श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
तीसरा अध्याय 3/173-183 ] वान्ताशी होना संन्यासीका कर्तव्य नहीं :- संन्यासीर धर्म नहे—संन्यास करिञा। निज जन्मस्थाने रहे कुटुम्ब लञा ॥ 177 ॥ फल्गु वैराग्यके कारण उनकी निन्दा न हो, इसलिये भक्तोंके निकट महाप्रभुकी युक्तिकी प्रार्थना :- केह येन एइ बलि' ना करे निन्दन। सेइ युक्ति कह, याते रहे दुइ धर्म॥"178 ॥ अनुवाद—शचीमाताकी व्याकुलताको देखकर महाप्रभुका मन भी विह्वल हो गया। तब महाप्रभुने सभी भक्तोंको एकत्रित करके कहा,—“मैं आप सबसे आज्ञा लिये बिना ही वृन्दावन जा रहा था। परन्तु कुछ विघ्न आनेसे मैं जा नहीं सका और वापिस लौट आया। यद्यपि मैंने अचानक संन्यास ग्रहण किया है, तथापि मैं आप सबके प्रति उदासीन नहीं हो सकता। जब तक मेरा जीवन है, तब तक मैं आप सबको नहीं छोड़ूँगा और न ही अपनी माताको छोड़ पाऊँगा। किन्तु संन्यास ग्रहण करनेके बाद संन्यासीका यह धर्म नहीं है कि वह अपने कुटुम्बके साथ अपने जन्मस्थानपर वास करे। कोई ऐसा कहकर मेरी निन्दा न करे, इसलिये कोई ऐसी युक्ति करो जिससे मेरे दोनों धर्मोंकी (संन्यासके कारण जन्मस्थानपर नहीं रहनेके धर्मकी, और आप सभीको न छोड़नेके भक्त-वात्सल्यरूपी धर्मकी) रक्षा हो जाय॥ 173-178 ॥ अनुभाष्य—'जीव'- बचूँगा, प्रकट रहूँगा ॥ 176 ॥ शचीमातासे श्रीअद्वैतादिकी प्रार्थना :- शुनिया प्रभुर एइ मधुर वचन। शचीपाश आचार्यादि करिल गमन ॥ 179 ॥ प्रभुर निवेदन ताँरे सकल कहिल। शुनि' शची जगन्माता कहिते लागिल ॥ 180 ॥ महाप्रभुके सुखमें ही शचीमाताका सुख :- “तेंहो यदि इँहा रहे, तबे मोर सुख। ताँर निन्दा हय यदि, तबे मोर दुःख ॥ 181 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके ऐसे मधुर वचनोंको सुनकर श्रीअद्वैताचार्य आदि सब भक्त शचीमाताके पास गये और उन्हें महाप्रभुके इस निवेदनके बारेमें बतलाया। यह सुनकर जगत्-जननी श्रीशचीदेवी कहने लगीं,– “यदि निमाइ यहाँ रहे, तो मुझे बहुत सुख होगा। परन्तु यदि उसकी [यहाँ रहनेसे] निन्दा होगी, तो मुझे बहुत दुःख होगा ॥ 179-181 ॥ अनुभाष्य—मातृकुलकी आदर्श जगन्माता शचीठाकुराणी ऐसी बात कहकर समस्त मातृकुलको शिक्षा दे रही हैं—'पुत्रके द्वारा श्रीकृष्णको ढूँढ़नेकी चेष्टाका परित्याग करके घरमें ही रहनेपर, माताको इन्द्रियतृप्तिरूपी (पुत्र-दर्शनरूपी) सुख तो होगा, परन्तु साथ ही श्रीकृष्णसेवाको त्यागनेके कारण पुत्र निन्दाका पात्र होगा, ऐसा सोचकर वास्तविक स्नेहशीला माताको दुःख ही होगा। इसलिये पुत्र दर्शनरूपी अपने सुख या भोगकी अपेक्षा पुत्रकी श्रीकृष्ण-सेवामें ही उसके नित्य मङ्गलरूपी सुखकी आकाङ्क्षा रखनेवाली वास्तविक माताको वास्तवमें सुख होता है। नहीं तो, मा-'माया' शब्द वाच्या, (अर्थात् 'मा'-का अर्थ माया हो जायेगा)। इस प्रसङ्गमें यह श्लोक विचारणीय है, (भा: 5/5/18)— “गुरुर्न स स्यात् स्वजनो न स स्यात् पिता न स स्याज्जननी न सा स्यात्। दैवं न तत् स्यान्न पतिश्च स स्या- न्न मोचयेद्यः समुपेतमृत्युम्॥" अर्थात् “जो अपने प्रिय सम्बन्धीको भगवद्भक्तिका उपदेश देकर जन्म-मृत्युके चक्रसे नहीं छुड़ाता, वह गुरु गुरु नहीं है, स्वजन स्वजन नहीं है, पिता पिता नहीं है, माता माता नहीं है, इष्टदेव इष्टदेव नहीं है और पति पति नहीं है॥”181 ॥ शचीमाताका पुत्र-सुखके लिये पुरीवासका अनुमोदन :- ताते एइ युक्ति भाल, मोर मने लय। नीलाचले रहे यदि, दुइ कार्य हय ॥ 182 ॥ नीलाचले-नवद्वीपे येन दुइ घर। लोक-गतागति-वार्त्ता पाब निरन्तर ॥ 183 ॥ । 105
[ 3/182-193 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला तुमि सब करिते पार गमनागमन। गङ्गास्नाने कभु ताँर हबे आगमन ॥ १८४ ॥ शचीमाताका शुद्ध वात्सल्य-प्रेम :- आपनार दुःख-सुख ताँहा नाहि गणि। ताँर येइ सुख, ताहा निज सुख मानि ॥” १८५ ॥ अनुवाद—इसलिये मेरे मनको तो यह युक्ति अच्छी लगती है कि यदि निमाइ नीलाचलमें रहे, तो दोनों कार्य हो जायेंगे। नीलाचल और नवद्वीप दोनों ही एक घरके दो कमरोंके समान हैं। दोनों स्थानोंसे लोगोंका आना-जाना लगा रहता है और उनसे मुझे निमाइका समाचार भी प्राप्त होता रहेगा। तुम सब भी नीलाचल आना-जाना कर सकते हो और कभी निमाइ भी गङ्गा स्नानके लिये यहाँ आयेगा। मुझे अपने दुःख-सुखकी चिन्ता नहीं है। निमाइके सुखमें ही मैं अपना सुख मानती हूँ॥” १८२-१८५ ॥ अनुभाष्य—इस पयारमें श्रीकृष्ण-सेवकोंकी श्रीकृष्णको सब प्रकारसे सुखी करनेवाली सेवाकी सुन्दर अभिव्यक्ति है। इस सन्दर्भमें आदिलीला 4/174-175, 201, 204 संख्या; मध्यलीला 4/186 संख्या तथा ठाकुर श्रीभक्तिविनोद रचित ‘शरणागति’में “सेवा-सुख-दुःख—परम सम्पद” देखें ॥ १८५ ॥ भक्तोंके द्वारा शचीमाताकी स्तुति :- शुनि’ भक्तगण ताँरे करिल स्तवन। “वेद-आज्ञा यैछे, माता, तोमार वचन ॥” १८६ ॥ अनुवाद—शचीमाताकी इस बातको सुनकर उनकी स्तुति करते हुए भक्तोंंने कहा,—“हे माता! आपके वचन वेद-आज्ञाके समान मान्य हैं॥” १८६ ॥ शचीमाताके अभिप्रायको जानकर महाप्रभुको आनन्द :- प्रभु-आगे भक्तगण कहिते लागिल। शुनिया प्रभुर मने आनन्द हइल ॥ १८७ ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुके पास आकर सभी भक्तोंंने शचीमाताके विचारको सुनाया, जिसे सुनकर महाप्रभु बहुत आनन्दित हुए ॥ १८७ ॥ भक्तोंके निकट महाप्रभुकी प्रार्थना :- नवद्वीप-वासी आदि यत भक्तगण। सबारे सम्मान करि’ बलिला वचन ॥ १८८ ॥ “तुमि-सब लोक-मोर परम बान्धव। एइ भिक्षा मागों,—मोरे देह तुमि-सब ॥ १८९ ॥ सभीको श्रीकृष्ण-कीर्तन करनेका आदेश :- घरे याञा कर सदा कृष्णसङ्कीर्त्तन। कृष्णनाम, कृष्णकथा, कृष्ण-आराधन ॥ १९० ॥ पुरी जाते हुए महाप्रभुकी आज्ञा-प्रार्थना :- आज्ञा देह नीलाचले करिये गमन। मध्ये मध्ये आसिं’ तोमाय दिब दरशन ॥” १९१ ॥ अनुवाद—नवद्वीपवासी आदि समस्त भक्तोंको सम्मान देते हुए महाप्रभु कहने लगे,—“आप सब लोग मेरे परम बान्धव हो। मैं आप सबसे एक भिक्षा माँगता हूँ, कृपा करके मुझे वह प्रदान कीजिये। आप सब घर जाकर सदैव श्रीकृष्णसङ्कीर्तन करना। और साथमें श्रीकृष्णकी आराधना, श्रीकृष्णनाम तथा श्रीकृष्णकथा करना। अब आप मुझे नीलाचल जानेकी आज्ञा प्रदान करें। मैं आश्वासन देता हूँ कि मैं बीच-बीचमें आकर आपसे मिलता रहूँगा॥” १८८-१९१ ॥ यथायोग्य सम्मान देकर सभीको विदायी देना :- एत बलि’ सबाकारे ईषत् हासिञा। विदाय करिल प्रभु सम्मान करिञा ॥ १९२ ॥ अनुवाद—इस प्रकार सभी भक्तोंका सम्मान करके महाप्रभुने मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए सभीको विदा किया॥ १९२ ॥ हरिदासकी दीनता और अकिञ्चन भाव :- सबा विदाय दिया चलिते हैल मन। हरिदास कान्दि’ कहे करुण-वचन ॥ १९३ ॥ 106 ।
