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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 4/1-10 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीगोपालः (वज्रस्थापितविग्रहः गोवर्धनधारी) प्रादुरासीत् (प्रादुर्बभूव); तं माधवेन्द्रं (लक्ष्मीपतिशिष्यं माधवसम्प्रदायगुरुं माधवेन्द्रपुरीं) नतोऽस्मि। श्लोक-भावानुवाद—जिनको देनेके लिये रेमुणा ग्राममें स्थित श्रीगोपीनाथ नामसे प्रसिद्ध श्रीविग्रहका नाम खीरका कुल्हड़ चुरानेके कारण 'क्षीरचोरगोपीनाथ' हुआ था तथा जिनके प्रेमके वशीभूत होकर व्रजनाभके द्वारा स्थापित गोवर्धनधारी श्रीगोपालके रूपमें प्रकाशित हुए थे, उन श्रीलक्ष्मीपतिके शिष्य मध्वसम्प्रदायके गुरु श्रीमाधवेन्द्रपुरीको मैं नमन करता हूँ॥१॥ जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥२॥ अनुवाद—श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो और समस्त श्रीगौरभक्तोंकी जय हो॥२॥ चैतन्यभागवतमें महाप्रभुके नीलाचल गमनके बादकी अन्य-अन्य लीलाएँ मधुररूपसे वर्णित :- नीलाद्रि-गमन, जगन्नाथ-दरशन। सार्वभौम भट्टाचार्य-प्रभुर मिलन॥३॥ ए सकल लीला श्रीदास-वृन्दावन। विस्तारि' वर्णियाछेन उत्तम वर्णन॥४॥ सहजे विचित्र मधुर चैतन्य-विहार। वृन्दावनदास-मुखे अमृतेर धार॥५॥ पुनरुक्ति और दम्भ अथवा श्रौतपन्थाके विरोधके भयसे ग्रन्थकार निवृत्त :- अतएव ताहा वर्णिले हय पुनरुक्ति। दम्भ करि' वर्णि यदि नाहि तैछे शक्ति॥६॥ अनुवाद—महाप्रभुका नीलाचल जाना, श्रीजगन्नाथका दर्शन करना और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके साथ उनका मिलन-इन सब लीलाओंका श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने विस्तारपूर्वक अपने ग्रन्थ श्रीचैतन्यभागवतमें उत्तम रूपसे वर्णन किया है। महाप्रभुकी लीलाएँ स्वाभाविक रूपसे मधुर और विचित्र हैं, परन्तु श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके श्रीमुखसे निकलनेपर तो वे अमृतकी धाराके समान प्रतीत होती हैं। इसलिये उन लीलाओंका पुनः वर्णन करनेसे पुनरुक्ति होगी और यदि दम्भ करके मैं उनका वर्णन करना भी चाहूँ, तो मुझमें ऐसी शक्ति नहीं है॥३-6॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'ए सकल लीला'—ये सब लीलाएँ। श्रीचैतन्यभागवतके अन्त्यखण्डके दूसरे और तीसरे अध्यायमें इन्हें देखें॥४॥ चैतन्यभागवतमें विस्तृत रूपसे जो वर्णन हुआ है, उसका इस ग्रन्थमें संक्षेपमें और उसमें जो संक्षेपमें है, उसका इस ग्रन्थमें विस्तृत रूपसे वर्णन :- चैतन्यमङ्गले याहा करिल वर्णन। सूत्ररूपे सेइ लीला करिये सूचन॥७॥ ताँर सूत्रे आछे, तँह ना कैल वर्णन। यथा-कथञ्चित् करि' से लीला-कथन॥८॥ ग्रन्थकारका अतुलनीय मानद-धर्म— वृन्दावनदासकी वन्दना :- अतएव ताँर पाये करि नमस्कार। ताँर पाय अपराध ना हउक् आमार॥९॥ अनुवाद—श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थ श्रीचैतन्यमङ्गल (श्रीचैतन्यभागवत)में जिन लीलाओंका विस्तारसे वर्णन किया है, उन लीलाओंको मैं संक्षेपमें लिखूँगा। जिन लीलाओंका उन्होंने सूत्ररूपसे वर्णन किया है, अथवा जिन लीलाओंका उन्होंने वर्णन नहीं किया है, उन सबका मैं अपने सामर्थ्यानुसार विस्तारसे वर्णन करनेकी चेष्टा करूँगा। इसलिये मैं श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके श्रीचरणोंमें दीनतापूर्वक नमस्कार करता हूँ, जिससे उनके श्रीचरणोंमें मेरा कोई अपराध न हो॥७-9॥ श्रीनित्यानन्दादि चार भक्तोंके साथ महाप्रभुकी पुरीके लिये यात्रा :- एइमत महाप्रभु चलिला नीलाचले। चारिभक्त-सङ्गे कृष्णकीर्त्तन कुतूहले॥१०॥ 114 ।

