श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 971, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय 4/64-76 ] आरात्रिक करि' कैल बहुत स्तवन। दण्डवत् करि' कैल आत्मसमर्पण॥66॥ अनुवाद—फिर श्रीमाधवेन्द्रपुरीने धूप, दीपके द्वारा श्रीगोपालका अर्चन करके दही, दूध और सन्देशादि अनेक प्रकारकी जो सामग्री गाँवसे आयी थी, उन सबका भोग लगाया। उसके बाद नये पात्रमें सुगन्धित जल अर्पित किया, तत्पश्चात् आचमन देकर श्रीगोपालको ताम्बूल अर्पण किया। फिर भोग-आरती करनेके बाद श्रीगोपालकी अनेक स्तव-स्तुति की। और अन्तमें दण्डवत् प्रणाम करके श्रीगोपालको आत्मसमर्पण किया॥64-66॥ पके हुए अन्नका भोग लगाना—अन्नकूट :— ग्रामेर यतेक तण्डुल, दालि, गोधूम-चूर्ण। सकल आनिया दिल पर्वत हैल पूर्ण॥67॥ कुम्भकार-घरे छिल ये मृद्भाजन। सब आनाइल प्राते, चड़िल रन्धन॥68॥ अनुवाद—गाँवके लोगोंके घरमें जितना भी चावल, दाल एवं आटा आदि था, वे सारा उठाकर वहाँ ले आये जिससे पर्वतका शिखर पूरा भर गया। गाँवके कुम्हारोंके घरमें जितने भी मिट्टीके बर्तन थे, वे भी उन सभी बर्तनोंको ले आये और प्रातःकालसे ही रसोई बननी आरम्भ हो गयी॥67-68॥ अनेक प्रकार व्यञ्जन :— दशविप्र अन्न रान्धि' करे एक स्तूप। जना-पाँच रान्धे व्यञ्जनादि नाना सूप॥69॥ वन्य शाक-फल-मूले विविध व्यञ्जन। केह बड़ा-बड़ि-कढ़ि करे विप्रगण॥70॥ जना पाँच-सात रुटि करे राशि-राशि। अन्न-व्यञ्जन सब रहे घृते भासि'॥71॥ नववस्त्र पाति' ताहे पलाशेर पात। रान्धि' रान्धि' तार उपर राशि कैल भात॥72॥ तार पाशे रुटि-राशिर पर्वत हैल। सूप-आदि-व्यञ्जन-भाण्ड चौदिके धरिल॥73॥ तार पाशे दधि, दुग्ध, माठा, शिखरिणी। पायस, मथनि, सर पाशे धरि' आनि'॥74॥ स्वयं पुरी-गोसाईंके द्वारा भोग-निवेदन :— हेनमते अन्नकूट करिल साजन। पुरी-गोसाञि गोपालेरे कैल समर्पण॥75॥ अनेक घट भरि' दिल सुवासित जल। बहुदिनेर क्षुधाय गोपाल खाइल सकल॥76॥ अनुवाद—दस ब्राह्मणोंने मिलकर चावल और पाँच ब्राह्मणोंने मिलकर सूखे और रसेवाले अनेक प्रकारके व्यञ्जनादि बनाये। कुछ ब्राह्मणोंने वनसे लाये गये शाक, मूल और फलोंके द्वारा अनेक प्रकारके व्यञ्जन बनाये, तो कोई ब्राह्मण दाल पीसकर बड़ा, कोई बड़ि और कोई कढ़ी आदि बनाने लगा। पाँच-सात लोगोंने मिलकर इतनी रोटियाँ बनायी कि रोटियोंका पहाड़ बन गया और सभी रोटियोंपर अच्छे प्रकारसे घी लगाया था। अन्न-व्यञ्जन आदि तो घीमें सराबोर हो रहे थे। एक नये वस्त्रको बिछाकर उसपर पलाशके पत्ते रखे गये। उनपर बीचमें पके हुए चावलका पर्वताकारमें ढेर लगाया गया और उसके चारों ओर रोटियोंका ढेर तथा दाल-सब्जी-व्यञ्जनोंके पात्र भरकर रखे गये। उनके साथ ही दही, दूध, मट्ठा, शिखरिणी, खीर, मक्खन और मलाई आदिके पात्रोंको भी रखा गया। इस प्रकार अन्नकूटको सजाकर श्रीपुरी गोसाईंने श्रीगोपालको अर्पण किया। श्रीपुरीने अनेक घड़ोंमें भरकर सुगन्धित शीतल जल अर्पण किया। अनेक दिनोंसे भूखे होनेके कारण श्रीगोपालने सब कुछ खा लिया॥69-76॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'माठा'—मट्ठा; 'शिखरिणी'—दही, दूध, चीनी, कर्पूर एवं काली मिर्च—ये पाँच वस्तुएँ मिलानेसे 'शिखरिणी' बनती है; 'मथनि'—मक्खन॥74॥ अनुभाष्य—यहाँपर भी ग्रन्थकार श्रील कविराज । 121