तीसरा अध्याय 3/193-202 ] “नीलाचले याबे तुमि, मोर कोन् गति। नीलाचले याइते मोर नाहिक शक्ति ॥194॥ मुञि अधम ना पाइनु तोमार दरशन। केमते धरिब एइ पापिष्ठ जीवन ॥”195॥ अनुवाद—सबको विदा करके महाप्रभुने नीलाचल जानेका निर्णय किया। तब श्रीहरिदास ठाकुर रोते हुए करुण वचन कहने लगे,—“आप तो नीलाचल चले जायेंगे, किन्तु मेरी क्या गति होगी? मुझमें तो नीलाचल जानेकी शक्ति नहीं है। मुझ अधमको यदि आपके दर्शन नहीं होंगे, तो मैं यह पापमय जीवन कैसे धारण करूँगा?॥”193-195॥ अनुभाष्य—यद्यपि श्रीहरिदास ठाकुरका जन्म यवन- कुलमें हुआ था, तथापि अपने भजनके द्वारा उन्होंने ब्राह्मणताको प्राप्त किया था। परन्तु श्रीहरिदास ठाकुरने स्वाभाविक दैन्यके कारण अपनेको अत्यन्त हीन समझकर महाप्रभुसे आर्त्त-स्वरसे कहा कि यवनकुलमें जन्मके कारण उनका नीलाचलमें प्रवेशका अधिकार नहीं है। विशेषतः नीलाद्रिमें चारों वर्णोंके अतिरिक्त श्रीजगन्नाथ मन्दिरकी चार दीवारीमें किसी औरको प्रवेश करनेका अधिकार नहीं है। इसलिये महाप्रभु यदि नीलाचलके श्रीमन्दिरके अन्दर वास करेंगे, तो फिर श्रीहरिदास ठाकुरका वहाँ जानेका अधिकार नहीं होगा। बादमें ऐसा जानकर कि नीलाद्रि (नील समुद्र)के निकट बालूवाले स्थानपर रहनेमें उनके लिये कोई भी बाधा नहीं है, ठाकुर हरिदास वहाँ रहे। आजकल वह स्थान ‘सिद्धबकुल मठ’के नामसे प्रसिद्ध है॥194॥ प्रभु कहे,—“कर तुमि दैन्य-सम्वरण। तोमार दैन्येते मोर व्याकुल हय मन ॥196॥ हरिविमुख स्मार्त्त समाजको धिक्कार देकर ब्राह्मणगुरु वैष्णवाचार्य हरिदास ठाकुरको पुरी ले जानेकी प्रतिज्ञा :— तोमार लागि’ जगन्नाथे करिब निवेदन। तोमा-लञा याब आमि श्रीपुरुषोत्तम ॥”197॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“अपनी दीनताका सम्वरण करो। तुम्हारी दीनताको देखकर मेरा मन व्याकुल हो रहा है। मैं तुम्हारे लिये श्रीजगन्नाथदेवसे निवेदन करूँगा और तुम्हें अपने साथ नीलाचल ले जाऊँगा॥”196-197॥ महाप्रभुसे और कुछ दिन रहनेकी श्रीअद्वैतकी प्रार्थना :— तबे त’ आचार्य कहे विनय करिञा। “दिन दुइ-चारि रह कृपा त’ करिञा॥”198॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीअद्वैतकी इच्छा पूर्ति और सभीको आनन्द :— आचार्येर वाक्य प्रभु ना करे लङ्घन। रहिला अद्वैत-गृहे, ना कैल गमन॥199॥ आनन्दित हैल आचार्य, शची, भक्त-सब। प्रतिदिन करे आचार्य महामहोत्सव॥200॥ अनुवाद—तब श्रीअद्वैताचार्यने विनती करते हुए महाप्रभुसे कहा,—“कृपा करके दो-चार दिन और यहाँ रुक जाइये।” श्रीअद्वैताचार्यके वचनोंका महाप्रभु कभी उल्लङ्घन नहीं करते, इसलिये वे गमन न करके श्रीअद्वैताचार्यके घरमें रुक गये। इससे श्रीअद्वैताचार्य, शचीमाता और सब भक्तोंको बहुत आनन्द हुआ। श्रीअद्वैताचार्यने प्रतिदिन महा-महोत्सव किया॥198-200॥ दिनमें इष्ट-गोष्ठी और रातमें सङ्कीर्तन :— दिने कृष्णरस-कथा भक्तगण-सङ्गे। रात्रे महा-महोत्सव सङ्कीर्त्तन-रङ्गे॥201॥ अनुवाद—महाप्रभु भक्तोंके साथ दिनमें श्रीकृष्णरस- कथाका आस्वादन करते और रातमें सङ्कीर्तन करके महा-महोत्सव मनाते॥201॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुको अपने द्वारा बनाया गया भोजन करते देख माताको आनन्द :— आनन्दित हञा शची करेन रन्धन। सुखे भोजन करे प्रभु लञा भक्तगण॥202॥ अनुवाद—शचीमाता बड़े आनन्दसे रसोई बनातीं । 107
[ 3/202-212 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला और महाप्रभु सभी भक्तोंके साथ सुखपूर्वक भोजन करते॥202॥ महाप्रभुकी सेवासे श्रीअद्वैतका सबकुछ धन्य :- आचार्येर श्रद्धा-भक्ति, गृह-सम्पद्-धने। सकल सफल हैल प्रभुर आगमने॥203॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यकी श्रद्धा-भक्ति, उनका घर, सम्पत्ति, धनादि सब कुछ महाप्रभुकी सेवामें प्रयोग होनेसे सार्थक हो गये॥203॥ शचीमाताका सुख :- शचीर आनन्द बाड़े देखि' पुत्रमुख। भोजन कराञा पूर्ण कैल निजसुख॥204॥ अनुवाद-अपने पुत्र निमाइका मुख देखकर शचीमाताका आनन्द बढ़ता जाता और उसे भोजन कराके उन्होंने अपने अभिलाषित परम सुखको प्राप्त किया॥204॥ श्रीअद्वैतके घरमें कुछ दिन तक अप्राकृत आनन्द :- एइमत अद्वैत-गृहे भक्तगण मिले। वञ्चिला कतकदिन महा-कुतूहले॥205॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीअद्वैताचार्यके घरमें महाप्रभुने भक्तोंके साथ कुछेक दिन आनन्दपूर्वक बिताये॥205॥ महाप्रभुके द्वारा भक्तोंको विदायी देना :- आर दिन प्रभु कहे सब भक्तगणे। "निज-निज-गृहे सबे करह गमने॥206॥ महाप्रभु और भक्त-दोनोंका परस्पर भविष्यमें मिलनके सुयोगका निर्देश :- घरे गिया कर सबे कृष्णसङ्कीर्त्तन। पुनरपि आमा-सङ्गे हइबे मिलन॥207॥ भक्तोंके द्वारा नीलाचल जाने और महाप्रभुके द्वारा नवद्वीपमें आने पर मिलनकी सम्भावना :- कभु वा तोमरा करिबे नीलाद्रि-गमन। कभु वा आसिब आमि करिते गङ्गास्नान॥"208॥ अनुवाद-अगले दिन महाप्रभुने सभी भक्तोंसे कहा,-"अब आप सब अपने-अपने घर जाइये। घर जाकर आप सब श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तन करते रहना। मेरे साथ आपका पुनः मिलन होगा। कभी आप लोग नीलाचलमें आयेंगे और कभी मैं गङ्गास्नान करने यहाँ आऊँगा॥"206-208॥ पुरीके मार्गमें महाप्रभुके साथ श्रीनिताइ आदि चार भक्त; महाप्रभुके द्वारा शचीमाताको सान्त्वना तथा उनकी वन्दनाके बाद यात्रा :- नित्यानन्द-गोसाञि, पण्डित जगदानन्द। दामोदर पण्डित, आर दत्त मुकुन्द॥209॥ एइ चारिजन, आचार्य दिल प्रभु-सने। जननी प्रबोध करि' वन्दिल चरणे॥210॥ ताँरे प्रदक्षिण करि' करिल गमन। एथा आचार्येर घरे उठिल क्रन्दन॥211॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यने श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीदामोदर पण्डित और श्रीमुकुन्द दत्त-इन चार भक्तोंको महाप्रभुके साथ भेजा। महाप्रभुने शचीमाताको सान्त्वना देकर उनके श्रीचरणकमलोंकी वन्दना की और उनकी परिक्रमा करके महाप्रभु नीलाचलकी ओर चल दिये। उस समय श्रीअद्वैताचार्यके घरमें सभी महाप्रभुके वियोगमें ज़ोर-ज़ोरसे रोने लगे॥209-211॥ निरपेक्ष हञा प्रभु शीघ्र चलिला। कान्दिते कान्दिते आचार्य पश्चात् चलिला॥212॥ अनुवाद-परन्तु महाप्रभु निरपेक्ष होकर अर्थात् बिना विचलित हुए शीघ्रतासे वहाँसे चल दिये और श्रीअद्वैताचार्य भी रोते-रोते उनके पीछे चलने लगे॥212॥ अनुभाष्य-'निरपेक्ष'-जड़ीय वस्तुकी अपेक्षा या प्रभावसे मुक्त अपने स्वरूप भगवद्-दास्यमें स्थित रहना निरपेक्ष होना है। बादमें श्रीकृष्णके अन्वेषण कार्यमें 108
तीसरा अध्याय 3/212-218 ] बाधा होगी, इस भयसे स्वजनोंके रोने आदिको सुनकर भी महाप्रभु निष्ठुरकी भाँति नीलाचलकी ओर चल दिये। यद्यपि उनके इस कार्यसे नास्तिक नीतिवादी लोग उन्हें 'अत्यन्त निष्ठुर' कहेंगे, तथापि जगद्गुरुके रूपमें उन्होंने जीवोंके लिये यह शिक्षा दी कि उनका जो सर्वोत्तम परमधर्म श्रीकृष्णसेवा-चेष्टा है, वही एकमात्र प्रयोजनीय कार्य है। असार नाशवान् भोगोंके फलस्वरूप संसारमें ही आसक्ति और बन्धन होनेसे श्रीकृष्णसेवा नहीं हो सकती। इसलिये जगत्की दृष्टिमें अत्यधिक प्रशंसित सुनीति भी यदि श्रीकृष्णसेवाकी विरोधी हो, तो यह पथ महाप्रभुके विचारोंके विरुद्ध है। “निरपेक्ष ना हइले धर्म रक्षणे ना याय” (अर्थात् निरपेक्ष नहीं होनेसे धर्मकी रक्षा नहीं हो सकती) - महाप्रभुके श्रीमुखसे निकली यह वाणी विचारणीय है ॥ 212 ॥ श्रीअद्वैताचार्यको सान्त्वना देकर उनकी विदायी :- कत दूर गिया प्रभु करि' जोड़-हात। आचार्ये प्रबोधि' किछु कहे मिष्ट बात ॥ 213 ॥ “जननी प्रबोध, कर भक्त-समाधान। तुमि व्यग्र हैले कारो ना रहिबे प्राण ॥” 214 ॥ एत बलि' प्रभु ताँरे करि' आलिङ्गन। निवृत्त करिया कैल स्वच्छन्द गमन ॥ 215 ॥ अनुवाद - कुछ दूर जानेपर महाप्रभुने हाथ जोड़कर श्रीअद्वैताचार्य प्रभुको सान्त्वना देते हुए कुछ मधुर वचन कहे, - “आप घर लौटकर शचीमाता तथा भक्तोंको सान्त्वना प्रदान करो। यदि आप ही इस प्रकार व्याकुल हो जायेंगे, तो कोई भी प्राण धारण नहीं कर सकेगा।” यह कहकर महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यका आलिङ्गनकर उन्हें अपने पीछे आनेसे रोककर स्वच्छन्द रूपसे नीलाचलके लिये गमन किया ॥ 213-215 ॥ छत्रभोगके मार्गसे महाप्रभुका पुरीगमन :- गङ्गातीरे-तीरे प्रभु चारिजन-साथे। नीलाद्रि चलिला प्रभु छत्रभोग-पथे ॥ 216 ॥ अनुवाद - महाप्रभु चारों भक्तोंके साथ गङ्गाके किनारे-किनारे छत्रभोगके रास्तेसे होते हुए नीलाचलकी ओर चले ॥ 