चौथा अध्याय 4/10-21 ] भिक्षा लागि' एकदिन एक ग्राम गिया। आपने अनेक अन्न आनिल मागिया ॥ 11 ॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने चार भक्तोंके साथ उत्कण्ठापूर्वक श्रीकृष्णनामका कीर्तन करते हुए नीलाचलकी ओर प्रस्थान किया। महाप्रभु स्वयं एक-एक दिन एक-एक ग्राममें भिक्षा माँगनेके लिये जाते और बहुतसे चावल-दालादि ले आते॥10-11॥ महाप्रभुका रेमुणा पहुँचना और श्रीगोपीनाथ-दर्शन :- पथे बड़ बड़ दानी विघ्न नाहि करे। ता' सबारे कृपा करि' आइला रेमुणारे ॥ 12 ॥ रेमुणाते गोपीनाथ परम-मोहन। भक्ति करि' कैल प्रभु ताँर दरशन ॥ 13 ॥ ताँर पादपद्म-निकट प्रणाम करिते। ताँर पुष्प-चूड़ा पड़िल प्रभुर माथाते ॥ 14 ॥ अनुवाद—मार्गमें अनेक स्थानोंपर 'बड़े-बड़े दानी' अर्थात् पथ-कर संग्रह करनेवाले बलवान व्यक्ति थे, परन्तु किसीने भी महाप्रभुको रोककर कर नहीं लिया। महाप्रभु उन सबपर कृपा करते हुए रेमुणामें आये। रेमुणामें परम मनोहर श्रीगोपीनाथ विराजमान हैं, महाप्रभुने बड़े भक्तिभावसे उनका दर्शन किया। महाप्रभुने श्रीगोपीनाथके श्रीचरणकमलोंके निकट जाकर प्रणाम किया, तभी श्रीगोपीनाथका पुष्प-मुकुट गिरकर महाप्रभुके मस्तकपर जा पड़ा॥12-14॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'दानी'—घाटके माँझी (शुल्क संग्रह करनेवाले)। रेमुणा'—बालेश्वरके निकट (पाँच मील पश्चिममें) रेमुणा नामका ग्राम है। वहाँ 'क्षीरचोरा गोपीनाथ' विराजमान हैं॥12-13॥ अनुभाष्य—'रेमुणा'—मध्यलीला 1/97 संख्याका अनुभाष्य देखें। इस स्थानमें 'श्रीगोपीनाथ'-विग्रह है और श्रीश्यामानन्द प्रभुके सेवक श्रीरसिकानन्द प्रभुकी समाधि आज भी विद्यमान है॥12॥ महाप्रभुका नृत्य-कीर्तन और विग्रहके सेवकोंके द्वारा महाप्रभुकी पूजा :- चूड़ा पाञा महाप्रभुर आनन्दित मन। बहु नृत्यगीत कैल लञा भक्तगण ॥ 15 ॥ प्रभुर प्रभाव देखि' प्रेम-रूप-गुण। विस्मित हइला गोपीनाथेर दासगण ॥ 16 ॥ नानारूपे प्रीत्ये कैल प्रभुर सेवन। सेइ रात्रि ताँहा प्रभु करिला वञ्चन ॥ 17 ॥ अनुवाद—पुष्प-मुकुटको पाकर महाप्रभुको बहुत आनन्द हुआ और वे भक्तोंके साथ मिलकर नृत्य-कीर्तन करने लगे। महाप्रभुके अलौकिक भाव, उनका श्रीकृष्णमें प्रेम, उनके रूप और गुणोंको देखकर श्रीगोपीनाथके सेवक विस्मित हो गये। उन सेवकोंने अनेक प्रकारसे प्रीतिपूर्वक महाप्रभुकी सेवा की। महाप्रभुने वह रात श्रीगोपीनाथ-मन्दिरमें ही बितायी॥15-17॥ अनुभाष्य—'वञ्चन'—यापन अर्थात् बिताना॥17॥ गुरुमुखसे सुने श्रीकृष्णके भक्तवात्सल्योद्दीपक क्षीरप्रसादके सम्मानार्थ महाप्रभुकी वहाँ अपेक्षा :- महाप्रसाद-क्षीर-लोभे रहिला प्रभु तथा। पूर्वे ईश्वरपुरी ताँरे कहियाछेन कथा ॥ 18 ॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथके खीररूपी महाप्रसादके लोभसे महाप्रभु वहीं रहे। महाप्रभुके गुरुदेव श्रीईश्वरपुरीने पहले स्वयं उनको खीरकी महिमा बतलायी थी॥18॥ भक्तोंके समक्ष महाप्रभुके द्वारा भक्त-माधवेन्द्रपुरीके लिये श्रीगोपीनाथका 'क्षीरचोरा' बननेके प्रसङ्गका वर्णन :- 'क्षीरचोरा गोपीनाथ' प्रसिद्ध ताँर नाम। भक्तगणे कहे प्रभु सेइ त' आख्यान ॥ 19 ॥ पूर्वे माधव-पुरीर लागि' क्षीर कैल चुरि। अतएव नाम हैल 'क्षीरचोरा हरि' ॥ 20 ॥ पूर्वे श्रीमाधव-पुरी आइला वृन्दावन। भ्रमिते भ्रमिते गेला यथा गोवर्धन ॥ 21 ॥ । 115

