भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 958, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 958

तीसरा अध्याय 3/193-202 ] “नीलाचले याबे तुमि, मोर कोन् गति। नीलाचले याइते मोर नाहिक शक्ति ॥194॥ मुञि अधम ना पाइनु तोमार दरशन। केमते धरिब एइ पापिष्ठ जीवन ॥”195॥ अनुवाद—सबको विदा करके महाप्रभुने नीलाचल जानेका निर्णय किया। तब श्रीहरिदास ठाकुर रोते हुए करुण वचन कहने लगे,—“आप तो नीलाचल चले जायेंगे, किन्तु मेरी क्या गति होगी? मुझमें तो नीलाचल जानेकी शक्ति नहीं है। मुझ अधमको यदि आपके दर्शन नहीं होंगे, तो मैं यह पापमय जीवन कैसे धारण करूँगा?॥”193-195॥ अनुभाष्य—यद्यपि श्रीहरिदास ठाकुरका जन्म यवन- कुलमें हुआ था, तथापि अपने भजनके द्वारा उन्होंने ब्राह्मणताको प्राप्त किया था। परन्तु श्रीहरिदास ठाकुरने स्वाभाविक दैन्यके कारण अपनेको अत्यन्त हीन समझकर महाप्रभुसे आर्त्त-स्वरसे कहा कि यवनकुलमें जन्मके कारण उनका नीलाचलमें प्रवेशका अधिकार नहीं है। विशेषतः नीलाद्रिमें चारों वर्णोंके अतिरिक्त श्रीजगन्नाथ मन्दिरकी चार दीवारीमें किसी औरको प्रवेश करनेका अधिकार नहीं है। इसलिये महाप्रभु यदि नीलाचलके श्रीमन्दिरके अन्दर वास करेंगे, तो फिर श्रीहरिदास ठाकुरका वहाँ जानेका अधिकार नहीं होगा। बादमें ऐसा जानकर कि नीलाद्रि (नील समुद्र)के निकट बालूवाले स्थानपर रहनेमें उनके लिये कोई भी बाधा नहीं है, ठाकुर हरिदास वहाँ रहे। आजकल वह स्थान ‘सिद्धबकुल मठ’के नामसे प्रसिद्ध है॥194॥ प्रभु कहे,—“कर तुमि दैन्य-सम्वरण। तोमार दैन्येते मोर व्याकुल हय मन ॥196॥ हरिविमुख स्मार्त्त समाजको धिक्कार देकर ब्राह्मणगुरु वैष्णवाचार्य हरिदास ठाकुरको पुरी ले जानेकी प्रतिज्ञा :— तोमार लागि’ जगन्नाथे करिब निवेदन। तोमा-लञा याब आमि श्रीपुरुषोत्तम ॥”197॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“अपनी दीनताका सम्वरण करो। तुम्हारी दीनताको देखकर मेरा मन व्याकुल हो रहा है। मैं तुम्हारे लिये श्रीजगन्नाथदेवसे निवेदन करूँगा और तुम्हें अपने साथ नीलाचल ले जाऊँगा॥”196-197॥ महाप्रभुसे और कुछ दिन रहनेकी श्रीअद्वैतकी प्रार्थना :— तबे त’ आचार्य कहे विनय करिञा। “दिन दुइ-चारि रह कृपा त’ करिञा॥”198॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीअद्वैतकी इच्छा पूर्ति और सभीको आनन्द :— आचार्येर वाक्य प्रभु ना करे लङ्घन। रहिला अद्वैत-गृहे, ना कैल गमन॥199॥ आनन्दित हैल आचार्य, शची, भक्त-सब। प्रतिदिन करे आचार्य महामहोत्सव॥200॥ अनुवाद—तब श्रीअद्वैताचार्यने विनती करते हुए महाप्रभुसे कहा,—“कृपा करके दो-चार दिन और यहाँ रुक जाइये।” श्रीअद्वैताचार्यके वचनोंका महाप्रभु कभी उल्लङ्घन नहीं करते, इसलिये वे गमन न करके श्रीअद्वैताचार्यके घरमें रुक गये। इससे श्रीअद्वैताचार्य, शचीमाता और सब भक्तोंको बहुत आनन्द हुआ। श्रीअद्वैताचार्यने प्रतिदिन महा-महोत्सव किया॥198-200॥ दिनमें इष्ट-गोष्ठी और रातमें सङ्कीर्तन :— दिने कृष्णरस-कथा भक्तगण-सङ्गे। रात्रे महा-महोत्सव सङ्कीर्त्तन-रङ्गे॥201॥ अनुवाद—महाप्रभु भक्तोंके साथ दिनमें श्रीकृष्णरस- कथाका आस्वादन करते और रातमें सङ्कीर्तन करके महा-महोत्सव मनाते॥201॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुको अपने द्वारा बनाया गया भोजन करते देख माताको आनन्द :— आनन्दित हञा शची करेन रन्धन। सुखे भोजन करे प्रभु लञा भक्तगण॥202॥ अनुवाद—शचीमाता बड़े आनन्दसे रसोई बनातीं । 107