216 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'छत्रभोग-पथे' - महाप्रभु छत्रभोगके रास्ते गङ्गाके साथ-साथ आटिसार, पाणिहाटी, वराहनगरसे होते हुए चलने लगे। उस समय गङ्गा कलिकाताके दक्षिणसे कालीघाट होकर वारुइपुर आदि स्थानोंसे होकर डायमण्ड-हारबार-सबडिवीजनसे 'मथुरापुर' नामक थानेसे होकर सैकड़ों धाराओंके रूपमें समुद्रमें मिलती थी। महाप्रभु उसी रास्तेसे ही मथुरापुर थानेके अन्तर्गत 'अम्बुलिङ्ग' स्थानसे छत्रभोगके रास्तेसे नीलाचल गये थे॥ 216 ॥ तृतीय अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य - 'छत्रभोग' - चौबीस परगना जिलेमें मगराहाट-स्टेशनसे पूर्व-दक्षिणकी ओर छह-सात कोस दूर जयनगरके दो-तीन कोस दक्षिणमें यह गाँव अवस्थित है। इस गाँवको कोई-कोई 'खाड़ि' कहते हैं। यहाँपर 'बैजुर्कानाथ' नामक शिवलिङ्ग हैं। वहाँ चैत्रमासमें शुक्ला प्रतिपदाके दिन 'नन्दा'- मेला होता है। अब यहाँपर गङ्गा नहीं है। 'आटिसारा' - यह वारुइपुर स्टेशनके निकट है, ऐसा सुना जाता है ॥ 216 ॥ चैतन्यभागवतमें विस्तृत रूपसे वर्णन :- 'चैतन्यमङ्गले' प्रभुर नीलाद्रि गमन । विस्तारि' वर्णियाछेन दास-वृन्दावन ॥ 217 ॥ अद्वैत-गृहे प्रभुर विलास शुने येइ जन । अचिरे मिलये ताँरे कृष्णप्रेम-धन ॥ 218 ॥ अनुवाद - श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने अपने श्रीचैतन्य- मङ्गल (श्रीचैतन्यभागवत) नामक ग्रन्थमें महाप्रभुके श्रीजगन्नाथपुरी गमनकी लीलाका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। श्रीअद्वैताचार्यके घरमें किये गये महाप्रभुके लीला-विलासका यदि कोई श्रवण करता है, तो उसे शीघ्र ही श्रीकृष्णप्रेम-धनकी प्राप्ति होती है। 217-218॥ । 109
[ 3/217–219 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—चैःभाः अन्त्यखण्ड, दूसरा अध्याय देखें। बङ्गालमें आटिसारा गाँव, वराहनगर, अम्बुलिङ्ग- छत्रभोग, उत्कलमें प्रयागघाट, सुवर्णरेखा, जलेश्वर, रेमुणा, याजपुर, वैतरणी, दशाश्वमेधघाट, कटक, महानदी, भुवनेश्वर (बिन्दु-सरोवर), कमलपुर, आठारनाला आदि स्थानोंसे होकर महाप्रभुने श्रीनीलाचलमें प्रवेश किया॥ 217॥ तृतीय अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 219॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे संन्यासकरणाद्वैतगृहे भोजनविलासवरणं नाम तृतीय-परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस चैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 219 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें संन्यास ग्रहण करनेके बाद श्रीअद्वैत-गृहमें भोजन-विलास-वर्णन नामक तीसरा अध्याय समाप्त। 110 ।
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चौथा अध्याय [बायाँ स्तम्भ] कथासार-श्रीमन्महाप्रभु छत्रभोग-पथसे वृद्धमन्त्रेश्वरसे होकर उत्कल राज्यकी एक सीमापर पहुँचे। मार्गमें अनेक प्रकारसे आनन्दमय कीर्तन और भिक्षा आदि करते-करते रेमुणाग्राममें श्रीगोपीनाथके दर्शन किये। वहाँ परमानन्दित होकर उन्होंने अपने भक्तोंको श्रीईश्वरपुरीके द्वारा कही गयी श्रीमाधवेन्द्र पुरीसे सम्बन्धित कथाका वर्णन किया। पूर्वकालमें श्रीमाधवेन्द्रपुरी जब वृन्दावन गये थे, तब उन्होंने गोवर्धनमें रातके समय 'वनमें गोपाल हैं'—यह स्वप्न देखा। उस स्वप्नको देखनेके बाद उन्होंने अगले दिन प्रातःकालमें गोवर्धनवासियोंको लेकर वनसे श्रीगोपालमूर्तिको बाहर निकालकर पर्वतके ऊपर स्थापित किया। महासमारोहके साथ श्रीगोपालकी पूजा और अन्नकूट महोत्सव हुआ। इस बातका क्रमशः प्रचार होनेसे बहुतसे गाँवोंसे अनेक लोग आकर श्रीगोपालका महोत्सव करने लगे। श्रीगोपालने एक रात श्रीमाधवेन्द्रपुरीको यह स्वप्न दिया,—“तुम बिना देरी किये नीलाचल जाकर मलयज चन्दनको संग्रह करके (यहाँपर ले आओ और उसे घिसकर) मेरे शरीरपर लगाकर मेरा ताप दूर करो।” गोपालजीकी आज्ञा पाकर पुरी गोस्वामी बङ्गालसे होते हुए उत्कलदेश (उड़ीसा)के रेमुणा नामक गाँवमें पहुँचे, वहाँ श्रीगोपीनाथके द्वारा प्रदान किये खीर-प्रसादको पाकर उन्होंने श्रीपुरुषोत्तमकी ओर गमन किया। श्रीमाधवेन्द्रपुरीको श्रीगोपीनाथजीने चोरी करके खीर प्रदान की थी, इसलिये उनका नाम ‘क्षीरचोरा गोपीनाथ’ हो गया है। नीलाचल पहुँचकर श्रीजगन्नाथदेवके सेवकोंके द्वारा राजकर्मचारियोंसे एक मन (लगभग 36 किलो) चन्दन और बीस तोला (लगभग 250 ग्राम) श्रीकर्पूर एकत्रित करके, दो व्यक्तियोंके द्वारा इन दोनों वस्तुओंको लेकर वे पुनः [दायाँ स्तम्भ] रेमुणा आये। तब गोवर्धनधारी श्रीगोपालने उन्हें पुनः स्वप्नमें आज्ञा दी,—“इस चन्दन और कर्पूरको गोपीनाथके अङ्गोंमें लगानेसे मेरा ताप दूर हो जायेगा।” श्रीमाधवेन्द्रपुरी उनकी उस आज्ञाका पालन करके पुनः नीलाचल चले गये। महाप्रभुने इस इतिहासको श्रीनित्यानन्द आदि भक्तोंको सुनाकर श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी विशुद्ध प्रेमभक्तिकी बहुत प्रशंसा की। श्रीमाधवेन्द्रपुरीके द्वारा रचित श्लोकका पाठ करनेसे महाप्रभुमें प्रेमोन्माद उदित हुआ। लोगोंकी भीड़को देखकर महाप्रभुको बाह्यज्ञान होनेपर उन्होंने खीर प्रसाद पाकर वह रात्रि वहीं व्यतीत करके अगले दिन नीलाचलकी यात्रा की। —(अमृतप्रवाहभाष्य) ‘क्षीरचोरा गोपीनाथ’-सेवक श्रीमाधवेन्द्रपुरीको प्रणाम :— यस्मै दातुं चोरयन् क्षीरभाण्डं गोपीनाथः क्षीरचोराभिधोऽभूत्। श्रीगोपालः प्रादुरासीद्दृशः सन् यत्प्रेम्णा तं माधवेन्द्रं नतोऽस्मि ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनको खीर अर्पण करनेके लिये खीरके भाण्ड (कुल्हड़) की चोरी करके श्रीगोपीनाथका ‘क्षीरचोरा’-नाम हुआ था और जिनकी भक्तिके वशीभूत होकर श्रीगोपालदेव प्रकाशित हुए थे, उन श्रीमाधवेन्द्रपुरीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ 1 ॥ अनुभाष्य— गोपीनाथः (रेमुणा-ग्रामस्थस्तन्नामप्रसिद्धः श्रीविग्रहः) क्षीरभाण्डं (पायसान्नपूर्णं पात्रं) चोरयन् (अपहरण) यस्मै (श्रीमाधवेन्द्राय) दातुं क्षीरचोराभिधः अभूत (क्षीरचोरागोपीनाथेति संज्ञां प्राप्तवान्); यत् (यस्य माधवेन्द्रस्य) प्रेमणा वशः (वशीभूतः सन्) । 113
[ 4/1-10 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीगोपालः (वज्रस्थापितविग्रहः गोवर्धनधारी) प्रादुरासीत् (प्रादुर्बभूव); तं माधवेन्द्रं (लक्ष्मीपतिशिष्यं माधवसम्प्रदायगुरुं माधवेन्द्रपुरीं) नतोऽस्मि। श्लोक-भावानुवाद—जिनको देनेके लिये रेमुणा ग्राममें स्थित श्रीगोपीनाथ नामसे प्रसिद्ध श्रीविग्रहका नाम खीरका कुल्हड़ चुरानेके कारण 'क्षीरचोरगोपीनाथ' हुआ था तथा जिनके प्रेमके वशीभूत होकर व्रजनाभके द्वारा स्थापित गोवर्धनधारी श्रीगोपालके रूपमें प्रकाशित हुए थे, उन श्रीलक्ष्मीपतिके शिष्य मध्वसम्प्रदायके गुरु श्रीमाधवेन्द्रपुरीको मैं नमन करता हूँ॥१॥ जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥२॥ अनुवाद—श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो और समस्त श्रीगौरभक्तोंकी जय हो॥२॥ चैतन्यभागवतमें महाप्रभुके नीलाचल गमनके बादकी अन्य-अन्य लीलाएँ मधुररूपसे वर्णित :- नीलाद्रि-गमन, जगन्नाथ-दरशन। सार्वभौम भट्टाचार्य-प्रभुर मिलन॥३॥ ए सकल लीला श्रीदास-वृन्दावन। विस्तारि' वर्णियाछेन उत्तम वर्णन॥४॥ सहजे विचित्र मधुर चैतन्य-विहार। वृन्दावनदास-मुखे अमृतेर धार॥५॥ पुनरुक्ति और दम्भ अथवा श्रौतपन्थाके विरोधके भयसे ग्रन्थकार निवृत्त :- अतएव ताहा वर्णिले हय पुनरुक्ति। दम्भ करि' वर्णि यदि नाहि तैछे शक्ति॥६॥ अनुवाद—महाप्रभुका नीलाचल जाना, श्रीजगन्नाथका दर्शन करना और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके साथ उनका मिलन-इन सब लीलाओंका श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने विस्तारपूर्वक अपने ग्रन्थ श्रीचैतन्यभागवतमें उत्तम रूपसे वर्णन किया है। महाप्रभुकी लीलाएँ स्वाभाविक रूपसे मधुर और विचित्र हैं, परन्तु श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके श्रीमुखसे निकलनेपर तो वे अमृतकी धाराके समान प्रतीत होती हैं। इसलिये उन लीलाओंका पुनः वर्णन करनेसे पुनरुक्ति होगी और यदि दम्भ करके मैं उनका वर्णन करना भी चाहूँ, तो मुझमें ऐसी शक्ति नहीं है॥३-6॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'ए सकल लीला'—ये सब लीलाएँ। श्रीचैतन्यभागवतके अन्त्यखण्डके दूसरे और तीसरे अध्यायमें इन्हें देखें॥४॥ चैतन्यभागवतमें विस्तृत रूपसे जो वर्णन हुआ है, उसका इस ग्रन्थमें संक्षेपमें और उसमें जो संक्षेपमें है, उसका इस ग्रन्थमें विस्तृत रूपसे वर्णन :- चैतन्यमङ्गले याहा करिल वर्णन। सूत्ररूपे सेइ लीला करिये सूचन॥७॥ ताँर सूत्रे आछे, तँह ना कैल वर्णन। यथा-कथञ्चित् करि' से लीला-कथन॥८॥ ग्रन्थकारका अतुलनीय मानद-धर्म— वृन्दावनदासकी वन्दना :- अतएव ताँर पाये करि नमस्कार। ताँर पाय अपराध ना हउक् आमार॥९॥ अनुवाद—श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थ श्रीचैतन्यमङ्गल (श्रीचैतन्यभागवत)में जिन लीलाओंका विस्तारसे वर्णन किया है, उन लीलाओंको मैं संक्षेपमें लिखूँगा। जिन लीलाओंका उन्होंने सूत्ररूपसे वर्णन किया है, अथवा जिन लीलाओंका उन्होंने वर्णन नहीं किया है, उन सबका मैं अपने सामर्थ्यानुसार विस्तारसे वर्णन करनेकी चेष्टा करूँगा। इसलिये मैं श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके श्रीचरणोंमें दीनतापूर्वक नमस्कार करता हूँ, जिससे उनके श्रीचरणोंमें मेरा कोई अपराध न हो॥७-9॥ श्रीनित्यानन्दादि चार भक्तोंके साथ महाप्रभुकी पुरीके लिये यात्रा :- एइमत महाप्रभु चलिला नीलाचले। चारिभक्त-सङ्गे कृष्णकीर्त्तन कुतूहले॥१०॥ 114 ।
चौथा अध्याय 4/10-21 ] भिक्षा लागि' एकदिन एक ग्राम गिया। आपने अनेक अन्न आनिल मागिया ॥ 11 ॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने चार भक्तोंके साथ उत्कण्ठापूर्वक श्रीकृष्णनामका कीर्तन करते हुए नीलाचलकी ओर प्रस्थान किया। महाप्रभु स्वयं एक-एक दिन एक-एक ग्राममें भिक्षा माँगनेके लिये जाते और बहुतसे चावल-दालादि ले आते॥10-11॥ महाप्रभुका रेमुणा पहुँचना और श्रीगोपीनाथ-दर्शन :- पथे बड़ बड़ दानी विघ्न नाहि करे। ता' सबारे कृपा करि' आइला रेमुणारे ॥ 12 ॥ रेमुणाते गोपीनाथ परम-मोहन। भक्ति करि' कैल प्रभु ताँर दरशन ॥ 13 ॥ ताँर पादपद्म-निकट प्रणाम करिते। ताँर पुष्प-चूड़ा पड़िल प्रभुर माथाते ॥ 14 ॥ अनुवाद—मार्गमें अनेक स्थानोंपर 'बड़े-बड़े दानी' अर्थात् पथ-कर संग्रह करनेवाले बलवान व्यक्ति थे, परन्तु किसीने भी महाप्रभुको रोककर कर नहीं लिया। महाप्रभु उन सबपर कृपा करते हुए रेमुणामें आये। रेमुणामें परम मनोहर श्रीगोपीनाथ विराजमान हैं, महाप्रभुने बड़े भक्तिभावसे उनका दर्शन किया। महाप्रभुने श्रीगोपीनाथके श्रीचरणकमलोंके निकट जाकर प्रणाम किया, तभी श्रीगोपीनाथका पुष्प-मुकुट गिरकर महाप्रभुके मस्तकपर जा पड़ा॥12-14॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'दानी'—घाटके माँझी (शुल्क संग्रह करनेवाले)। रेमुणा'—बालेश्वरके निकट (पाँच मील पश्चिममें) रेमुणा नामका ग्राम है। वहाँ 'क्षीरचोरा गोपीनाथ' विराजमान हैं॥12-13॥ अनुभाष्य—'रेमुणा'—मध्यलीला 1/97 संख्याका अनुभाष्य देखें। इस स्थानमें 'श्रीगोपीनाथ'-विग्रह है और श्रीश्यामानन्द प्रभुके सेवक श्रीरसिकानन्द प्रभुकी समाधि आज भी विद्यमान है॥12॥ महाप्रभुका नृत्य-कीर्तन और विग्रहके सेवकोंके द्वारा महाप्रभुकी पूजा :- चूड़ा पाञा महाप्रभुर आनन्दित मन। बहु नृत्यगीत कैल लञा भक्तगण ॥ 15 ॥ प्रभुर प्रभाव देखि' प्रेम-रूप-गुण। विस्मित हइला गोपीनाथेर दासगण ॥ 16 ॥ नानारूपे प्रीत्ये कैल प्रभुर सेवन। सेइ रात्रि ताँहा प्रभु करिला वञ्चन ॥ 17 ॥ अनुवाद—पुष्प-मुकुटको पाकर महाप्रभुको बहुत आनन्द हुआ और वे भक्तोंके साथ मिलकर नृत्य-कीर्तन करने लगे। महाप्रभुके अलौकिक भाव, उनका श्रीकृष्णमें प्रेम, उनके रूप और गुणोंको देखकर श्रीगोपीनाथके सेवक विस्मित हो गये। उन सेवकोंने अनेक प्रकारसे प्रीतिपूर्वक महाप्रभुकी सेवा की। महाप्रभुने वह रात श्रीगोपीनाथ-मन्दिरमें ही बितायी॥15-17॥ अनुभाष्य—'वञ्चन'—यापन अर्थात् बिताना॥17॥ गुरुमुखसे सुने श्रीकृष्णके भक्तवात्सल्योद्दीपक क्षीरप्रसादके सम्मानार्थ महाप्रभुकी वहाँ अपेक्षा :- महाप्रसाद-क्षीर-लोभे रहिला प्रभु तथा। पूर्वे ईश्वरपुरी ताँरे कहियाछेन कथा ॥ 18 ॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथके खीररूपी महाप्रसादके लोभसे महाप्रभु वहीं रहे। महाप्रभुके गुरुदेव श्रीईश्वरपुरीने पहले स्वयं उनको खीरकी महिमा बतलायी थी॥18॥ भक्तोंके समक्ष महाप्रभुके द्वारा भक्त-माधवेन्द्रपुरीके लिये श्रीगोपीनाथका 'क्षीरचोरा' बननेके प्रसङ्गका वर्णन :- 'क्षीरचोरा गोपीनाथ' प्रसिद्ध ताँर नाम। भक्तगणे कहे प्रभु सेइ त' आख्यान ॥ 19 ॥ पूर्वे माधव-पुरीर लागि' क्षीर कैल चुरि। अतएव नाम हैल 'क्षीरचोरा हरि' ॥ 20 ॥ पूर्वे श्रीमाधव-पुरी आइला वृन्दावन। भ्रमिते भ्रमिते गेला यथा गोवर्धन ॥ 21 ॥ । 115
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[ 4/19–31 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—श्रीगोपीनाथ कैसे ‘क्षीरचोरा गोपीनाथ'के नामसे प्रसिद्ध हुए, महाप्रभुने इस कथाको अपने भक्तोंको सुनाया। पूर्वकालमें श्रीगोपीनाथने अपने भक्त श्रीमाधवेन्द्रपुरीके लिये खीरकी चोरी की थी, इसलिये उनका नाम ‘क्षीरचोर गोपीनाथ’ हो गया था। एक बार श्रीमाधवेन्द्रपुरी वृन्दावन आये थे और भ्रमण करते-करते वे गिरिराज गोवर्धन पहुँचे॥ 19–21॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘माधव-पुरी’—माधवेन्द्रपुरी ॥ 20 ॥ निरन्तर कृष्णप्रेममें मत्त श्रीमाधवेन्द्रपुरी :— प्रेमे मत्त,—नाहि ताँर रात्रिदिन-ज्ञान। क्षणे उठे, क्षणे पड़े, नाहि स्थानास्थान॥ 22 ॥ शैल परिक्रमा करि’ गोविन्दकुण्डे आसिं’। स्नान करि, वृक्षतले आछे सन्ध्याय बसिं’ ॥ 23 ॥ अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्र पुरी प्रेममें ऐसे मत्त रहते कि उनको रात-दिनका कोई भी ज्ञान नहीं रहता था। प्रेमावेशमें वे एक क्षण उठकर खड़े होते और अगले क्षण भूमिपर गिर पड़ते, वह स्थान पवित्र है अथवा अपवित्र, उन्हें कुछ भी ध्यान नहीं रहता था। एक दिन गिरिराज गोवर्धनकी परिक्रमा करके उन्होंने गोविन्दकुण्डमें आकर स्नान किया। स्नान करके सन्ध्याके समय वे एक वृक्षके नीचे बैठे हुए थे॥ 22–23 ॥ अनुभाष्य—‘शैल’—गोवर्धन पर्वत, मथुरासे आठ कोस दूर ॥ 23 ॥ गोपबालकके वेशमें श्रीकृष्णके द्वारा अपने भक्त श्रीमाधवेन्द्रपुरीको दुग्ध-दान :— गोप-बालक एक दुग्ध-भाण्ड लञा। आसिं’ आगे धरि' किछु बलिल हासिया ॥ 24 ॥ “पुरी, एइ दुग्ध लञा कर तुम पान। मागिं’ केने नाहि खाओ, किंवा कर ध्यान॥” 25 ॥ बालकेर सौन्दर्ये पुरीर हइल सन्तोष। ताहार मधुर-वाक्ये गेल भोक-शोष ॥ 26 ॥ अनुवाद—तभी एक गोपबालक दूधसे भरा पात्र लेकर आया और उसे उनके आगे रखकर मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए उनसे कहने लगा,—“हे माधवेन्द्रपुरी! तुम यह दूध लेकर पी लो। कुछ माँगकर खाते क्यों नहीं हो? और किसका ध्यान कर रहे हो?” उस बालकके सौन्दर्यको देखकर श्रीमाधवेन्द्रपुरी बहुत प्रसन्न हुए और उसके मधुर वचन सुनकर उनकी भूख-प्यास भी दूर हो गयी ॥ 24–26 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘भोक-शोष’—भूख और प्यास ॥ 26 ॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके द्वारा बालकके परिचयकी जिज्ञासा :— पुरी कहे,—“के तुमि, काँहा तोमार वास। केमते जानिले, आमि करि उपवास॥” 27 ॥ अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उस बालकसे पूछा,—“तुम कौन हो? कहाँ रहते हो? तुम्हें कैसे पता चला कि मैंने आज उपवास किया है?॥” 27 ॥ बालकके द्वारा आत्मगोपन :— बालक कहे,—“गोप आमि, एइ ग्रामे बसि। आमार ग्रामेते केह ना रहे उपवासी ॥ 28 ॥ केह अन्न मागि' खाय, केह दुग्धाहार। अयाचक-जने आमि दिये त' आहार ॥ 29 ॥ जल निते स्त्रीगण तोमारे देखि' गेल। स्त्रीगण दुग्ध दिया आमारे पाठाइल॥ 30 ॥ गोदोहन करिते चाहि, शीघ्र आमि याब। पुनः आसिं' आमि एइ भाण्ड लइब॥” 31 ॥ अनुवाद—उस बालकने उत्तर दिया,—“मैं एक गोप हूँ और इसी गाँवमें रहता हूँ। हमारे गाँवमें कोई भी भूखा नहीं रहता। यहाँ कोई अन्न माँगकर खा लेता है या कोई केवल दूध माँगकर पी लेता है। और भिक्षा न माँगनेवालेको मैं स्वयं ही आहार पहुँचा देता हूँ। मेरे गाँवकी कुछ स्त्रियाँ जल लेनेके लिये इस कुण्डपर 116 ।