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

[ 4/19–31 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—श्रीगोपीनाथ कैसे ‘क्षीरचोरा गोपीनाथ'के नामसे प्रसिद्ध हुए, महाप्रभुने इस कथाको अपने भक्तोंको सुनाया। पूर्वकालमें श्रीगोपीनाथने अपने भक्त श्रीमाधवेन्द्रपुरीके लिये खीरकी चोरी की थी, इसलिये उनका नाम ‘क्षीरचोर गोपीनाथ’ हो गया था। एक बार श्रीमाधवेन्द्रपुरी वृन्दावन आये थे और भ्रमण करते-करते वे गिरिराज गोवर्धन पहुँचे॥ 19–21॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘माधव-पुरी’—माधवेन्द्रपुरी ॥ 20 ॥ निरन्तर कृष्णप्रेममें मत्त श्रीमाधवेन्द्रपुरी :— प्रेमे मत्त,—नाहि ताँर रात्रिदिन-ज्ञान। क्षणे उठे, क्षणे पड़े, नाहि स्थानास्थान॥ 22 ॥ शैल परिक्रमा करि’ गोविन्दकुण्डे आसिं’। स्नान करि, वृक्षतले आछे सन्ध्याय बसिं’ ॥ 23 ॥ अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्र पुरी प्रेममें ऐसे मत्त रहते कि उनको रात-दिनका कोई भी ज्ञान नहीं रहता था। प्रेमावेशमें वे एक क्षण उठकर खड़े होते और अगले क्षण भूमिपर गिर पड़ते, वह स्थान पवित्र है अथवा अपवित्र, उन्हें कुछ भी ध्यान नहीं रहता था। एक दिन गिरिराज गोवर्धनकी परिक्रमा करके उन्होंने गोविन्दकुण्डमें आकर स्नान किया। स्नान करके सन्ध्याके समय वे एक वृक्षके नीचे बैठे हुए थे॥ 22–23 ॥ अनुभाष्य—‘शैल’—गोवर्धन पर्वत, मथुरासे आठ कोस दूर ॥ 23 ॥ गोपबालकके वेशमें श्रीकृष्णके द्वारा अपने भक्त श्रीमाधवेन्द्रपुरीको दुग्ध-दान :— गोप-बालक एक दुग्ध-भाण्ड लञा। आसिं’ आगे धरि' किछु बलिल हासिया ॥ 24 ॥ “पुरी, एइ दुग्ध लञा कर तुम पान। मागिं’ केने नाहि खाओ, किंवा कर ध्यान॥” 25 ॥ बालकेर सौन्दर्ये पुरीर हइल सन्तोष। ताहार मधुर-वाक्ये गेल भोक-शोष ॥ 26 ॥ अनुवाद—तभी एक गोपबालक दूधसे भरा पात्र लेकर आया और उसे उनके आगे रखकर मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए उनसे कहने लगा,—“हे माधवेन्द्रपुरी! तुम यह दूध लेकर पी लो। कुछ माँगकर खाते क्यों नहीं हो? और किसका ध्यान कर रहे हो?” उस बालकके सौन्दर्यको देखकर श्रीमाधवेन्द्रपुरी बहुत प्रसन्न हुए और उसके मधुर वचन सुनकर उनकी भूख-प्यास भी दूर हो गयी ॥ 24–26 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘भोक-शोष’—भूख और प्यास ॥ 26 ॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके द्वारा बालकके परिचयकी जिज्ञासा :— पुरी कहे,—“के तुमि, काँहा तोमार वास। केमते जानिले, आमि करि उपवास॥” 27 ॥ अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उस बालकसे पूछा,—“तुम कौन हो? कहाँ रहते हो? तुम्हें कैसे पता चला कि मैंने आज उपवास किया है?॥” 27 ॥ बालकके द्वारा आत्मगोपन :— बालक कहे,—“गोप आमि, एइ ग्रामे बसि। आमार ग्रामेते केह ना रहे उपवासी ॥ 28 ॥ केह अन्न मागि' खाय, केह दुग्धाहार। अयाचक-जने आमि दिये त' आहार ॥ 29 ॥ जल निते स्त्रीगण तोमारे देखि' गेल। स्त्रीगण दुग्ध दिया आमारे पाठाइल॥ 30 ॥ गोदोहन करिते चाहि, शीघ्र आमि याब। पुनः आसिं' आमि एइ भाण्ड लइब॥” 31 ॥ अनुवाद—उस बालकने उत्तर दिया,—“मैं एक गोप हूँ और इसी गाँवमें रहता हूँ। हमारे गाँवमें कोई भी भूखा नहीं रहता। यहाँ कोई अन्न माँगकर खा लेता है या कोई केवल दूध माँगकर पी लेता है। और भिक्षा न माँगनेवालेको मैं स्वयं ही आहार पहुँचा देता हूँ। मेरे गाँवकी कुछ स्त्रियाँ जल लेनेके लिये इस कुण्डपर 116 ।

चौथा अध्याय 4/28-40 ] आयी थीं और उन्होंने तुम्हें देखा था। उन स्त्रियोंने ही दूध देकर मुझे यहाँ भेजा है। अभी मुझे जल्दीसे गाय दुहनेके लिये जाना है, मैं पुनः आकर इस दूधके पात्रको ले जाऊँगा॥”28-31॥ दूध देकर बालकका अन्तर्धान होना :- एत बलि' गेला बालक ना देखिये आर। माधव-पुरीर चित्ते हैल चमत्कार ॥ 32 ॥ दूध पीनेके बाद श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी बालकके लिये प्रतीक्षा :- दुग्ध पान करि' भाण्ड धुञा राखिल। बाट देखे, से बालक पुनः ना आइल ॥ 33 ॥ अनुवाद-इतना कहकर वह गोपबालक वहाँसे चला गया मानो वह अन्तर्धान हो गया हो। दूध पीकर श्रीमाधवेन्द्रपुरीके चित्तमें चमत्कार हो गया। दूध पीकर तब श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उस बर्तनको धोकर रख दिया और उस बालककी बाट देखने लगे, परन्तु वह बालक फिर लौटकर नहीं आया ॥ 32-33 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'बाट' - राह, उड़िया भाषाका शब्द ॥ 33 ॥ समाधिमें बालकरूपी श्रीकृष्णका दर्शन :- बसि' नाम लय पुरी, नाहि निद्रा हय। शेषरात्रे तन्द्रा हैल, - बाह्यवृत्ति-लय ॥ 34 ॥ अनुवाद-श्रीमाधवेन्द्रपुरी वहीं बैठकर नाम जप करने लगे, रातमें भी उनको नींद नहीं आयी। रातके अन्तमें उन्हें तन्द्रा आ गयी और उनकी बाह्य चेतना लुप्त हो गयी ॥ 34 ॥ अनुभाष्य - 'नाम' - हरिनाम । 'बाह्यवृत्ति-लय' - भक्तिमें समाहित (समाधिस्थ) हो गये ॥ 34 ॥ स्वप्नमें श्रीमाधवेन्द्रपुरीको बालकरूपी श्रीकृष्णके द्वारा एक कुञ्जमें लाना :- स्वप्न देखे, सेइ बालक सम्मुखे आसिञा। एक कुञ्जे लञा गेल हातेते धरिञा ॥ 35 ॥ सेवामें शिथिलताके कारण गिरिधारीके द्वारा दुःख प्रकट करना :- कुञ्ज देखाञा कहे, - "आमि एइ कुञ्जे रइ। शीत-वृष्टि-वाताग्निते महा-दुःख पाइ ॥ 36 ॥ गिरिराजके ऊपर एक मठ निर्माण करके गिरिधारी गोपालकी प्रतिष्ठा करनेका आदेश :- ग्रामेर लोक आनि' आमा काढ़' कुञ्ज हैते। पर्वत-उपरि लञा राख भालमते ॥ 37 ॥ एक मठ करि' ताँहा करह स्थापन। बहु शीतल जले कर श्रीअङ्ग मार्जन ॥ 38 ॥ अनुवाद-श्रीमाधवेन्द्रपुरीने स्वप्नमें देखा कि वही गोपबालक उनके सामने आया और उनको हाथसे पकड़कर एक कुञ्जमें ले गया। कुञ्ज दिखाते हुए उसने कहा, - “मैं इस कुञ्जमें रहता हूँ। सर्दी, गर्मी, वर्षा और आँधी-तूफानके कारण बहुत कष्ट पाता हूँ। तुम गाँवके लोगोंको लाकर मुझे इस कुञ्जसे बाहर निकालो और मुझे भलीभाँति गिरिराजके ऊपर विराजमान कर दो। उस स्थानपर एक मन्दिर स्थापित करो। फिर बहुतसा शीतल जल लाकर मेरे श्रीअङ्गोंका मार्जन करो ॥ 35-38 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'काढ़' - बाहर करो; 'मठ' - मन्दिर ॥ 37 ॥ भक्तकी प्रतीक्षा में भगवान् :- बहुदिन तोमार पथ करि निरीक्षण। कबै आसि' माधव आमा करिबे सेवन ॥ 39 ॥ तोमार प्रेमवशे करि' सेवा अङ्गीकार। दर्शन दिया निस्तारिब सकल संसार ॥ 40 ॥ अनुवाद-मैं बहुत दिनोंसे तुम्हारी राह देख रहा था कि कब माधवेन्द्रपुरी यहाँ आयेगा और मेरी सेवा करेगा। तुम्हारे प्रेमके वशीभूत होकर मैं तुम्हारी सेवा स्वीकार करूँगा और अपने दर्शन देकर संसारके समस्त लोगोंका उद्धार करूँगा ॥ 39-40 ॥ । 117

