भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 964, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 964

[ 4/1-10 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीगोपालः (वज्रस्थापितविग्रहः गोवर्धनधारी) प्रादुरासीत् (प्रादुर्बभूव); तं माधवेन्द्रं (लक्ष्मीपतिशिष्यं माधवसम्प्रदायगुरुं माधवेन्द्रपुरीं) नतोऽस्मि। श्लोक-भावानुवाद—जिनको देनेके लिये रेमुणा ग्राममें स्थित श्रीगोपीनाथ नामसे प्रसिद्ध श्रीविग्रहका नाम खीरका कुल्हड़ चुरानेके कारण 'क्षीरचोरगोपीनाथ' हुआ था तथा जिनके प्रेमके वशीभूत होकर व्रजनाभके द्वारा स्थापित गोवर्धनधारी श्रीगोपालके रूपमें प्रकाशित हुए थे, उन श्रीलक्ष्मीपतिके शिष्य मध्वसम्प्रदायके गुरु श्रीमाधवेन्द्रपुरीको मैं नमन करता हूँ॥१॥ जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥२॥ अनुवाद—श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो और समस्त श्रीगौरभक्तोंकी जय हो॥२॥ चैतन्यभागवतमें महाप्रभुके नीलाचल गमनके बादकी अन्य-अन्य लीलाएँ मधुररूपसे वर्णित :- नीलाद्रि-गमन, जगन्नाथ-दरशन। सार्वभौम भट्टाचार्य-प्रभुर मिलन॥३॥ ए सकल लीला श्रीदास-वृन्दावन। विस्तारि' वर्णियाछेन उत्तम वर्णन॥४॥ सहजे विचित्र मधुर चैतन्य-विहार। वृन्दावनदास-मुखे अमृतेर धार॥५॥ पुनरुक्ति और दम्भ अथवा श्रौतपन्थाके विरोधके भयसे ग्रन्थकार निवृत्त :- अतएव ताहा वर्णिले हय पुनरुक्ति। दम्भ करि' वर्णि यदि नाहि तैछे शक्ति॥६॥ अनुवाद—महाप्रभुका नीलाचल जाना, श्रीजगन्नाथका दर्शन करना और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके साथ उनका मिलन-इन सब लीलाओंका श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने विस्तारपूर्वक अपने ग्रन्थ श्रीचैतन्यभागवतमें उत्तम रूपसे वर्णन किया है। महाप्रभुकी लीलाएँ स्वाभाविक रूपसे मधुर और विचित्र हैं, परन्तु श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके श्रीमुखसे निकलनेपर तो वे अमृतकी धाराके समान प्रतीत होती हैं। इसलिये उन लीलाओंका पुनः वर्णन करनेसे पुनरुक्ति होगी और यदि दम्भ करके मैं उनका वर्णन करना भी चाहूँ, तो मुझमें ऐसी शक्ति नहीं है॥३-6॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'ए सकल लीला'—ये सब लीलाएँ। श्रीचैतन्यभागवतके अन्त्यखण्डके दूसरे और तीसरे अध्यायमें इन्हें देखें॥४॥ चैतन्यभागवतमें विस्तृत रूपसे जो वर्णन हुआ है, उसका इस ग्रन्थमें संक्षेपमें और उसमें जो संक्षेपमें है, उसका इस ग्रन्थमें विस्तृत रूपसे वर्णन :- चैतन्यमङ्गले याहा करिल वर्णन। सूत्ररूपे सेइ लीला करिये सूचन॥७॥ ताँर सूत्रे आछे, तँह ना कैल वर्णन। यथा-कथञ्चित् करि' से लीला-कथन॥८॥ ग्रन्थकारका अतुलनीय मानद-धर्म— वृन्दावनदासकी वन्दना :- अतएव ताँर पाये करि नमस्कार। ताँर पाय अपराध ना हउक् आमार॥९॥ अनुवाद—श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थ श्रीचैतन्यमङ्गल (श्रीचैतन्यभागवत)में जिन लीलाओंका विस्तारसे वर्णन किया है, उन लीलाओंको मैं संक्षेपमें लिखूँगा। जिन लीलाओंका उन्होंने सूत्ररूपसे वर्णन किया है, अथवा जिन लीलाओंका उन्होंने वर्णन नहीं किया है, उन सबका मैं अपने सामर्थ्यानुसार विस्तारसे वर्णन करनेकी चेष्टा करूँगा। इसलिये मैं श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके श्रीचरणोंमें दीनतापूर्वक नमस्कार करता हूँ, जिससे उनके श्रीचरणोंमें मेरा कोई अपराध न हो॥७-9॥ श्रीनित्यानन्दादि चार भक्तोंके साथ महाप्रभुकी पुरीके लिये यात्रा :- एइमत महाप्रभु चलिला नीलाचले। चारिभक्त-सङ्गे कृष्णकीर्त्तन कुतूहले॥१०॥ 114 ।