चौथा अध्याय 4/28-40 ] आयी थीं और उन्होंने तुम्हें देखा था। उन स्त्रियोंने ही दूध देकर मुझे यहाँ भेजा है। अभी मुझे जल्दीसे गाय दुहनेके लिये जाना है, मैं पुनः आकर इस दूधके पात्रको ले जाऊँगा॥”28-31॥ दूध देकर बालकका अन्तर्धान होना :- एत बलि' गेला बालक ना देखिये आर। माधव-पुरीर चित्ते हैल चमत्कार ॥ 32 ॥ दूध पीनेके बाद श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी बालकके लिये प्रतीक्षा :- दुग्ध पान करि' भाण्ड धुञा राखिल। बाट देखे, से बालक पुनः ना आइल ॥ 33 ॥ अनुवाद-इतना कहकर वह गोपबालक वहाँसे चला गया मानो वह अन्तर्धान हो गया हो। दूध पीकर श्रीमाधवेन्द्रपुरीके चित्तमें चमत्कार हो गया। दूध पीकर तब श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उस बर्तनको धोकर रख दिया और उस बालककी बाट देखने लगे, परन्तु वह बालक फिर लौटकर नहीं आया ॥ 32-33 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'बाट' - राह, उड़िया भाषाका शब्द ॥ 33 ॥ समाधिमें बालकरूपी श्रीकृष्णका दर्शन :- बसि' नाम लय पुरी, नाहि निद्रा हय। शेषरात्रे तन्द्रा हैल, - बाह्यवृत्ति-लय ॥ 34 ॥ अनुवाद-श्रीमाधवेन्द्रपुरी वहीं बैठकर नाम जप करने लगे, रातमें भी उनको नींद नहीं आयी। रातके अन्तमें उन्हें तन्द्रा आ गयी और उनकी बाह्य चेतना लुप्त हो गयी ॥ 34 ॥ अनुभाष्य - 'नाम' - हरिनाम । 'बाह्यवृत्ति-लय' - भक्तिमें समाहित (समाधिस्थ) हो गये ॥ 34 ॥ स्वप्नमें श्रीमाधवेन्द्रपुरीको बालकरूपी श्रीकृष्णके द्वारा एक कुञ्जमें लाना :- स्वप्न देखे, सेइ बालक सम्मुखे आसिञा। एक कुञ्जे लञा गेल हातेते धरिञा ॥ 35 ॥ सेवामें शिथिलताके कारण गिरिधारीके द्वारा दुःख प्रकट करना :- कुञ्ज देखाञा कहे, - "आमि एइ कुञ्जे रइ। शीत-वृष्टि-वाताग्निते महा-दुःख पाइ ॥ 36 ॥ गिरिराजके ऊपर एक मठ निर्माण करके गिरिधारी गोपालकी प्रतिष्ठा करनेका आदेश :- ग्रामेर लोक आनि' आमा काढ़' कुञ्ज हैते। पर्वत-उपरि लञा राख भालमते ॥ 37 ॥ एक मठ करि' ताँहा करह स्थापन। बहु शीतल जले कर श्रीअङ्ग मार्जन ॥ 38 ॥ अनुवाद-श्रीमाधवेन्द्रपुरीने स्वप्नमें देखा कि वही गोपबालक उनके सामने आया और उनको हाथसे पकड़कर एक कुञ्जमें ले गया। कुञ्ज दिखाते हुए उसने कहा, - “मैं इस कुञ्जमें रहता हूँ। सर्दी, गर्मी, वर्षा और आँधी-तूफानके कारण बहुत कष्ट पाता हूँ। तुम गाँवके लोगोंको लाकर मुझे इस कुञ्जसे बाहर निकालो और मुझे भलीभाँति गिरिराजके ऊपर विराजमान कर दो। उस स्थानपर एक मन्दिर स्थापित करो। फिर बहुतसा शीतल जल लाकर मेरे श्रीअङ्गोंका मार्जन करो ॥ 35-38 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'काढ़' - बाहर करो; 'मठ' - मन्दिर ॥ 37 ॥ भक्तकी प्रतीक्षा में भगवान् :- बहुदिन तोमार पथ करि निरीक्षण। कबै आसि' माधव आमा करिबे सेवन ॥ 39 ॥ तोमार प्रेमवशे करि' सेवा अङ्गीकार। दर्शन दिया निस्तारिब सकल संसार ॥ 40 ॥ अनुवाद-मैं बहुत दिनोंसे तुम्हारी राह देख रहा था कि कब माधवेन्द्रपुरी यहाँ आयेगा और मेरी सेवा करेगा। तुम्हारे प्रेमके वशीभूत होकर मैं तुम्हारी सेवा स्वीकार करूँगा और अपने दर्शन देकर संसारके समस्त लोगोंका उद्धार करूँगा ॥ 39-40 ॥ । 117
[ 4/41-51 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीगिरिधारीके द्वारा अपना परिचय प्रदान :- 'श्रीगोपाल' नाम मोर, —गोवर्धनधारी। वज्रेर स्थापित, आमि इँहा अधिकारी ॥ 41 ॥ शैल-उपरि हैते आमा कुञ्जे लुकाञा। म्लेच्छ-भये सेवक मोर गेल पलाञा ॥ 42 ॥ सेइ हैते रहि आमि एइ कुञ्ज-स्थाने। भाल, आइला तुमि, आमा काढ़ सावधाने ॥"43 ॥ अनुवाद—मैं गोवर्धनधारी हूँ और मेरा नाम 'श्रीगोपाल' है। वज्रनाभने मुझे स्थापित किया था और मैं यहाँका अधिकारी हूँ। म्लेच्छोंके भयसे मेरा सेवक मुझे गोवर्धनके ऊपरसे लाकर इस कुञ्जमें छिपाकर स्वयं भाग गया था। तभीसे मैं इस कुञ्जमें रह रहा हूँ। अच्छा हुआ जो तुम आ गये, अब सावधानीपूर्वक मुझे यहाँसे निकालो॥"41-43 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'वज्रेर स्थापित' - श्रीकृष्णके पौत्र अनिरुद्धके पुत्र वज्रनाभको पाण्डवोंने द्वारकासे लाकर मथुराका राजा बनाया था। वज्रनाभने श्रीकृष्णकी लीलाओंके सभी स्थानोंको खोजकर कुछेक श्रीमूर्तियोंकी स्थापना की थी। श्रीगोवर्धनधारी गोपाल उन्हीं श्रीमूर्तियोंमेंसे ही एक श्रीमूर्त्ति है ॥ 41 ॥ गोपालका अन्तर्धान होना :- एत बलि' येइ बालक अन्तर्धान हैल। जागिया माधवपुरी विचार करिल ॥ 44 ॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीका विचार :- 'श्रीकृष्णके देखिनु मुञि नारिनु चिन्तेि।' एत बलि' प्रेमावेशे पड़िला भूमिते ॥ 45 ॥ अनुवाद—यह कहकर वह बालक अन्तर्धान हो गया। तब श्रीमाधवेन्द्रपुरीने जागकर स्वप्नमें जो देखा, उसपर विचार करने लगे, – “हाय ! हाय ! श्रीकृष्णको देखकर भी मैं उन्हें पहचान न सका।" ऐसा कहकर वे प्रेमावेशमें पछाड़ खाकर भूमिपर गिर पड़े॥ 44-45 ॥ गिरिधारीको प्रकट करनेके लिये श्रीमाधवेन्द्रपुरीका यत्न :- क्षणेक रोदन करि' मन कैल स्थिर। आज्ञा-पालन लागि' हइला सुस्थिर ॥ 46 ॥ प्रातः स्नान करि' पुरी ग्राममध्ये गेला। सब लोक एकत्र करि' कहिते लागिला ॥ 47 ॥ ग्रामवासियोंको सहायताके लिये प्रेरित करना :- "ग्रामेर ईश्वर तोमार - गोवर्धनधारी। कुञ्जे आछे, चल, ताँरे बाहिर ये करि ॥ 48 ॥ कुठारि, कोदालि लह द्वारा करिते। अत्यन्त निविड़ कुञ्ज, – नारि प्रवेशिते ॥ "49 ॥ अनुवाद-तब कुछ समय तक रोनेके बाद उन्होंने मनमें धैर्य धारण किया और श्रीगोपालकी आज्ञाका पालन करनेके लिये तैयार हो गये। प्रातःकाल स्नान करनेके बाद श्रीमाधवेन्द्रपुरी गाँवमें गये और सब लोगोंको एकत्रित करके कहने लगे, – “तुम्हारे गाँवके ईश्वर श्रीगोवर्धनधारी एक कुञ्जमें पड़े हुए हैं। चलो, हम सब उनको वहाँसे उन्हें बाहर निकालें। वह कुञ्ज बहुत ही घना है, उसमें कोई प्रवेश नहीं कर सकता। इसलिये रास्ता बनानेके लिये अपने साथ कुल्हाड़ियाँ और फावड़े ले चलो॥" 46-49 ॥ सभी ग्रामवासियोंका मिलकर प्रयत्न :- शुनि' लोक ताँर सङ्गे चलिला हरिषे। कुञ्ज काटि' द्वार करि' करिला प्रवेशे ॥ 50 ॥ अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी बात सुनकर गाँवके लोग हर्षित होकर उनके साथ चल पड़े। और वहाँ जाकर कुञ्जकी झाड़ियों आदिको काटकर रास्ता बनाकर उसमें प्रवेश किया ॥ 50 ॥ सभीको छिपे हुए श्रीगिरिधारीका दर्शन और आनन्द :- ठाकुर देखिल माटी-तृणे आच्छादित। देखि' सब लोक हैल आनन्दे विस्मित ॥ 51 ॥ 118 |