[ 4/41-51 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीगिरिधारीके द्वारा अपना परिचय प्रदान :- 'श्रीगोपाल' नाम मोर, —गोवर्धनधारी। वज्रेर स्थापित, आमि इँहा अधिकारी ॥ 41 ॥ शैल-उपरि हैते आमा कुञ्जे लुकाञा। म्लेच्छ-भये सेवक मोर गेल पलाञा ॥ 42 ॥ सेइ हैते रहि आमि एइ कुञ्ज-स्थाने। भाल, आइला तुमि, आमा काढ़ सावधाने ॥"43 ॥ अनुवाद—मैं गोवर्धनधारी हूँ और मेरा नाम 'श्रीगोपाल' है। वज्रनाभने मुझे स्थापित किया था और मैं यहाँका अधिकारी हूँ। म्लेच्छोंके भयसे मेरा सेवक मुझे गोवर्धनके ऊपरसे लाकर इस कुञ्जमें छिपाकर स्वयं भाग गया था। तभीसे मैं इस कुञ्जमें रह रहा हूँ। अच्छा हुआ जो तुम आ गये, अब सावधानीपूर्वक मुझे यहाँसे निकालो॥"41-43 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'वज्रेर स्थापित' - श्रीकृष्णके पौत्र अनिरुद्धके पुत्र वज्रनाभको पाण्डवोंने द्वारकासे लाकर मथुराका राजा बनाया था। वज्रनाभने श्रीकृष्णकी लीलाओंके सभी स्थानोंको खोजकर कुछेक श्रीमूर्तियोंकी स्थापना की थी। श्रीगोवर्धनधारी गोपाल उन्हीं श्रीमूर्तियोंमेंसे ही एक श्रीमूर्त्ति है ॥ 41 ॥ गोपालका अन्तर्धान होना :- एत बलि' येइ बालक अन्तर्धान हैल। जागिया माधवपुरी विचार करिल ॥ 44 ॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीका विचार :- 'श्रीकृष्णके देखिनु मुञि नारिनु चिन्तेि।' एत बलि' प्रेमावेशे पड़िला भूमिते ॥ 45 ॥ अनुवाद—यह कहकर वह बालक अन्तर्धान हो गया। तब श्रीमाधवेन्द्रपुरीने जागकर स्वप्नमें जो देखा, उसपर विचार करने लगे, – “हाय ! हाय ! श्रीकृष्णको देखकर भी मैं उन्हें पहचान न सका।" ऐसा कहकर वे प्रेमावेशमें पछाड़ खाकर भूमिपर गिर पड़े॥ 44-45 ॥ गिरिधारीको प्रकट करनेके लिये श्रीमाधवेन्द्रपुरीका यत्न :- क्षणेक रोदन करि' मन कैल स्थिर। आज्ञा-पालन लागि' हइला सुस्थिर ॥ 46 ॥ प्रातः स्नान करि' पुरी ग्राममध्ये गेला। सब लोक एकत्र करि' कहिते लागिला ॥ 47 ॥ ग्रामवासियोंको सहायताके लिये प्रेरित करना :- "ग्रामेर ईश्वर तोमार - गोवर्धनधारी। कुञ्जे आछे, चल, ताँरे बाहिर ये करि ॥ 48 ॥ कुठारि, कोदालि लह द्वारा करिते। अत्यन्त निविड़ कुञ्ज, – नारि प्रवेशिते ॥ "49 ॥ अनुवाद-तब कुछ समय तक रोनेके बाद उन्होंने मनमें धैर्य धारण किया और श्रीगोपालकी आज्ञाका पालन करनेके लिये तैयार हो गये। प्रातःकाल स्नान करनेके बाद श्रीमाधवेन्द्रपुरी गाँवमें गये और सब लोगोंको एकत्रित करके कहने लगे, – “तुम्हारे गाँवके ईश्वर श्रीगोवर्धनधारी एक कुञ्जमें पड़े हुए हैं। चलो, हम सब उनको वहाँसे उन्हें बाहर निकालें। वह कुञ्ज बहुत ही घना है, उसमें कोई प्रवेश नहीं कर सकता। इसलिये रास्ता बनानेके लिये अपने साथ कुल्हाड़ियाँ और फावड़े ले चलो॥" 46-49 ॥ सभी ग्रामवासियोंका मिलकर प्रयत्न :- शुनि' लोक ताँर सङ्गे चलिला हरिषे। कुञ्ज काटि' द्वार करि' करिला प्रवेशे ॥ 50 ॥ अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी बात सुनकर गाँवके लोग हर्षित होकर उनके साथ चल पड़े। और वहाँ जाकर कुञ्जकी झाड़ियों आदिको काटकर रास्ता बनाकर उसमें प्रवेश किया ॥ 50 ॥ सभीको छिपे हुए श्रीगिरिधारीका दर्शन और आनन्द :- ठाकुर देखिल माटी-तृणे आच्छादित। देखि' सब लोक हैल आनन्दे विस्मित ॥ 51 ॥ 118 |

