भक्त-वात्सल्यरूपी धर्मकी) रक्षा हो जाय॥ 173-178 ॥ अनुभाष्य—'जीव'- बचूँगा, प्रकट रहूँगा ॥ 176 ॥ शचीमातासे श्रीअद्वैतादिकी प्रार्थना :- शुनिया प्रभुर एइ मधुर वचन। शचीपाश आचार्यादि करिल गमन ॥ 179 ॥ प्रभुर निवेदन ताँरे सकल कहिल। शुनि' शची जगन्माता कहिते लागिल ॥ 180 ॥ महाप्रभुके सुखमें ही शचीमाताका सुख :- “तेंहो यदि इँहा रहे, तबे मोर सुख। ताँर निन्दा हय यदि, तबे मोर दुःख ॥ 181 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके ऐसे मधुर वचनोंको सुनकर श्रीअद्वैताचार्य आदि सब भक्त शचीमाताके पास गये और उन्हें महाप्रभुके इस निवेदनके बारेमें बतलाया। यह सुनकर जगत्-जननी श्रीशचीदेवी कहने लगीं,– “यदि निमाइ यहाँ रहे, तो मुझे बहुत सुख होगा। परन्तु यदि उसकी [यहाँ रहनेसे] निन्दा होगी, तो मुझे बहुत दुःख होगा ॥ 179-181 ॥ अनुभाष्य—मातृकुलकी आदर्श जगन्माता शचीठाकुराणी ऐसी बात कहकर समस्त मातृकुलको शिक्षा दे रही हैं—'पुत्रके द्वारा श्रीकृष्णको ढूँढ़नेकी चेष्टाका परित्याग करके घरमें ही रहनेपर, माताको इन्द्रियतृप्तिरूपी (पुत्र-दर्शनरूपी) सुख तो होगा, परन्तु साथ ही श्रीकृष्णसेवाको त्यागनेके कारण पुत्र निन्दाका पात्र होगा, ऐसा सोचकर वास्तविक स्नेहशीला माताको दुःख ही होगा। इसलिये पुत्र दर्शनरूपी अपने सुख या भोगकी अपेक्षा पुत्रकी श्रीकृष्ण-सेवामें ही उसके नित्य मङ्गलरूपी सुखकी आकाङ्क्षा रखनेवाली वास्तविक माताको वास्तवमें सुख होता है। नहीं तो, मा-'माया' शब्द वाच्या, (अर्थात् 'मा'-का अर्थ माया हो जायेगा)। इस प्रसङ्गमें यह श्लोक विचारणीय है, (भा: 5/5/18)— “गुरुर्न स स्यात् स्वजनो न स स्यात् पिता न स स्याज्जननी न सा स्यात्। दैवं न तत् स्यान्न पतिश्च स स्या- न्न मोचयेद्यः समुपेतमृत्युम्॥" अर्थात् “जो अपने प्रिय सम्बन्धीको भगवद्भक्तिका उपदेश देकर जन्म-मृत्युके चक्रसे नहीं छुड़ाता, वह गुरु गुरु नहीं है, स्वजन स्वजन नहीं है, पिता पिता नहीं है, माता माता नहीं है, इष्टदेव इष्टदेव नहीं है और पति पति नहीं है॥”181 ॥ शचीमाताका पुत्र-सुखके लिये पुरीवासका अनुमोदन :- ताते एइ युक्ति भाल, मोर मने लय। नीलाचले रहे यदि, दुइ कार्य हय ॥ 182 ॥ नीलाचले-नवद्वीपे येन दुइ घर। लोक-गतागति-वार्त्ता पाब निरन्तर ॥ 183 ॥ । 105