चौथा अध्याय 4/51-63 ] अनुवाद—उन्होंने देखा कि धूल-मिट्टी और तिनकोंसे ढके हुए हैं। श्रीगोपालको देखकर वे सब लोग बहुत आनन्दित और विस्मित हुए॥51॥ विग्रहका अत्यधिक भार :- आवरण दूर करि' करिल चिह्निते। महा-भारि ठाकुर-केह नारे चालाइते॥52॥ महा-महा-बलिष्ठ लोक एकत्र करिया। पर्वत-उपरि गेल पुरी ठाकुर लञा॥53॥ पर्वतके ऊपर विग्रहका अभिषेक आरम्भ :- पाथरेर सिंहासने ठाकुर बसाइल। बड़ एक पाथर पृष्ठे अवलम्ब दिल॥54॥ अनुवाद—मिट्टी-तृणादिके आवरणको हटानेके बाद उन्होंने देखा कि श्रीगोपाल तो बहुत भारी हैं, कोई भी उनको हिला तक नहीं पा रहा है। तब बड़े-बड़े बलवान लोगोंको इकट्ठा करके उनके द्वारा श्रीगोपालको उठवाकर श्रीमाधवेन्द्रपुरी पर्वतके ऊपर ले गये। एक बड़े पत्थरको सिंहासन बनाकर श्रीगोपालको उसपर बैठाया और उनको सहारा देनेके लिये पीछे एक बड़ा पत्थर लगाया॥52-54॥ नैवेद्य और पूजाके उपकरण :- ग्रामेर ब्राह्मण सब नवघट लञा। गोविन्द-कुण्डेर जल आनिल छानिञा॥55॥ नवशतघट जल कैल उपनीत। नाना वाद्य-भेरी बाजे, स्त्रीगण गाय गीत॥56॥ केह गाय, केह नाचे, महोत्सव हैल। दधि, दुग्ध, घृत आइल ग्रामे यत छिल॥57॥ भोग-सामग्री आइल सन्देशादि यत। नाना उपहार, ताहा कहिते पारि कत॥58॥ तुलसी आदि, पुष्प, वस्त्र आइल अनेक। आपने माधवपुरी कैल अभिषेक॥59॥ अङ्गमला दूर करि' कराइल स्नान। बहु तैल दिया कैल श्रीअङ्ग चिक्कण॥60॥ पञ्चगव्य, पञ्चामृते स्नान कराञा। महास्नान कराइल शत घट दिञा॥61॥ पुनः तैल दिया कैल श्रीअङ्ग चिक्कण। शङ्ख-गन्धोदके कैल स्नान समाधान॥62॥ श्रीअङ्ग मार्जन करि' वस्त्र पराइल। चन्दन, तुलसी, पुष्प-माला अङ्गे दिल॥63॥ अनुवाद—गाँवके सब ब्राह्मण नये-नये घड़े लेकर गोविन्द कुण्डके जलको छानकर लाने लगे। इस प्रकार एक सौ नये घड़े जल आ गया। तब अनेक प्रकारके भेरी आदि वाद्ययन्त्र बजने लगे और स्त्रियाँ मधुर स्वरसे गीत गाने लगीं। कोई गा रहा था, तो कोई नाच रहा था, इस प्रकार वहाँ एक महोत्सव होने लगा। गाँवमें जितना भी दही, दूध और घी था, सब वहाँ लाया गया। भोग सामग्रीके लिये जितने प्रकारके सन्देशादि मिष्ठान्न और उपहार लाये गये, उनको मैं बतला नहीं सकता। गाँवके लोग तुलसी, पुष्प और अनेक प्रकारके वस्त्र ले आये और स्वयं श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपाल-विग्रहका अभिषेक किया। मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए श्रीविग्रहके ऊपर चढ़े धूल-तृणादि मैलको दूर किया गया। तब श्रीविग्रहको स्नान कराना आरम्भ किया। सबसे पहले श्रीविग्रहकी बहुत मात्रामें सुगन्धित तेलसे मालिश करके उनके श्रीअङ्गोंको चमकाया। तब पञ्चगव्य और पञ्चामृतसे स्नान कराके सौ घड़ोंमें लाये जल और घीके द्वारा महास्नान कराया। महास्नानके बाद फिरसे सुगन्धित तेल मलकर श्रीविग्रहके अङ्गोंको चमकाया गया तथा शङ्खमें सुगन्धित जल भरकर स्नान कराया। इस प्रकार श्रीगोपालके श्रीअङ्गोंका मार्जन हो जानेके बाद श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उन्हें वस्त्र पहनाये तथा श्रीअङ्गोंमें चन्दन, तुलसी और पुष्पमाला आदि अर्पण किये॥55-63॥ । 119
[ 4/60-65 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अमृतप्रवाह भाष्य- 'पञ्चगव्य' - दूध, दही, घी, गोमूत्र एवं गोबर; 'पञ्चामृत'-दही, दूध, घी, शहद एवं चीनी। 'शङ्ख-गन्धोदक'-शङ्खोदक अर्थात् शंखमें रखा हुआ पुष्प-चन्दन मिश्रित सुगन्धित जल ॥ 61-62 ॥
अनुभाष्य-हःभःविः छठा विभाग- “ततः शङ्खेनाभिषेकं कुर्याद् घण्टादिनिःस्वनैः। मूलेनाष्टाक्षरेणपि धूपयन्नन्तरान्तरा॥” 65॥
अर्थात् “स्नानपात्रमें श्रीभगवान्की मूर्तिको रखकर घण्टा आदि वाद्य-यन्त्रोंके साथ धूप अर्पण करते हुए शङ्खमें रखे जलके द्वारा बीच-बीचमें अष्टाक्षर मूल-मन्त्रके साथ अभिषेक करना चाहिये।”
यवचूर्ण ('जौ'का चूर्ण), गोधूमचूर्ण (गेहूँका चूर्ण), लोध्रचूर्ण (एक विशेष प्रकारके वृक्षके तनेसे बना चूर्ण), कुङ्कुमचूर्ण, मसूरचूर्णके द्वारा साफ करना चाहिये। बेसन और हल्दीके उबटनके द्वारा और 'खस' आदिसे निर्मित कूची, गायकी पूँछके बालोंसे बनी हुई कूची आदिसे अङ्गोंकी मैल दूर होती है। हःभःविः छठा विभाग-
“तत्र तु प्रथमं भक्त्या विदधीत सुगन्धिभिः। दिव्यैस्तैलादिभिर्द्रव्यैरभ्यङ्गं श्रीहरेः शनैः॥ 66 ॥ अभ्यङ्गद्रव्याणि- मालतीयूथीमादाय सुगन्धानान्तु वा पुनः॥ 67 ॥ तथान्यपुष्पजातीनां गृहीत्वा भक्तितो नराः॥ 68क ॥ यः पुनः पुष्पशैलेन दिव्योपधियुतेन हि॥ 69ख॥ अभ्यङ्गं कुरुते विष्णोर्मध्ये क्षिप्त्वा तु कुङ्कुमम्॥ 70क॥ गन्ध-तैलानि दिव्यानि सुगन्धीनि शुचीनि च॥” 71क ॥
अर्थात् “स्नानकार्यमें पहले दिव्य सुगन्धित तेलादि द्रव्योंके द्वारा भक्तिपूर्वक धीरे-धीरे श्रीहरिके सभी अङ्गोंको मलना चाहिये। मालती, यूथि, या अन्य-अन्य सुगन्धवाले पुष्पोंको लेकर और दिव्य औषधियुक्त कुङ्कुम-मिश्रित सुगन्धित पवित्र पुष्प-तेलके द्वारा भक्तिसहित श्रीविष्णुके अङ्गोंको मलना आवश्यक है।”
हःभःविः छठा विभाग- “ततः शङ्खभृतेनैव क्षीरेण स्नापयेत् क्रमात्। दध्ना घृतेन मधुना खण्डेन च पृथक् पृथक्॥” 72 ॥
अर्थात् “श्रीविष्णुके श्रीअङ्गोंको मलनेके बाद शङ्खमें दूध, दही, घी, शहद और चीनी डालकर क्रमानुसार पृथक्-पृथक्रूपसे स्नान कराना चाहिये।”
'महास्नान'-हःभःविः छठा विभाग- “द्वे सहस्रे पलानान्तु महास्नाने च संख्या॥” 75ख ॥
अर्थात् “देव-प्रतिमाको घीसे स्नान कराना होता है। महास्नानमें घी और स्नानजल, - प्रत्येकका परिमाण दो हजार 'पल' होता है। एक 'पल' चार 'तोला'के बराबर होता है, इस हिसाबसे महास्नानमें अढ़ाई मन (लगभग 90 किलो) जल लगता है।”
हःभःविः छठा विभाग- “ततः कोष्णेन संस्नाप्य संस्कृतेन सुगन्धना। शीतलेनाम्बुना शङ्खभृतेन स्नापयेत् पुनः॥ 107 ॥ चन्दनोशीर-कर्पूरकुङ्कुमागुरु-वासितैः। सलिलैः स्नापयेन्मन्त्री नित्यदा विभवे सती॥” 108 ॥
जलका परिमाण- “स्नाने पलशतं देयमभ्यङ्गे पञ्चविंशतिः। पलानां द्वे सहस्रे तु महास्नानं प्रकीर्त्तितम्॥” 109 ॥
अर्थात् “श्रीविग्रहके अङ्ग-मार्जनके बाद सर्वोषधि आदिके द्वारा सुसंस्कृत सुगन्धित गुनगुने जलके द्वारा स्नान कराकर शङ्खसे शीतल जलसे स्नान कराना चाहिये। सामर्थ्य होनेपर दीक्षित व्यक्तिको चन्दन, खस, कर्पूर, कुङ्कुम, अगुरु, चन्दनयुक्त जलसे प्रतिदिन श्रीविग्रहको स्नान कराना चाहिये।” जलका परिमाण- “स्नानमें एक सौ 'पल' और अभ्यङ्ग-स्नानमें पचीस 'पल' परिमाणमें जल देना चाहिये। दो हजार 'पल' जलसे महास्नान होता है॥” 60-62 ॥
भोग आरति :- धूप, दीप, करि' नाना भोग लगाइल। दधि-दुग्ध-सन्देशादि यत किछु आइल॥ 64 ॥ सुवासित जल नवपात्रे समर्पिल। आचमन दिया से ताम्बूल निवेदिल॥ 65 ॥
120 ।
चौथा अध्याय 4/64-76 ] आरात्रिक करि' कैल बहुत स्तवन। दण्डवत् करि' कैल आत्मसमर्पण॥66॥ अनुवाद—फिर श्रीमाधवेन्द्रपुरीने धूप, दीपके द्वारा श्रीगोपालका अर्चन करके दही, दूध और सन्देशादि अनेक प्रकारकी जो सामग्री गाँवसे आयी थी, उन सबका भोग लगाया। उसके बाद नये पात्रमें सुगन्धित जल अर्पित किया, तत्पश्चात् आचमन देकर श्रीगोपालको ताम्बूल अर्पण किया। फिर भोग-आरती करनेके बाद श्रीगोपालकी अनेक स्तव-स्तुति की। और अन्तमें दण्डवत् प्रणाम करके श्रीगोपालको आत्मसमर्पण किया॥64-66॥ पके हुए अन्नका भोग लगाना—अन्नकूट :— ग्रामेर यतेक तण्डुल, दालि, गोधूम-चूर्ण। सकल आनिया दिल पर्वत हैल पूर्ण॥67॥ कुम्भकार-घरे छिल ये मृद्भाजन। सब आनाइल प्राते, चड़िल रन्धन॥68॥ अनुवाद—गाँवके लोगोंके घरमें जितना भी चावल, दाल एवं आटा आदि था, वे सारा उठाकर वहाँ ले आये जिससे पर्वतका शिखर पूरा भर गया। गाँवके कुम्हारोंके घरमें जितने भी मिट्टीके बर्तन थे, वे भी उन सभी बर्तनोंको ले आये और प्रातःकालसे ही रसोई बननी आरम्भ हो गयी॥67-68॥ अनेक प्रकार व्यञ्जन :— दशविप्र अन्न रान्धि' करे एक स्तूप। जना-पाँच रान्धे व्यञ्जनादि नाना सूप॥