चौथा अध्याय 4/51-63 ] अनुवाद—उन्होंने देखा कि धूल-मिट्टी और तिनकोंसे ढके हुए हैं। श्रीगोपालको देखकर वे सब लोग बहुत आनन्दित और विस्मित हुए॥51॥ विग्रहका अत्यधिक भार :- आवरण दूर करि' करिल चिह्निते। महा-भारि ठाकुर-केह नारे चालाइते॥52॥ महा-महा-बलिष्ठ लोक एकत्र करिया। पर्वत-उपरि गेल पुरी ठाकुर लञा॥53॥ पर्वतके ऊपर विग्रहका अभिषेक आरम्भ :- पाथरेर सिंहासने ठाकुर बसाइल। बड़ एक पाथर पृष्ठे अवलम्ब दिल॥54॥ अनुवाद—मिट्टी-तृणादिके आवरणको हटानेके बाद उन्होंने देखा कि श्रीगोपाल तो बहुत भारी हैं, कोई भी उनको हिला तक नहीं पा रहा है। तब बड़े-बड़े बलवान लोगोंको इकट्ठा करके उनके द्वारा श्रीगोपालको उठवाकर श्रीमाधवेन्द्रपुरी पर्वतके ऊपर ले गये। एक बड़े पत्थरको सिंहासन बनाकर श्रीगोपालको उसपर बैठाया और उनको सहारा देनेके लिये पीछे एक बड़ा पत्थर लगाया॥52-54॥ नैवेद्य और पूजाके उपकरण :- ग्रामेर ब्राह्मण सब नवघट लञा। गोविन्द-कुण्डेर जल आनिल छानिञा॥55॥ नवशतघट जल कैल उपनीत। नाना वाद्य-भेरी बाजे, स्त्रीगण गाय गीत॥56॥ केह गाय, केह नाचे, महोत्सव हैल। दधि, दुग्ध, घृत आइल ग्रामे यत छिल॥57॥ भोग-सामग्री आइल सन्देशादि यत। नाना उपहार, ताहा कहिते पारि कत॥58॥ तुलसी आदि, पुष्प, वस्त्र आइल अनेक। आपने माधवपुरी कैल अभिषेक॥59॥ अङ्गमला दूर करि' कराइल स्नान। बहु तैल दिया कैल श्रीअङ्ग चिक्कण॥60॥ पञ्चगव्य, पञ्चामृते स्नान कराञा। महास्नान कराइल शत घट दिञा॥61॥ पुनः तैल दिया कैल श्रीअङ्ग चिक्कण। शङ्ख-गन्धोदके कैल स्नान समाधान॥62॥ श्रीअङ्ग मार्जन करि' वस्त्र पराइल। चन्दन, तुलसी, पुष्प-माला अङ्गे दिल॥63॥ अनुवाद—गाँवके सब ब्राह्मण नये-नये घड़े लेकर गोविन्द कुण्डके जलको छानकर लाने लगे। इस प्रकार एक सौ नये घड़े जल आ गया। तब अनेक प्रकारके भेरी आदि वाद्ययन्त्र बजने लगे और स्त्रियाँ मधुर स्वरसे गीत गाने लगीं। कोई गा रहा था, तो कोई नाच रहा था, इस प्रकार वहाँ एक महोत्सव होने लगा। गाँवमें जितना भी दही, दूध और घी था, सब वहाँ लाया गया। भोग सामग्रीके लिये जितने प्रकारके सन्देशादि मिष्ठान्न और उपहार लाये गये, उनको मैं बतला नहीं सकता। गाँवके लोग तुलसी, पुष्प और अनेक प्रकारके वस्त्र ले आये और स्वयं श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपाल-विग्रहका अभिषेक किया। मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए श्रीविग्रहके ऊपर चढ़े धूल-तृणादि मैलको दूर किया गया। तब श्रीविग्रहको स्नान कराना आरम्भ किया। सबसे पहले श्रीविग्रहकी बहुत मात्रामें सुगन्धित तेलसे मालिश करके उनके श्रीअङ्गोंको चमकाया। तब पञ्चगव्य और पञ्चामृतसे स्नान कराके सौ घड़ोंमें लाये जल और घीके द्वारा महास्नान कराया। महास्नानके बाद फिरसे सुगन्धित तेल मलकर श्रीविग्रहके अङ्गोंको चमकाया गया तथा शङ्खमें सुगन्धित जल भरकर स्नान कराया। इस प्रकार श्रीगोपालके श्रीअङ्गोंका मार्जन हो जानेके बाद श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उन्हें वस्त्र पहनाये तथा श्रीअङ्गोंमें चन्दन, तुलसी और पुष्पमाला आदि अर्पण किये॥55-63॥ । 119

