श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 970, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 4/60-65 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अमृतप्रवाह भाष्य- 'पञ्चगव्य' - दूध, दही, घी, गोमूत्र एवं गोबर; 'पञ्चामृत'-दही, दूध, घी, शहद एवं चीनी। 'शङ्ख-गन्धोदक'-शङ्खोदक अर्थात् शंखमें रखा हुआ पुष्प-चन्दन मिश्रित सुगन्धित जल ॥ 61-62 ॥
अनुभाष्य-हःभःविः छठा विभाग- “ततः शङ्खेनाभिषेकं कुर्याद् घण्टादिनिःस्वनैः। मूलेनाष्टाक्षरेणपि धूपयन्नन्तरान्तरा॥” 65॥
अर्थात् “स्नानपात्रमें श्रीभगवान्की मूर्तिको रखकर घण्टा आदि वाद्य-यन्त्रोंके साथ धूप अर्पण करते हुए शङ्खमें रखे जलके द्वारा बीच-बीचमें अष्टाक्षर मूल-मन्त्रके साथ अभिषेक करना चाहिये।”
यवचूर्ण ('जौ'का चूर्ण), गोधूमचूर्ण (गेहूँका चूर्ण), लोध्रचूर्ण (एक विशेष प्रकारके वृक्षके तनेसे बना चूर्ण), कुङ्कुमचूर्ण, मसूरचूर्णके द्वारा साफ करना चाहिये। बेसन और हल्दीके उबटनके द्वारा और 'खस' आदिसे निर्मित कूची, गायकी पूँछके बालोंसे बनी हुई कूची आदिसे अङ्गोंकी मैल दूर होती है। हःभःविः छठा विभाग-
“तत्र तु प्रथमं भक्त्या विदधीत सुगन्धिभिः। दिव्यैस्तैलादिभिर्द्रव्यैरभ्यङ्गं श्रीहरेः शनैः॥ 66 ॥ अभ्यङ्गद्रव्याणि- मालतीयूथीमादाय सुगन्धानान्तु वा पुनः॥ 67 ॥ तथान्यपुष्पजातीनां गृहीत्वा भक्तितो नराः॥ 68क ॥ यः पुनः पुष्पशैलेन दिव्योपधियुतेन हि॥ 69ख॥ अभ्यङ्गं कुरुते विष्णोर्मध्ये क्षिप्त्वा तु कुङ्कुमम्॥ 70क॥ गन्ध-तैलानि दिव्यानि सुगन्धीनि शुचीनि च॥” 71क ॥
अर्थात् “स्नानकार्यमें पहले दिव्य सुगन्धित तेलादि द्रव्योंके द्वारा भक्तिपूर्वक धीरे-धीरे श्रीहरिके सभी अङ्गोंको मलना चाहिये। मालती, यूथि, या अन्य-अन्य सुगन्धवाले पुष्पोंको लेकर और दिव्य औषधियुक्त कुङ्कुम-मिश्रित सुगन्धित पवित्र पुष्प-तेलके द्वारा भक्तिसहित श्रीविष्णुके अङ्गोंको मलना आवश्यक है।”
हःभःविः छठा विभाग- “ततः शङ्खभृतेनैव क्षीरेण स्नापयेत् क्रमात्। दध्ना घृतेन मधुना खण्डेन च पृथक् पृथक्॥” 72 ॥
अर्थात् “श्रीविष्णुके श्रीअङ्गोंको मलनेके बाद शङ्खमें दूध, दही, घी, शहद और चीनी डालकर क्रमानुसार पृथक्-पृथक्रूपसे स्नान कराना चाहिये।”
'महास्नान'-हःभःविः छठा विभाग- “द्वे सहस्रे पलानान्तु महास्नाने च संख्या॥” 75ख ॥
अर्थात् “देव-प्रतिमाको घीसे स्नान कराना होता है। महास्नानमें घी और स्नानजल, - प्रत्येकका परिमाण दो हजार 'पल' होता है। एक 'पल' चार 'तोला'के बराबर होता है, इस हिसाबसे महास्नानमें अढ़ाई मन (लगभग 90 किलो) जल लगता है।”
हःभःविः छठा विभाग- “ततः कोष्णेन संस्नाप्य संस्कृतेन सुगन्धना। शीतलेनाम्बुना शङ्खभृतेन स्नापयेत् पुनः॥ 107 ॥ चन्दनोशीर-कर्पूरकुङ्कुमागुरु-वासितैः। सलिलैः स्नापयेन्मन्त्री नित्यदा विभवे सती॥” 108 ॥
जलका परिमाण- “स्नाने पलशतं देयमभ्यङ्गे पञ्चविंशतिः। पलानां द्वे सहस्रे तु महास्नानं प्रकीर्त्तितम्॥” 109 ॥
अर्थात् “श्रीविग्रहके अङ्ग-मार्जनके बाद सर्वोषधि आदिके द्वारा सुसंस्कृत सुगन्धित गुनगुने जलके द्वारा स्नान कराकर शङ्खसे शीतल जलसे स्नान कराना चाहिये। सामर्थ्य होनेपर दीक्षित व्यक्तिको चन्दन, खस, कर्पूर, कुङ्कुम, अगुरु, चन्दनयुक्त जलसे प्रतिदिन श्रीविग्रहको स्नान कराना चाहिये।” जलका परिमाण- “स्नानमें एक सौ 'पल' और अभ्यङ्ग-स्नानमें पचीस 'पल' परिमाणमें जल देना चाहिये। दो हजार 'पल' जलसे महास्नान होता है॥” 60-62 ॥
भोग आरति :- धूप, दीप, करि' नाना भोग लगाइल। दधि-दुग्ध-सन्देशादि यत किछु आइल॥ 64 ॥ सुवासित जल नवपात्रे समर्पिल। आचमन दिया से ताम्बूल निवेदिल॥ 65 ॥
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