भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 969

चौथा अध्याय 4/51-63 ] अनुवाद—उन्होंने देखा कि धूल-मिट्टी और तिनकोंसे ढके हुए हैं। श्रीगोपालको देखकर वे सब लोग बहुत आनन्दित और विस्मित हुए॥51॥ विग्रहका अत्यधिक भार :- आवरण दूर करि' करिल चिह्निते। महा-भारि ठाकुर-केह नारे चालाइते॥52॥ महा-महा-बलिष्ठ लोक एकत्र करिया। पर्वत-उपरि गेल पुरी ठाकुर लञा॥53॥ पर्वतके ऊपर विग्रहका अभिषेक आरम्भ :- पाथरेर सिंहासने ठाकुर बसाइल। बड़ एक पाथर पृष्ठे अवलम्ब दिल॥54॥ अनुवाद—मिट्टी-तृणादिके आवरणको हटानेके बाद उन्होंने देखा कि श्रीगोपाल तो बहुत भारी हैं, कोई भी उनको हिला तक नहीं पा रहा है। तब बड़े-बड़े बलवान लोगोंको इकट्ठा करके उनके द्वारा श्रीगोपालको उठवाकर श्रीमाधवेन्द्रपुरी पर्वतके ऊपर ले गये। एक बड़े पत्थरको सिंहासन बनाकर श्रीगोपालको उसपर बैठाया और उनको सहारा देनेके लिये पीछे एक बड़ा पत्थर लगाया॥52-54॥ नैवेद्य और पूजाके उपकरण :- ग्रामेर ब्राह्मण सब नवघट लञा। गोविन्द-कुण्डेर जल आनिल छानिञा॥55॥ नवशतघट जल कैल उपनीत। नाना वाद्य-भेरी बाजे, स्त्रीगण गाय गीत॥56॥ केह गाय, केह नाचे, महोत्सव हैल। दधि, दुग्ध, घृत आइल ग्रामे यत छिल॥57॥ भोग-सामग्री आइल सन्देशादि यत। नाना उपहार, ताहा कहिते पारि कत॥58॥ तुलसी आदि, पुष्प, वस्त्र आइल अनेक। आपने माधवपुरी कैल अभिषेक॥59॥ अङ्गमला दूर करि' कराइल स्नान। बहु तैल दिया कैल श्रीअङ्ग चिक्कण॥60॥ पञ्चगव्य, पञ्चामृते स्नान कराञा। महास्नान कराइल शत घट दिञा॥61॥ पुनः तैल दिया कैल श्रीअङ्ग चिक्कण। शङ्ख-गन्धोदके कैल स्नान समाधान॥62॥ श्रीअङ्ग मार्जन करि' वस्त्र पराइल। चन्दन, तुलसी, पुष्प-माला अङ्गे दिल॥63॥ अनुवाद—गाँवके सब ब्राह्मण नये-नये घड़े लेकर गोविन्द कुण्डके जलको छानकर लाने लगे। इस प्रकार एक सौ नये घड़े जल आ गया। तब अनेक प्रकारके भेरी आदि वाद्ययन्त्र बजने लगे और स्त्रियाँ मधुर स्वरसे गीत गाने लगीं। कोई गा रहा था, तो कोई नाच रहा था, इस प्रकार वहाँ एक महोत्सव होने लगा। गाँवमें जितना भी दही, दूध और घी था, सब वहाँ लाया गया। भोग सामग्रीके लिये जितने प्रकारके सन्देशादि मिष्ठान्न और उपहार लाये गये, उनको मैं बतला नहीं सकता। गाँवके लोग तुलसी, पुष्प और अनेक प्रकारके वस्त्र ले आये और स्वयं श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपाल-विग्रहका अभिषेक किया। मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए श्रीविग्रहके ऊपर चढ़े धूल-तृणादि मैलको दूर किया गया। तब श्रीविग्रहको स्नान कराना आरम्भ किया। सबसे पहले श्रीविग्रहकी बहुत मात्रामें सुगन्धित तेलसे मालिश करके उनके श्रीअङ्गोंको चमकाया। तब पञ्चगव्य और पञ्चामृतसे स्नान कराके सौ घड़ोंमें लाये जल और घीके द्वारा महास्नान कराया। महास्नानके बाद फिरसे सुगन्धित तेल मलकर श्रीविग्रहके अङ्गोंको चमकाया गया तथा शङ्खमें सुगन्धित जल भरकर स्नान कराया। इस प्रकार श्रीगोपालके श्रीअङ्गोंका मार्जन हो जानेके बाद श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उन्हें वस्त्र पहनाये तथा श्रीअङ्गोंमें चन्दन, तुलसी और पुष्पमाला आदि अर्पण किये॥55-63॥ । 119