[ 4/60-65 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अमृतप्रवाह भाष्य- 'पञ्चगव्य' - दूध, दही, घी, गोमूत्र एवं गोबर; 'पञ्चामृत'-दही, दूध, घी, शहद एवं चीनी। 'शङ्ख-गन्धोदक'-शङ्खोदक अर्थात् शंखमें रखा हुआ पुष्प-चन्दन मिश्रित सुगन्धित जल ॥ 61-62 ॥

अनुभाष्य-हःभःविः छठा विभाग- “ततः शङ्खेनाभिषेकं कुर्याद् घण्टादिनिःस्वनैः। मूलेनाष्टाक्षरेणपि धूपयन्नन्तरान्तरा॥” 65॥

अर्थात् “स्नानपात्रमें श्रीभगवान्की मूर्तिको रखकर घण्टा आदि वाद्य-यन्त्रोंके साथ धूप अर्पण करते हुए शङ्खमें रखे जलके द्वारा बीच-बीचमें अष्टाक्षर मूल-मन्त्रके साथ अभिषेक करना चाहिये।”

यवचूर्ण ('जौ'का चूर्ण), गोधूमचूर्ण (गेहूँका चूर्ण), लोध्रचूर्ण (एक विशेष प्रकारके वृक्षके तनेसे बना चूर्ण), कुङ्कुमचूर्ण, मसूरचूर्णके द्वारा साफ करना चाहिये। बेसन और हल्दीके उबटनके द्वारा और 'खस' आदिसे निर्मित कूची, गायकी पूँछके बालोंसे बनी हुई कूची आदिसे अङ्गोंकी मैल दूर होती है। हःभःविः छठा विभाग-

“तत्र तु प्रथमं भक्त्या विदधीत सुगन्धिभिः। दिव्यैस्तैलादिभिर्द्रव्यैरभ्यङ्गं श्रीहरेः शनैः॥ 66 ॥ अभ्यङ्गद्रव्याणि- मालतीयूथीमादाय सुगन्धानान्तु वा पुनः॥ 67 ॥ तथान्यपुष्पजातीनां गृहीत्वा भक्तितो नराः॥ 68क ॥ यः पुनः पुष्पशैलेन दिव्योपधियुतेन हि॥ 69ख॥ अभ्यङ्गं कुरुते विष्णोर्मध्ये क्षिप्त्वा तु कुङ्कुमम्॥ 70क॥ गन्ध-तैलानि दिव्यानि सुगन्धीनि शुचीनि च॥” 71क ॥

अर्थात् “स्नानकार्यमें पहले दिव्य सुगन्धित तेलादि द्रव्योंके द्वारा भक्तिपूर्वक धीरे-धीरे श्रीहरिके सभी अङ्गोंको मलना चाहिये। मालती, यूथि, या अन्य-अन्य सुगन्धवाले पुष्पोंको लेकर और दिव्य औषधियुक्त कुङ्कुम-मिश्रित सुगन्धित पवित्र पुष्प-तेलके द्वारा भक्तिसहित श्रीविष्णुके अङ्गोंको मलना आवश्यक है।”

हःभःविः छठा विभाग- “ततः शङ्खभृतेनैव क्षीरेण स्नापयेत् क्रमात्। दध्ना घृतेन मधुना खण्डेन च पृथक् पृथक्॥” 72 ॥

अर्थात् “श्रीविष्णुके श्रीअङ्गोंको मलनेके बाद शङ्खमें दूध, दही, घी, शहद और चीनी डालकर क्रमानुसार पृथक्-पृथक्रूपसे स्नान कराना चाहिये।”

'महास्नान'-हःभःविः छठा विभाग- “द्वे सहस्रे पलानान्तु महास्नाने च संख्या॥” 75ख ॥

अर्थात् “देव-प्रतिमाको घीसे स्नान कराना होता है। महास्नानमें घी और स्नानजल, - प्रत्येकका परिमाण दो हजार 'पल' होता है। एक 'पल' चार 'तोला'के बराबर होता है, इस हिसाबसे महास्नानमें अढ़ाई मन (लगभग 90 किलो) जल लगता है।”

हःभःविः छठा विभाग- “ततः कोष्णेन संस्नाप्य संस्कृतेन सुगन्धना। शीतलेनाम्बुना शङ्खभृतेन स्नापयेत् पुनः॥ 107 ॥ चन्दनोशीर-कर्पूरकुङ्कुमागुरु-वासितैः। सलिलैः स्नापयेन्मन्त्री नित्यदा विभवे सती॥” 108 ॥

जलका परिमाण- “स्नाने पलशतं देयमभ्यङ्गे पञ्चविंशतिः। पलानां द्वे सहस्रे तु महास्नानं प्रकीर्त्तितम्॥” 109 ॥

अर्थात् “श्रीविग्रहके अङ्ग-मार्जनके बाद सर्वोषधि आदिके द्वारा सुसंस्कृत सुगन्धित गुनगुने जलके द्वारा स्नान कराकर शङ्खसे शीतल जलसे स्नान कराना चाहिये। सामर्थ्य होनेपर दीक्षित व्यक्तिको चन्दन, खस, कर्पूर, कुङ्कुम, अगुरु, चन्दनयुक्त जलसे प्रतिदिन श्रीविग्रहको स्नान कराना चाहिये।” जलका परिमाण- “स्नानमें एक सौ 'पल' और अभ्यङ्ग-स्नानमें पचीस 'पल' परिमाणमें जल देना चाहिये। दो हजार 'पल' जलसे महास्नान होता है॥” 60-62 ॥

