श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 966, कुल 2549 में से
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[ 4/19–31 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—श्रीगोपीनाथ कैसे ‘क्षीरचोरा गोपीनाथ'के नामसे प्रसिद्ध हुए, महाप्रभुने इस कथाको अपने भक्तोंको सुनाया। पूर्वकालमें श्रीगोपीनाथने अपने भक्त श्रीमाधवेन्द्रपुरीके लिये खीरकी चोरी की थी, इसलिये उनका नाम ‘क्षीरचोर गोपीनाथ’ हो गया था। एक बार श्रीमाधवेन्द्रपुरी वृन्दावन आये थे और भ्रमण करते-करते वे गिरिराज गोवर्धन पहुँचे॥ 19–21॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘माधव-पुरी’—माधवेन्द्रपुरी ॥ 20 ॥ निरन्तर कृष्णप्रेममें मत्त श्रीमाधवेन्द्रपुरी :— प्रेमे मत्त,—नाहि ताँर रात्रिदिन-ज्ञान। क्षणे उठे, क्षणे पड़े, नाहि स्थानास्थान॥ 22 ॥ शैल परिक्रमा करि’ गोविन्दकुण्डे आसिं’। स्नान करि, वृक्षतले आछे सन्ध्याय बसिं’ ॥ 23 ॥ अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्र पुरी प्रेममें ऐसे मत्त रहते कि उनको रात-दिनका कोई भी ज्ञान नहीं रहता था। प्रेमावेशमें वे एक क्षण उठकर खड़े होते और अगले क्षण भूमिपर गिर पड़ते, वह स्थान पवित्र है अथवा अपवित्र, उन्हें कुछ भी ध्यान नहीं रहता था। एक दिन गिरिराज गोवर्धनकी परिक्रमा करके उन्होंने गोविन्दकुण्डमें आकर स्नान किया। स्नान करके सन्ध्याके समय वे एक वृक्षके नीचे बैठे हुए थे॥ 22–23 ॥ अनुभाष्य—‘शैल’—गोवर्धन पर्वत, मथुरासे आठ कोस दूर ॥ 23 ॥ गोपबालकके वेशमें श्रीकृष्णके द्वारा अपने भक्त श्रीमाधवेन्द्रपुरीको दुग्ध-दान :— गोप-बालक एक दुग्ध-भाण्ड लञा। आसिं’ आगे धरि' किछु बलिल हासिया ॥ 24 ॥ “पुरी, एइ दुग्ध लञा कर तुम पान। मागिं’ केने नाहि खाओ, किंवा कर ध्यान॥” 25 ॥ बालकेर सौन्दर्ये पुरीर हइल सन्तोष। ताहार मधुर-वाक्ये गेल भोक-शोष ॥ 26 ॥ अनुवाद—तभी एक गोपबालक दूधसे भरा पात्र लेकर आया और उसे उनके आगे रखकर मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए उनसे कहने लगा,—“हे माधवेन्द्रपुरी! तुम यह दूध लेकर पी लो। कुछ माँगकर खाते क्यों नहीं हो? और किसका ध्यान कर रहे हो?” उस बालकके सौन्दर्यको देखकर श्रीमाधवेन्द्रपुरी बहुत प्रसन्न हुए और उसके मधुर वचन सुनकर उनकी भूख-प्यास भी दूर हो गयी ॥ 24–26 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘भोक-शोष’—भूख और प्यास ॥ 26 ॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके द्वारा बालकके परिचयकी जिज्ञासा :— पुरी कहे,—“के तुमि, काँहा तोमार वास। केमते जानिले, आमि करि उपवास॥” 27 ॥ अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उस बालकसे पूछा,—“तुम कौन हो? कहाँ रहते हो? तुम्हें कैसे पता चला कि मैंने आज उपवास किया है?॥” 27 ॥ बालकके द्वारा आत्मगोपन :— बालक कहे,—“गोप आमि, एइ ग्रामे बसि। आमार ग्रामेते केह ना रहे उपवासी ॥ 28 ॥ केह अन्न मागि' खाय, केह दुग्धाहार। अयाचक-जने आमि दिये त' आहार ॥ 29 ॥ जल निते स्त्रीगण तोमारे देखि' गेल। स्त्रीगण दुग्ध दिया आमारे पाठाइल॥ 30 ॥ गोदोहन करिते चाहि, शीघ्र आमि याब। पुनः आसिं' आमि एइ भाण्ड लइब॥” 31 ॥ अनुवाद—उस बालकने उत्तर दिया,—“मैं एक गोप हूँ और इसी गाँवमें रहता हूँ। हमारे गाँवमें कोई भी भूखा नहीं रहता। यहाँ कोई अन्न माँगकर खा लेता है या कोई केवल दूध माँगकर पी लेता है। और भिक्षा न माँगनेवालेको मैं स्वयं ही आहार पहुँचा देता हूँ। मेरे गाँवकी कुछ स्त्रियाँ जल लेनेके लिये इस कुण्डपर 116 ।