भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 965

चौथा अध्याय 4/10-21 ] भिक्षा लागि' एकदिन एक ग्राम गिया। आपने अनेक अन्न आनिल मागिया ॥ 11 ॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने चार भक्तोंके साथ उत्कण्ठापूर्वक श्रीकृष्णनामका कीर्तन करते हुए नीलाचलकी ओर प्रस्थान किया। महाप्रभु स्वयं एक-एक दिन एक-एक ग्राममें भिक्षा माँगनेके लिये जाते और बहुतसे चावल-दालादि ले आते॥10-11॥ महाप्रभुका रेमुणा पहुँचना और श्रीगोपीनाथ-दर्शन :- पथे बड़ बड़ दानी विघ्न नाहि करे। ता' सबारे कृपा करि' आइला रेमुणारे ॥ 12 ॥ रेमुणाते गोपीनाथ परम-मोहन। भक्ति करि' कैल प्रभु ताँर दरशन ॥ 13 ॥ ताँर पादपद्म-निकट प्रणाम करिते। ताँर पुष्प-चूड़ा पड़िल प्रभुर माथाते ॥ 14 ॥ अनुवाद—मार्गमें अनेक स्थानोंपर 'बड़े-बड़े दानी' अर्थात् पथ-कर संग्रह करनेवाले बलवान व्यक्ति थे, परन्तु किसीने भी महाप्रभुको रोककर कर नहीं लिया। महाप्रभु उन सबपर कृपा करते हुए रेमुणामें आये। रेमुणामें परम मनोहर श्रीगोपीनाथ विराजमान हैं, महाप्रभुने बड़े भक्तिभावसे उनका दर्शन किया। महाप्रभुने श्रीगोपीनाथके श्रीचरणकमलोंके निकट जाकर प्रणाम किया, तभी श्रीगोपीनाथका पुष्प-मुकुट गिरकर महाप्रभुके मस्तकपर जा पड़ा॥12-14॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'दानी'—घाटके माँझी (शुल्क संग्रह करनेवाले)। रेमुणा'—बालेश्वरके निकट (पाँच मील पश्चिममें) रेमुणा नामका ग्राम है। वहाँ 'क्षीरचोरा गोपीनाथ' विराजमान हैं॥12-13॥ अनुभाष्य—'रेमुणा'—मध्यलीला 1/97 संख्याका अनुभाष्य देखें। इस स्थानमें 'श्रीगोपीनाथ'-विग्रह है और श्रीश्यामानन्द प्रभुके सेवक श्रीरसिकानन्द प्रभुकी समाधि आज भी विद्यमान है॥12॥ महाप्रभुका नृत्य-कीर्तन और विग्रहके सेवकोंके द्वारा महाप्रभुकी पूजा :- चूड़ा पाञा महाप्रभुर आनन्दित मन। बहु नृत्यगीत कैल लञा भक्तगण ॥ 15 ॥ प्रभुर प्रभाव देखि' प्रेम-रूप-गुण। विस्मित हइला गोपीनाथेर दासगण ॥ 16 ॥ नानारूपे प्रीत्ये कैल प्रभुर सेवन। सेइ रात्रि ताँहा प्रभु करिला वञ्चन ॥ 17 ॥ अनुवाद—पुष्प-मुकुटको पाकर महाप्रभुको बहुत आनन्द हुआ और वे भक्तोंके साथ मिलकर नृत्य-कीर्तन करने लगे। महाप्रभुके अलौकिक भाव, उनका श्रीकृष्णमें प्रेम, उनके रूप और गुणोंको देखकर श्रीगोपीनाथके सेवक विस्मित हो गये। उन सेवकोंने अनेक प्रकारसे प्रीतिपूर्वक महाप्रभुकी सेवा की। महाप्रभुने वह रात श्रीगोपीनाथ-मन्दिरमें ही बितायी॥15-17॥ अनुभाष्य—'वञ्चन'—यापन अर्थात् बिताना॥17॥ गुरुमुखसे सुने श्रीकृष्णके भक्तवात्सल्योद्दीपक क्षीरप्रसादके सम्मानार्थ महाप्रभुकी वहाँ अपेक्षा :- महाप्रसाद-क्षीर-लोभे रहिला प्रभु तथा। पूर्वे ईश्वरपुरी ताँरे कहियाछेन कथा ॥ 18 ॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथके खीररूपी महाप्रसादके लोभसे महाप्रभु वहीं रहे। महाप्रभुके गुरुदेव श्रीईश्वरपुरीने पहले स्वयं उनको खीरकी महिमा बतलायी थी॥18॥ भक्तोंके समक्ष महाप्रभुके द्वारा भक्त-माधवेन्द्रपुरीके लिये श्रीगोपीनाथका 'क्षीरचोरा' बननेके प्रसङ्गका वर्णन :- 'क्षीरचोरा गोपीनाथ' प्रसिद्ध ताँर नाम। भक्तगणे कहे प्रभु सेइ त' आख्यान ॥ 19 ॥ पूर्वे माधव-पुरीर लागि' क्षीर कैल चुरि। अतएव नाम हैल 'क्षीरचोरा हरि' ॥ 20 ॥ पूर्वे श्रीमाधव-पुरी आइला वृन्दावन। भ्रमिते भ्रमिते गेला यथा गोवर्धन ॥ 21 ॥ । 115