भोग आरति :- धूप, दीप, करि' नाना भोग लगाइल। दधि-दुग्ध-सन्देशादि यत किछु आइल॥ 64 ॥ सुवासित जल नवपात्रे समर्पिल। आचमन दिया से ताम्बूल निवेदिल॥ 65 ॥

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चौथा अध्याय 4/64-76 ] आरात्रिक करि' कैल बहुत स्तवन। दण्डवत् करि' कैल आत्मसमर्पण॥66॥ अनुवाद—फिर श्रीमाधवेन्द्रपुरीने धूप, दीपके द्वारा श्रीगोपालका अर्चन करके दही, दूध और सन्देशादि अनेक प्रकारकी जो सामग्री गाँवसे आयी थी, उन सबका भोग लगाया। उसके बाद नये पात्रमें सुगन्धित जल अर्पित किया, तत्पश्चात् आचमन देकर श्रीगोपालको ताम्बूल अर्पण किया। फिर भोग-आरती करनेके बाद श्रीगोपालकी अनेक स्तव-स्तुति की। और अन्तमें दण्डवत् प्रणाम करके श्रीगोपालको आत्मसमर्पण किया॥64-66॥ पके हुए अन्नका भोग लगाना—अन्नकूट :— ग्रामेर यतेक तण्डुल, दालि, गोधूम-चूर्ण। सकल आनिया दिल पर्वत हैल पूर्ण॥67॥ कुम्भकार-घरे छिल ये मृद्भाजन। सब आनाइल प्राते, चड़िल रन्धन॥68॥ अनुवाद—गाँवके लोगोंके घरमें जितना भी चावल, दाल एवं आटा आदि था, वे सारा उठाकर वहाँ ले आये जिससे पर्वतका शिखर पूरा भर गया। गाँवके कुम्हारोंके घरमें जितने भी मिट्टीके बर्तन थे, वे भी उन सभी बर्तनोंको ले आये और प्रातःकालसे ही रसोई बननी आरम्भ हो गयी॥67-68॥ अनेक प्रकार व्यञ्जन :— दशविप्र अन्न रान्धि' करे एक स्तूप। जना-पाँच रान्धे व्यञ्जनादि नाना सूप॥69॥ वन्य शाक-फल-मूले विविध व्यञ्जन। केह बड़ा-बड़ि-कढ़ि करे विप्रगण॥70॥ जना पाँच-सात रुटि करे राशि-राशि। अन्न-व्यञ्जन सब रहे घृते भासि'॥71॥ नववस्त्र पाति' ताहे पलाशेर पात। रान्धि' रान्धि' तार उपर राशि कैल भात॥72॥ तार पाशे रुटि-राशिर पर्वत हैल। सूप-आदि-व्यञ्जन-भाण्ड चौदिके धरिल॥73॥ तार पाशे दधि, दुग्ध, माठा, शिखरिणी। पायस, मथनि, सर पाशे धरि' आनि'॥74॥ स्वयं पुरी-गोसाईंके द्वारा भोग-निवेदन :— हेनमते अन्नकूट करिल साजन। पुरी-गोसाञि गोपालेरे कैल समर्पण॥75॥ अनेक घट भरि' दिल सुवासित जल। बहुदिनेर क्षुधाय गोपाल खाइल सकल॥76॥ अनुवाद—दस ब्राह्मणोंने मिलकर चावल और पाँच ब्राह्मणोंने मिलकर सूखे और रसेवाले अनेक प्रकारके व्यञ्जनादि बनाये। कुछ ब्राह्मणोंने वनसे लाये गये शाक, मूल और फलोंके द्वारा अनेक प्रकारके व्यञ्जन बनाये, तो कोई ब्राह्मण दाल पीसकर बड़ा, कोई बड़ि और कोई कढ़ी आदि बनाने लगा। पाँच-सात लोगोंने मिलकर इतनी रोटियाँ बनायी कि रोटियोंका पहाड़ बन गया और सभी रोटियोंपर अच्छे प्रकारसे घी लगाया था। अन्न-व्यञ्जन आदि तो घीमें सराबोर हो रहे थे। एक नये वस्त्रको बिछाकर उसपर पलाशके पत्ते रखे गये। उनपर बीचमें पके हुए चावलका पर्वताकारमें ढेर लगाया गया और उसके चारों ओर रोटियोंका ढेर तथा दाल-सब्जी-व्यञ्जनोंके पात्र भरकर रखे गये। उनके साथ ही दही, दूध, मट्ठा, शिखरिणी, खीर, मक्खन और मलाई आदिके पात्रोंको भी रखा गया। इस प्रकार अन्नकूटको सजाकर श्रीपुरी गोसाईंने श्रीगोपालको अर्पण किया। श्रीपुरीने अनेक घड़ोंमें भरकर सुगन्धित शीतल जल अर्पण किया। अनेक दिनोंसे भूखे होनेके कारण श्रीगोपालने सब कुछ खा लिया॥69-76॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'माठा'—मट्ठा; 'शिखरिणी'—दही, दूध, चीनी, कर्पूर एवं काली मिर्च—ये पाँच वस्तुएँ मिलानेसे 'शिखरिणी' बनती है; 'मथनि'—मक्खन॥74॥ अनुभाष्य—यहाँपर भी ग्रन्थकार श्रील कविराज । 121

