भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 968

[ 4/41-51 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीगिरिधारीके द्वारा अपना परिचय प्रदान :- 'श्रीगोपाल' नाम मोर, —गोवर्धनधारी। वज्रेर स्थापित, आमि इँहा अधिकारी ॥ 41 ॥ शैल-उपरि हैते आमा कुञ्जे लुकाञा। म्लेच्छ-भये सेवक मोर गेल पलाञा ॥ 42 ॥ सेइ हैते रहि आमि एइ कुञ्ज-स्थाने। भाल, आइला तुमि, आमा काढ़ सावधाने ॥"43 ॥ अनुवाद—मैं गोवर्धनधारी हूँ और मेरा नाम 'श्रीगोपाल' है। वज्रनाभने मुझे स्थापित किया था और मैं यहाँका अधिकारी हूँ। म्लेच्छोंके भयसे मेरा सेवक मुझे गोवर्धनके ऊपरसे लाकर इस कुञ्जमें छिपाकर स्वयं भाग गया था। तभीसे मैं इस कुञ्जमें रह रहा हूँ। अच्छा हुआ जो तुम आ गये, अब सावधानीपूर्वक मुझे यहाँसे निकालो॥"41-43 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'वज्रेर स्थापित' - श्रीकृष्णके पौत्र अनिरुद्धके पुत्र वज्रनाभको पाण्डवोंने द्वारकासे लाकर मथुराका राजा बनाया था। वज्रनाभने श्रीकृष्णकी लीलाओंके सभी स्थानोंको खोजकर कुछेक श्रीमूर्तियोंकी स्थापना की थी। श्रीगोवर्धनधारी गोपाल उन्हीं श्रीमूर्तियोंमेंसे ही एक श्रीमूर्त्ति है ॥ 41 ॥ गोपालका अन्तर्धान होना :- एत बलि' येइ बालक अन्तर्धान हैल। जागिया माधवपुरी विचार करिल ॥ 44 ॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीका विचार :- 'श्रीकृष्णके देखिनु मुञि नारिनु चिन्तेि।' एत बलि' प्रेमावेशे पड़िला भूमिते ॥ 45 ॥ अनुवाद—यह कहकर वह बालक अन्तर्धान हो गया। तब श्रीमाधवेन्द्रपुरीने जागकर स्वप्नमें जो देखा, उसपर विचार करने लगे, – “हाय ! हाय ! श्रीकृष्णको देखकर भी मैं उन्हें पहचान न सका।" ऐसा कहकर वे प्रेमावेशमें पछाड़ खाकर भूमिपर गिर पड़े॥ 44-45 ॥ गिरिधारीको प्रकट करनेके लिये श्रीमाधवेन्द्रपुरीका यत्न :- क्षणेक रोदन करि' मन कैल स्थिर। आज्ञा-पालन लागि' हइला सुस्थिर ॥ 46 ॥ प्रातः स्नान करि' पुरी ग्राममध्ये गेला। सब लोक एकत्र करि' कहिते लागिला ॥ 47 ॥ ग्रामवासियोंको सहायताके लिये प्रेरित करना :- "ग्रामेर ईश्वर तोमार - गोवर्धनधारी। कुञ्जे आछे, चल, ताँरे बाहिर ये करि ॥ 48 ॥ कुठारि, कोदालि लह द्वारा करिते। अत्यन्त निविड़ कुञ्ज, – नारि प्रवेशिते ॥ "49 ॥ अनुवाद-तब कुछ समय तक रोनेके बाद उन्होंने मनमें धैर्य धारण किया और श्रीगोपालकी आज्ञाका पालन करनेके लिये तैयार हो गये। प्रातःकाल स्नान करनेके बाद श्रीमाधवेन्द्रपुरी गाँवमें गये और सब लोगोंको एकत्रित करके कहने लगे, – “तुम्हारे गाँवके ईश्वर श्रीगोवर्धनधारी एक कुञ्जमें पड़े हुए हैं। चलो, हम सब उनको वहाँसे उन्हें बाहर निकालें। वह कुञ्ज बहुत ही घना है, उसमें कोई प्रवेश नहीं कर सकता। इसलिये रास्ता बनानेके लिये अपने साथ कुल्हाड़ियाँ और फावड़े ले चलो॥" 46-49 ॥ सभी ग्रामवासियोंका मिलकर प्रयत्न :- शुनि' लोक ताँर सङ्गे चलिला हरिषे। कुञ्ज काटि' द्वार करि' करिला प्रवेशे ॥ 50 ॥ अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी बात सुनकर गाँवके लोग हर्षित होकर उनके साथ चल पड़े। और वहाँ जाकर कुञ्जकी झाड़ियों आदिको काटकर रास्ता बनाकर उसमें प्रवेश किया ॥ 50 ॥ सभीको छिपे हुए श्रीगिरिधारीका दर्शन और आनन्द :- ठाकुर देखिल माटी-तृणे आच्छादित। देखि' सब लोक हैल आनन्दे विस्मित ॥ 51 ॥ 118 |