श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय 4/28-40 ] आयी थीं और उन्होंने तुम्हें देखा था। उन स्त्रियोंने ही दूध देकर मुझे यहाँ भेजा है। अभी मुझे जल्दीसे गाय दुहनेके लिये जाना है, मैं पुनः आकर इस दूधके पात्रको ले जाऊँगा॥”28-31॥ दूध देकर बालकका अन्तर्धान होना :- एत बलि' गेला बालक ना देखिये आर। माधव-पुरीर चित्ते हैल चमत्कार ॥ 32 ॥ दूध पीनेके बाद श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी बालकके लिये प्रतीक्षा :- दुग्ध पान करि' भाण्ड धुञा राखिल। बाट देखे, से बालक पुनः ना आइल ॥ 33 ॥ अनुवाद-इतना कहकर वह गोपबालक वहाँसे चला गया मानो वह अन्तर्धान हो गया हो। दूध पीकर श्रीमाधवेन्द्रपुरीके चित्तमें चमत्कार हो गया। दूध पीकर तब श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उस बर्तनको धोकर रख दिया और उस बालककी बाट देखने लगे, परन्तु वह बालक फिर लौटकर नहीं आया ॥ 32-33 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'बाट' - राह, उड़िया भाषाका शब्द ॥ 33 ॥ समाधिमें बालकरूपी श्रीकृष्णका दर्शन :- बसि' नाम लय पुरी, नाहि निद्रा हय। शेषरात्रे तन्द्रा हैल, - बाह्यवृत्ति-लय ॥ 34 ॥ अनुवाद-श्रीमाधवेन्द्रपुरी वहीं बैठकर नाम जप करने लगे, रातमें भी उनको नींद नहीं आयी। रातके अन्तमें उन्हें तन्द्रा आ गयी और उनकी बाह्य चेतना लुप्त हो गयी ॥ 34 ॥ अनुभाष्य - 'नाम' - हरिनाम । 'बाह्यवृत्ति-लय' - भक्तिमें समाहित (समाधिस्थ) हो गये ॥ 34 ॥ स्वप्नमें श्रीमाधवेन्द्रपुरीको बालकरूपी श्रीकृष्णके द्वारा एक कुञ्जमें लाना :- स्वप्न देखे, सेइ बालक सम्मुखे आसिञा। एक कुञ्जे लञा गेल हातेते धरिञा ॥ 35 ॥ सेवामें शिथिलताके कारण गिरिधारीके द्वारा दुःख प्रकट करना :- कुञ्ज देखाञा कहे, - "आमि एइ कुञ्जे रइ। शीत-वृष्टि-वाताग्निते महा-दुःख पाइ ॥ 36 ॥ गिरिराजके ऊपर एक मठ निर्माण करके गिरिधारी गोपालकी प्रतिष्ठा करनेका आदेश :- ग्रामेर लोक आनि' आमा काढ़' कुञ्ज हैते। पर्वत-उपरि लञा राख भालमते ॥ 37 ॥ एक मठ करि' ताँहा करह स्थापन। बहु शीतल जले कर श्रीअङ्ग मार्जन ॥ 38 ॥ अनुवाद-श्रीमाधवेन्द्रपुरीने स्वप्नमें देखा कि वही गोपबालक उनके सामने आया और उनको हाथसे पकड़कर एक कुञ्जमें ले गया। कुञ्ज दिखाते हुए उसने कहा, - “मैं इस कुञ्जमें रहता हूँ। सर्दी, गर्मी, वर्षा और आँधी-तूफानके कारण बहुत कष्ट पाता हूँ। तुम गाँवके लोगोंको लाकर मुझे इस कुञ्जसे बाहर निकालो और मुझे भलीभाँति गिरिराजके ऊपर विराजमान कर दो। उस स्थानपर एक मन्दिर स्थापित करो। फिर बहुतसा शीतल जल लाकर मेरे श्रीअङ्गोंका मार्जन करो ॥ 35-38 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'काढ़' - बाहर करो; 'मठ' - मन्दिर ॥ 37 ॥ भक्तकी प्रतीक्षा में भगवान् :- बहुदिन तोमार पथ करि निरीक्षण। कबै आसि' माधव आमा करिबे सेवन ॥ 39 ॥ तोमार प्रेमवशे करि' सेवा अङ्गीकार। दर्शन दिया निस्तारिब सकल संसार ॥ 40 ॥ अनुवाद-मैं बहुत दिनोंसे तुम्हारी राह देख रहा था कि कब माधवेन्द्रपुरी यहाँ आयेगा और मेरी सेवा करेगा। तुम्हारे प्रेमके वशीभूत होकर मैं तुम्हारी सेवा स्वीकार करूँगा और अपने दर्शन देकर संसारके समस्त लोगोंका उद्धार करूँगा ॥ 39-40 ॥ । 117