भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 957

[ 3/182-193 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला तुमि सब करिते पार गमनागमन। गङ्गास्नाने कभु ताँर हबे आगमन ॥ १८४ ॥ शचीमाताका शुद्ध वात्सल्य-प्रेम :- आपनार दुःख-सुख ताँहा नाहि गणि। ताँर येइ सुख, ताहा निज सुख मानि ॥” १८५ ॥ अनुवाद—इसलिये मेरे मनको तो यह युक्ति अच्छी लगती है कि यदि निमाइ नीलाचलमें रहे, तो दोनों कार्य हो जायेंगे। नीलाचल और नवद्वीप दोनों ही एक घरके दो कमरोंके समान हैं। दोनों स्थानोंसे लोगोंका आना-जाना लगा रहता है और उनसे मुझे निमाइका समाचार भी प्राप्त होता रहेगा। तुम सब भी नीलाचल आना-जाना कर सकते हो और कभी निमाइ भी गङ्गा स्नानके लिये यहाँ आयेगा। मुझे अपने दुःख-सुखकी चिन्ता नहीं है। निमाइके सुखमें ही मैं अपना सुख मानती हूँ॥” १८२-१८५ ॥ अनुभाष्य—इस पयारमें श्रीकृष्ण-सेवकोंकी श्रीकृष्णको सब प्रकारसे सुखी करनेवाली सेवाकी सुन्दर अभिव्यक्ति है। इस सन्दर्भमें आदिलीला 4/174-175, 201, 204 संख्या; मध्यलीला 4/186 संख्या तथा ठाकुर श्रीभक्तिविनोद रचित ‘शरणागति’में “सेवा-सुख-दुःख—परम सम्पद” देखें ॥ १८५ ॥ भक्तोंके द्वारा शचीमाताकी स्तुति :- शुनि’ भक्तगण ताँरे करिल स्तवन। “वेद-आज्ञा यैछे, माता, तोमार वचन ॥” १८६ ॥ अनुवाद—शचीमाताकी इस बातको सुनकर उनकी स्तुति करते हुए भक्तोंंने कहा,—“हे माता! आपके वचन वेद-आज्ञाके समान मान्य हैं॥” १८६ ॥ शचीमाताके अभिप्रायको जानकर महाप्रभुको आनन्द :- प्रभु-आगे भक्तगण कहिते लागिल। शुनिया प्रभुर मने आनन्द हइल ॥ १८७ ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुके पास आकर सभी भक्तोंंने शचीमाताके विचारको सुनाया, जिसे सुनकर महाप्रभु बहुत आनन्दित हुए ॥ १८७ ॥ भक्तोंके निकट महाप्रभुकी प्रार्थना :- नवद्वीप-वासी आदि यत भक्तगण। सबारे सम्मान करि’ बलिला वचन ॥ १८८ ॥ “तुमि-सब लोक-मोर परम बान्धव। एइ भिक्षा मागों,—मोरे देह तुमि-सब ॥ १८९ ॥ सभीको श्रीकृष्ण-कीर्तन करनेका आदेश :- घरे याञा कर सदा कृष्णसङ्कीर्त्तन। कृष्णनाम, कृष्णकथा, कृष्ण-आराधन ॥ १९० ॥ पुरी जाते हुए महाप्रभुकी आज्ञा-प्रार्थना :- आज्ञा देह नीलाचले करिये गमन। मध्ये मध्ये आसिं’ तोमाय दिब दरशन ॥” १९१ ॥ अनुवाद—नवद्वीपवासी आदि समस्त भक्तोंको सम्मान देते हुए महाप्रभु कहने लगे,—“आप सब लोग मेरे परम बान्धव हो। मैं आप सबसे एक भिक्षा माँगता हूँ, कृपा करके मुझे वह प्रदान कीजिये। आप सब घर जाकर सदैव श्रीकृष्णसङ्कीर्तन करना। और साथमें श्रीकृष्णकी आराधना, श्रीकृष्णनाम तथा श्रीकृष्णकथा करना। अब आप मुझे नीलाचल जानेकी आज्ञा प्रदान करें। मैं आश्वासन देता हूँ कि मैं बीच-बीचमें आकर आपसे मिलता रहूँगा॥” १८८-१९१ ॥ यथायोग्य सम्मान देकर सभीको विदायी देना :- एत बलि’ सबाकारे ईषत् हासिञा। विदाय करिल प्रभु सम्मान करिञा ॥ १९२ ॥ अनुवाद—इस प्रकार सभी भक्तोंका सम्मान करके महाप्रभुने मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए सभीको विदा किया॥ १९२ ॥ हरिदासकी दीनता और अकिञ्चन भाव :- सबा विदाय दिया चलिते हैल मन। हरिदास कान्दि’ कहे करुण-वचन ॥ १९३ ॥ 106 ।