69॥ वन्य शाक-फल-मूले विविध व्यञ्जन। केह बड़ा-बड़ि-कढ़ि करे विप्रगण॥70॥ जना पाँच-सात रुटि करे राशि-राशि। अन्न-व्यञ्जन सब रहे घृते भासि'॥71॥ नववस्त्र पाति' ताहे पलाशेर पात। रान्धि' रान्धि' तार उपर राशि कैल भात॥72॥ तार पाशे रुटि-राशिर पर्वत हैल। सूप-आदि-व्यञ्जन-भाण्ड चौदिके धरिल॥73॥ तार पाशे दधि, दुग्ध, माठा, शिखरिणी। पायस, मथनि, सर पाशे धरि' आनि'॥74॥ स्वयं पुरी-गोसाईंके द्वारा भोग-निवेदन :— हेनमते अन्नकूट करिल साजन। पुरी-गोसाञि गोपालेरे कैल समर्पण॥75॥ अनेक घट भरि' दिल सुवासित जल। बहुदिनेर क्षुधाय गोपाल खाइल सकल॥76॥ अनुवाद—दस ब्राह्मणोंने मिलकर चावल और पाँच ब्राह्मणोंने मिलकर सूखे और रसेवाले अनेक प्रकारके व्यञ्जनादि बनाये। कुछ ब्राह्मणोंने वनसे लाये गये शाक, मूल और फलोंके द्वारा अनेक प्रकारके व्यञ्जन बनाये, तो कोई ब्राह्मण दाल पीसकर बड़ा, कोई बड़ि और कोई कढ़ी आदि बनाने लगा। पाँच-सात लोगोंने मिलकर इतनी रोटियाँ बनायी कि रोटियोंका पहाड़ बन गया और सभी रोटियोंपर अच्छे प्रकारसे घी लगाया था। अन्न-व्यञ्जन आदि तो घीमें सराबोर हो रहे थे। एक नये वस्त्रको बिछाकर उसपर पलाशके पत्ते रखे गये। उनपर बीचमें पके हुए चावलका पर्वताकारमें ढेर लगाया गया और उसके चारों ओर रोटियोंका ढेर तथा दाल-सब्जी-व्यञ्जनोंके पात्र भरकर रखे गये। उनके साथ ही दही, दूध, मट्ठा, शिखरिणी, खीर, मक्खन और मलाई आदिके पात्रोंको भी रखा गया। इस प्रकार अन्नकूटको सजाकर श्रीपुरी गोसाईंने श्रीगोपालको अर्पण किया। श्रीपुरीने अनेक घड़ोंमें भरकर सुगन्धित शीतल जल अर्पण किया। अनेक दिनोंसे भूखे होनेके कारण श्रीगोपालने सब कुछ खा लिया॥69-76॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'माठा'—मट्ठा; 'शिखरिणी'—दही, दूध, चीनी, कर्पूर एवं काली मिर्च—ये पाँच वस्तुएँ मिलानेसे 'शिखरिणी' बनती है; 'मथनि'—मक्खन॥74॥ अनुभाष्य—यहाँपर भी ग्रन्थकार श्रील कविराज । 121
[ 4/69-86 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला गोस्वामी प्रभुका विविध प्रकारके पकवान बनानेका नैपुण्य प्रकाशित हो रहा है। 'अन्नकूट'—अन्नका पर्वत; 'कूट'—दुर्ग, गढ़, पर्वत ॥ 69-76 ॥ श्रीगोपालके द्वारा भोगके सभी नैवेद्य खा लिये जानेपर भी हाथोंके स्पर्शसे पुनः पूरण :- यद्यपि गोपाल सब अन्न-व्यञ्जन खाइल। ताँर हस्त-स्पर्शे पुनः तेमनि हइल ॥ 77 ॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीगोपालने सब अन्न-व्यञ्जन खा लिये, तथापि उनके हाथोंके स्पर्शसे पुनः सब कुछ पूर्ववत् हो गया ॥ 77 ॥ भगवद्-लीला भक्तोंके ही गोचर :- इहा अनुभव कैल माधव गोसाञि। ताँर ठाञि गोपालेर लुकान किछु नाइ ॥ 78 ॥ एकदिन-उद्योगे ऐछे महोत्सव कैल। गोपाल-प्रभावे हय, अन्ये ना जानिल ॥ 79 ॥ अनुवाद—श्रीगोपालकी इस भोजन लीलाका अनुभव केवल श्रीमाधवेन्द्र पुरीको ही हुआ, क्योंकि उनके जैसे भक्तोंसे भगवान्की कोई बात छिपी नहीं रह सकती। एक दिनके प्रयाससे इतना बड़ा महोत्सव केवल श्रीगोपालके प्रभावसे ही सम्भव हो सका, शुद्धभक्तके अतिरिक्त इसे और कोई भी नहीं जान सकता ॥ 78-79 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला, 3/86-89 संख्या देखें ॥ 78 ॥ श्रीगोपालकी आरती :- आचमन दिया दिल बिड़क-सञ्चय। आरति करिल, लोके करे जय जय ॥ 80 ॥ अनुवाद—तब श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपालको आचमन देकर उन्हें अनेक पानके बीड़े अर्पित किये। उसके बाद जब उन्होंने श्रीगोपालकी आरती की, तब सभी लोग श्रीगोपालकी जय-जयकार करने लगे ॥ 80 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'बिड़क'—पानका बीड़ा; 'सञ्चय'—संग्रह ॥ 80 ॥ ठाकुरके लिये शय्या तथा शयनकी व्यवस्था :- शय्या कराइल, नूतन खाट आनाञा। नववस्त्र आनि' तार उपरे पातिया ॥ 81 ॥ तृण-टाटि दिया चारिदिक् आवरिल। उपरेते एक टाटि दिया आच्छादिल ॥ 82 ॥ अनुवाद—आरती करनेके बाद श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपालके लिये एक नवीन खाट मँगवाकर उसपर नया वस्त्र बिछाकर उनको शयन कराया। फिर चटाईसे उस स्थानके चारों ओर घेरा बना दिया तथा ऊपर भी एक चटाई लगाकर उसको ढक दिया, इस प्रकार वहाँ एक अस्थाई मन्दिर बन गया ॥ 81-82 ॥ सभीके द्वारा अन्नकूट महाप्रसाद-सेवन :- पुरी-गोसाञि आज्ञा दिल सकल ब्राह्मणे। आ-बाल-वृद्ध ग्रामेर लोक कराह भोजने ॥ 83 ॥ सबे बसि' क्रमे क्रमे भोजन करिल। ब्राह्मण-ब्राह्मणीगणे आगे खाओयाइल ॥ 84 ॥ अनुवाद—श्रीपुरी गोसांईने सभी ब्राह्मणोंको बुलाकर आज्ञा दी कि बालकसे वृद्ध तक, गाँवके सभी लोगोंको भरपेट महाप्रसादका भोजन कराया जाय। सभीने बैठकर क्रमसे भोजन किया। सबसे पहले ब्राह्मण- ब्राह्मणियोंको भोजन कराया गया ॥ 83-84 ॥ दर्शन मात्रसे ही प्रसादका सम्मान :- अन्य ग्रामेर लोक यत देखिते आइल। गोपाल देखिया सेह प्रसाद पाइल ॥ 85 ॥ अनुवाद—अन्य गाँवोंसे दर्शनके लिये आये लोगोंने भी श्रीगोपालका दर्शनकर उस महाप्रसादको पाया ॥ 85 ॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके प्रभावको देखकर सभीको आश्चर्य तथा अन्नकूटके दर्शनसे नन्दोत्सवका स्मरण :- देखिया पुरीर प्रभाव लोके चमत्कार। पूर्व अन्नकूट येन हैल साक्षात्कार ॥ 86 ॥ 122 ।
चौथा अध्याय 4/86-90 ] अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीके प्रभावको देखकर सभी लोग चमत्कृत हो गये। सभीको ऐसा लगा, मानो वे द्वापर युगमें भगवान् श्रीकृष्णके कहनेपर व्रजवासियोंके द्वारा आयोजित किये गये अन्नकूट महोत्सवको ही साक्षात् देख रहे हैं॥86॥ अमृतप्रवाह भाष्य-द्वापर युगमें व्रजवासी सभी गोप इन्द्रकी पूजा करते थे। श्रीकृष्णने इन्द्रकी पूजाको छुड़वाकर गिरिगोवर्धनकी पूजा और उन्हें (गिरिराजको) अन्नकूट भोजन करानेकी व्यवस्था कर दी। उससे इन्द्रने क्रोधित होकर सात दिनतक वर्षा करके गोकुलको विनष्ट करनेकी चेष्टा की। श्रीकृष्णने गोवर्धन पर्वतको अपनी कनिष्ठ (सबसे छोटी) अंगुलीपर छतरीके रूपमें धारण करके गोकुलकी रक्षा की थी। उस गोवर्धन-पूजामें जैसा बड़ा अन्नकूट हुआ था, श्रीमाधवेन्द्रपुरीने भी उसी प्रकारसे अन्नकूट किया था॥86॥ अनुभाष्य—'पूर्व अन्नकूट'—श्रीकृष्णके परामर्श अनुसार गोपोंने द्वापरके अन्तमें इन्द्रपूजाको त्यागकर गो, ब्राह्मण और गोवर्धनगिरिकी पूजा की थी। श्रीकृष्णने और एक रूप धारण करके 'मैं ही पर्वत हूँ'-ऐसा कहकर उन्होंने गोवर्धनको निवेदित अनेकानेक नैवेद्योंका भक्षण किया था। (भाः 10/24/26, 31-33)— “पच्यन्तां विविधाः पाकाः सूपान्ताः पयसादयः। संयावापूपशष्कुल्यः सर्वदोहश्च गृह्यताम्॥26॥ प्रोक्तं निशम्य नन्दाद्याः साध्वगृह्णन्त तद्वचः॥31ख॥ तथा च व्यदधुः सर्वं यथाह मधुसूदनः॥ वाचयित्वा स्वस्त्ययनं तद्द्रव्येण गिरिद्विजान्॥32॥ उपहृत्य बलीन् सम्यगादृता यवसं गवाम्॥"33क॥ अर्थात् “श्रीकृष्णने नन्दबाबा आदि व्रजवासियोंसे कहा,—“खीरसे आरम्भ करके मूँगकी दालतक, हलवा, पुआ, पूरी, पापड़ आदि पकवान बनवाये जाँय और समस्त व्रजवासी गायोंका दोहन करके दूध, दही आदि यहाँ ले आयें।" भगवान् श्रीकृष्णके इन वचनोंको नन्दबाबा आदि गोपोंने बड़ी प्रसन्नतासे स्वीकार कर लिया। तब उन्होंने श्रीकृष्णके कहे अनुसार सभी अनुष्ठान किये। सर्वप्रथम ब्राह्मणोंके द्वारा स्वस्तिवाचन कराया गया। तत्पश्चात् इन्द्रके उद्देश्यसे निर्मित सामग्रियोंको गिरिराज गोवर्धनको अर्पित किया गया और ब्राह्मणोंकी पूजा करके उसी सामग्रीमेंसे उनको भेंटें दी गयीं। गायोंको बड़े आदरके साथ हरी-भरी घासका चारा दिया गया॥"86॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी कृपासे ब्राह्मणोंका वैष्णव होना :- सकल ब्राह्मणे पुरी वैष्णव करिल। सेइ सेइ सेवा-मध्ये सबा नियोजिल॥87॥ अनुवाद-श्रीमाधवेन्द्र पुरीने उपस्थित सभी ब्राह्मणोंको मन्त्र-दीक्षादिके द्वारा वैष्णव बना दिया और सबको यथायोग्य विभिन्न सेवाओंमें लगा दिया॥87॥ पुनः दिन-शेषे प्रभुर कराइल उत्थान। किछु भोग लागाइल कराइल जलपान॥88॥ अनुवाद-फिर दिन ढलनेके समय श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपालको शयनसे उठाया और कुछ भोग लगाकर जलपान करवाया॥88॥ सर्वत्र श्रीगोपालका प्राकट्य-प्रचार और अन्नकूट-भोग :- गोपाल प्रकट हैल,—देशे शब्द हैल। आश-पाश-ग्रामेर लोक देखिते आइल॥89॥ एकेक दिन एकेक ग्रामे लइल मागिञा। अन्नकूट करे सबे हरषित हञा॥90॥ अनुवाद-सारे देशमें यह बात फैल गयी कि गोवर्धनमें श्रीगोपाल प्रकट हुए हैं, तो आस-पासके गाँवोंके लोग उनके दर्शनोंके लिये आने लगे। सभी गाँववाले अन्नकूट-महोत्सव करना चाहते थे, इसलिये एक-एक गाँववालोंने श्रीमाधवेन्द्र पुरीसे एक-एक दिन माँग लिया। इस प्रकार बारी-बारी वे सभी आनन्दित होकर अन्नकूट-महोत्सव करने लगे॥89-90॥ । 123
[ 4/91-102 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला पुरी गोसाईंका रात्रि-आहार :- रात्रिकाले ठाकुरे कराइया शयन। पुरी-गोसाञि कैल किछु गव्य भोजन॥91॥ अनुवाद—रात्रिके समय श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपालको शयन दिया। उन्होंने सारा दिन कुछ भी नहीं खाया था। शयन देनेके बाद उन्होंने थोड़ासा दूध पान किया॥91॥ अनुभाष्य—'गव्य'—दूध॥91॥ अगले दिन प्रातःकालमें भी पहले दिनके जैसी सेवा :- प्रातःकाले पुनः तैछे करिल सेवन। अन्न लञा एक ग्रामेर आइल लोकगण॥92॥ अन्न, घृत, दधि, दुग्ध,—ग्रामे यत छिल। गोपालेर आगे लोक आनिया धरिल॥93॥ पूर्वदिन-प्राय ब्राह्मण करिल रन्धन। तैछे अन्नकूट गोपाल करिल भोजन॥94॥ अनुवाद—अगले दिन प्रातःकालमें पुनः श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपालकी पूर्व-दिनके जैसे सेवा की। तभी एक गाँवके लोग भोग-सामग्री लेकर आ गये। उनके गाँवमें जितना भी अन्न, घी, दही, दूध आदि था, वह सब लाकर उन्होंने श्रीगोपालके आगे रख दिया। पहले दिनकी भाँति आज भी ब्राह्मणोंने रसोई बनायी और वैसा ही अन्नकूट महोत्सव हुआ तथा आज भी श्रीगोपालने सब कुछ ग्रहण किया॥92-94॥ ब्रजवासियों और श्रीकृष्ण, दोनोंकी दोनोंके प्रति स्वाभाविक प्रीति :- व्रजवासी लोकेर कृष्णे सहज-प्रीति। गोपालेर सहजे प्रीति व्रजवासि-प्रति॥95॥ महाप्रसाद खाइल आसिया सब लोक। गोपाल देखिया सबार खण्डे दुःख-शोक॥96॥ प्रतिदिन अनेक उपहार और महोत्सव :- आश-पाश व्रजभूमेर यत लोक सब। एक एक दिन सबे करे महोत्सव॥97॥ अनुवाद—जिस प्रकार व्रजवासियोंकी श्रीकृष्णमें स्वाभाविक प्रीति है, उसी प्रकार श्रीगोपालकी भी व्रजवासियोंके प्रति स्वाभाविक प्रीति है। अन्नकूट महोत्सवमें जितने भी लोग आये थे, उन सबने अन्नकूट-महाप्रसादका सेवन किया तथा श्रीगोपालके दर्शनसे उन सबके दुःख-शोक दूर हो गये। व्रजभूमिमें आस-पासके जितने भी गाँव थे, उन सभी गाँवोंके लोग एक-एक दिन आकर अन्नकूट महोत्सव करने लगे॥95-97॥ गोपाल-प्रकट शुनि' नाना देश हैते। नाना द्रव्य लञा लोक लागिल आसिते॥98॥ मथुरार लोक सब बड़ बड़ धनी। भक्ति करि' नाना द्रव्य भेट देय आनि'॥99॥ स्वर्ण, रौप्य, वस्त्र, गन्ध, भक्ष्य-उपहार। असंख्य आइसे, नित्य बाड़िल भाण्डार॥100॥ अनुवाद—श्रीगोपालके प्राकट्यकी बात सुनकर अनेक प्रदेशोंसे लोग अनेक प्रकारके द्रव्य लाकर उनके दर्शनोंके लिये आने लगे। मथुराके सब बड़े-बड़े धनी व्यक्ति श्रद्धापूर्वक अनेक वस्तुएँ लाकर भेंट चढ़ाने लगे। इस प्रकार असंख्य मात्रामें स्वर्ण, चाँदी, वस्त्र, इत्र और अन्य खानेकी सामग्री आने लगी, जिससे श्रीगोपालका भण्डार प्रतिदिन बढ़ता ही गया॥98-100॥ गोपालके मन्दिरका निर्माण- एक महाधनी क्षत्रिय कराइल मन्दिर। केह पाक-भाण्डार कैल, केह त' प्राचीर॥101॥ एक एक व्रजवासी एक एक गाभी दिल। दशसहस्र गाभी गोपालेर हैल॥102॥ अनुवाद—तब किसी एक बहुत धनी क्षत्रियने श्रीगोपालके लिये मन्दिर बनवा दिया और किसी एकने रसोईघर बनवाया और बर्तन दिये तथा अन्य किसीने चार-दीवारी बनवा दी। एक-एक व्रजवासीने एक-एक 124
चौथा अध्याय 4/101-111 ] गाय दी और इस प्रकार श्रीगोपालकी दस हजार गायें हो गयीं ॥ 101-102 ॥ दो वैरागी ब्राह्मणोंपर कृपा और सेवा-समर्पण :- गौड़ हइते आइला दुइ वैरागी ब्राह्मण। पुरी-गोसाञि राखिल तारे करिया यतन ॥ 103 ॥ सेइ दुइ शिष्य करि' सेवा समर्पिल। राज-सेवा हय,-पुरीर आनन्द बाड़िल ॥ 104 ॥ अनुवाद-तभी बङ्गालसे दो वैरागी ब्राह्मण वहाँ आये। श्रीपुरी गोसांईको वे दोनों बहुत अच्छे लगे और उन्होंने उनके वहीं रहनेके लिये अच्छे स्थानकी व्यवस्था कर दी। श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उन्हें दीक्षा प्रदान करके अपने शिष्यके रूपमें स्वीकार किया और उन्हें श्रीगोपालकी सेवा समर्पित कर दी। इस प्रकार श्रीगोपालकी नित्य राजसेवा होने लगी, जिसे देखकर श्रीमाधवेन्द्रपुरीके आनन्दकी सीमा न रही ॥ 103-104 ॥ दो वर्षों तक श्रीमाधवेन्द्रपुरीके द्वारा श्रीगोपालकी सेवा :- एइमत বৎসর दुइ करिल सेवन। एकदिन पुरी-गोसाञि देखिल स्वपन ॥ 105 ॥ स्वप्नमें श्रीमाधवेन्द्रपुरीके समक्ष श्रीगोपालके द्वारा चन्दनकी इच्छा प्रकाशित :- गोपाल कहे,-"पुरी, आमार ताप नाहि याय। मलयज-चन्दन लेप', तबे से जुड़ाय ॥ 106 ॥ मलयज आन याञा नीलाचल हैते। अन्ये हैते নহে, तुमि चलह त्वरिते॥" 107 ॥ अनुवाद-इस प्रकार दो वर्षों तक श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपालकी सेवा की। तब एक दिन श्रीमाधवेन्द्रपुरीने एक स्वप्न देखा। स्वप्नमें श्रीगोपालने कहा,-"पुरी ! मेरे शरीरका ताप नहीं जा रहा है, मलयज चन्दनका लेप होनेसे ही वह ताप दूर होगा। नीलाचल जाकर वहाँसे मलयज चन्दन ले आओ। इस कार्यको कोई और नहीं कर सकता, इसलिये तुम शीघ्र ही चले जाओ॥" 105-107 ॥ अनुभाष्य- 'मलयज' - मलय देशमें उत्पन्न; इसको 'चन्दनगिरि' कहते हैं। मलयदेश अथवा मालावार देश 'पश्चिमघाट' - नामक गिरिपुञ्जके दक्षिण भागमें है। 'नीलगिरि'को कोई-कोई मलय पर्वत कहते हैं। मलयज शब्दका अर्थ चन्दन भी होता है॥ 106 ॥ स्वप्न देखि' पुरी-गोसाञि हैल प्रेमावेश। प्रभु-आज्ञा पालिबारे गेला पूर्वदेश ॥ 108 ॥ श्रीजगन्नाथपुरीके मार्गमें पुरीपादका गौड़देशमें आगमन :- सेवाय नियुक्त लोक करिल स्थापन। आज्ञा मागि' गौड़-देशे करिल गमन ॥ 109 ॥ अनुवाद-स्वप्न देखकर श्रीमाधवेन्द्रपुरी प्रेमाविष्ट हो गये और श्रीगोपालकी आज्ञा पालन करनेके लिये पूर्व-भारतमें नीलाचलकी ओर चलनेके लिये तैयार हुए। उन्होंने श्रीगोपालकी सुचारुरूपसे सेवाके लिये लोगोंको नियुक्त किया और फिर श्रीगोपालसे आज्ञा लेकर गौड़देशके लिये चल दिये ॥ 108-109 ॥ शान्तिपुरमें श्रीअद्वैतके घरपर आगमन और उनको दीक्षा प्रदान :- शान्तिपुर आइला अद्वैताचार्येर घरे। पुरीर प्रेम देखि' आचार्य आनन्द अन्तरे ॥ 110 ॥ ताँर ठाञि मन्त्र लैल यत्न करिया। चलिला दक्षिणे पुरी ताँरे दीक्षा दिञा ॥ 111 ॥ अनुवाद-श्रीमाधवेन्द्रपुरी जब शान्तिपुर पहुँचे, तब वे श्रीअद्वैताचार्यके घरमें रहे। श्रीमाधवेन्द्रपुरीके श्रीकृष्णप्रेमको देखकर श्रीअद्वैताचार्यके हृदयमें बहुत आनन्द हुआ। उन्होंने श्रीमाधवेन्द्रपुरीसे प्रार्थना करके दीक्षामन्त्र ग्रहण किया। उनको दीक्षा प्रदान करके श्रीमाधवेन्द्रपुरी दक्षिण दिशामें नीलाचलकी ओर चल दिये॥ 110-111 ॥ अनुभाष्य-श्रीअद्वैताचार्यने श्रीमाध्वसम्प्रदायके गुरु संन्यासीवर श्रीमाधवेन्द्रपुरीसे दीक्षा मन्त्र ग्रहण किया था। श्रीमहाप्रभुने भी श्रीमाधवेन्द्र पुरीके अभिप्रायके अनुसार । 125