[ 4/69-86 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला गोस्वामी प्रभुका विविध प्रकारके पकवान बनानेका नैपुण्य प्रकाशित हो रहा है। 'अन्नकूट'—अन्नका पर्वत; 'कूट'—दुर्ग, गढ़, पर्वत ॥ 69-76 ॥ श्रीगोपालके द्वारा भोगके सभी नैवेद्य खा लिये जानेपर भी हाथोंके स्पर्शसे पुनः पूरण :- यद्यपि गोपाल सब अन्न-व्यञ्जन खाइल। ताँर हस्त-स्पर्शे पुनः तेमनि हइल ॥ 77 ॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीगोपालने सब अन्न-व्यञ्जन खा लिये, तथापि उनके हाथोंके स्पर्शसे पुनः सब कुछ पूर्ववत् हो गया ॥ 77 ॥ भगवद्-लीला भक्तोंके ही गोचर :- इहा अनुभव कैल माधव गोसाञि। ताँर ठाञि गोपालेर लुकान किछु नाइ ॥ 78 ॥ एकदिन-उद्योगे ऐछे महोत्सव कैल। गोपाल-प्रभावे हय, अन्ये ना जानिल ॥ 79 ॥ अनुवाद—श्रीगोपालकी इस भोजन लीलाका अनुभव केवल श्रीमाधवेन्द्र पुरीको ही हुआ, क्योंकि उनके जैसे भक्तोंसे भगवान्‌की कोई बात छिपी नहीं रह सकती। एक दिनके प्रयाससे इतना बड़ा महोत्सव केवल श्रीगोपालके प्रभावसे ही सम्भव हो सका, शुद्धभक्तके अतिरिक्त इसे और कोई भी नहीं जान सकता ॥ 78-79 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला, 3/86-89 संख्या देखें ॥ 78 ॥ श्रीगोपालकी आरती :- आचमन दिया दिल बिड़क-सञ्चय। आरति करिल, लोके करे जय जय ॥ 80 ॥ अनुवाद—तब श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपालको आचमन देकर उन्हें अनेक पानके बीड़े अर्पित किये। उसके बाद जब उन्होंने श्रीगोपालकी आरती की, तब सभी लोग श्रीगोपालकी जय-जयकार करने लगे ॥ 80 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'बिड़क'—पानका बीड़ा; 'सञ्चय'—संग्रह ॥ 80 ॥ ठाकुरके लिये शय्या तथा शयनकी व्यवस्था :- शय्या कराइल, नूतन खाट आनाञा। नववस्त्र आनि' तार उपरे पातिया ॥ 81 ॥ तृण-टाटि दिया चारिदिक् आवरिल। उपरेते एक टाटि दिया आच्छादिल ॥ 82 ॥ अनुवाद—आरती करनेके बाद श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपालके लिये एक नवीन खाट मँगवाकर उसपर नया वस्त्र बिछाकर उनको शयन कराया। फिर चटाईसे उस स्थानके चारों ओर घेरा बना दिया तथा ऊपर भी एक चटाई लगाकर उसको ढक दिया, इस प्रकार वहाँ एक अस्थाई मन्दिर बन गया ॥ 81-82 ॥ सभीके द्वारा अन्नकूट महाप्रसाद-सेवन :- पुरी-गोसाञि आज्ञा दिल सकल ब्राह्मणे। आ-बाल-वृद्ध ग्रामेर लोक कराह भोजने ॥ 83 ॥ सबे बसि' क्रमे क्रमे भोजन करिल। ब्राह्मण-ब्राह्मणीगणे आगे खाओयाइल ॥ 84 ॥ अनुवाद—श्रीपुरी गोसांईने सभी ब्राह्मणोंको बुलाकर आज्ञा दी कि बालकसे वृद्ध तक, गाँवके सभी लोगोंको भरपेट महाप्रसादका भोजन कराया जाय। सभीने बैठकर क्रमसे भोजन किया। सबसे पहले ब्राह्मण- ब्राह्मणियोंको भोजन कराया गया ॥ 83-84 ॥ दर्शन मात्रसे ही प्रसादका सम्मान :- अन्य ग्रामेर लोक यत देखिते आइल। गोपाल देखिया सेह प्रसाद पाइल ॥ 85 ॥ अनुवाद—अन्य गाँवोंसे दर्शनके लिये आये लोगोंने भी श्रीगोपालका दर्शनकर उस महाप्रसादको पाया ॥ 85 ॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके प्रभावको देखकर सभीको आश्चर्य तथा अन्नकूटके दर्शनसे नन्दोत्सवका स्मरण :- देखिया पुरीर प्रभाव लोके चमत्कार। पूर्व अन्नकूट येन हैल साक्षात्कार ॥ 86 ॥ 122 ।

चौथा अध्याय 4/86-90 ] अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीके प्रभावको देखकर सभी लोग चमत्कृत हो गये। सभीको ऐसा लगा, मानो वे द्वापर युगमें भगवान् श्रीकृष्णके कहनेपर व्रजवासियोंके द्वारा आयोजित किये गये अन्नकूट महोत्सवको ही साक्षात् देख रहे हैं॥86॥ अमृतप्रवाह भाष्य-द्वापर युगमें व्रजवासी सभी गोप इन्द्रकी पूजा करते थे। श्रीकृष्णने इन्द्रकी पूजाको छुड़वाकर गिरिगोवर्धनकी पूजा और उन्हें (गिरिराजको) अन्नकूट भोजन करानेकी व्यवस्था कर दी। उससे इन्द्रने क्रोधित होकर सात दिनतक वर्षा करके गोकुलको विनष्ट करनेकी चेष्टा की। श्रीकृष्णने गोवर्धन पर्वतको अपनी कनिष्ठ (सबसे छोटी) अंगुलीपर छतरीके रूपमें धारण करके गोकुलकी रक्षा की थी। उस गोवर्धन-पूजामें जैसा बड़ा अन्नकूट हुआ था, श्रीमाधवेन्द्रपुरीने भी उसी प्रकारसे अन्नकूट किया था॥86॥ अनुभाष्य—'पूर्व अन्नकूट'—श्रीकृष्णके परामर्श अनुसार गोपोंने द्वापरके अन्तमें इन्द्रपूजाको त्यागकर गो, ब्राह्मण और गोवर्धनगिरिकी पूजा की थी। श्रीकृष्णने और एक रूप धारण करके 'मैं ही पर्वत हूँ'-ऐसा कहकर उन्होंने गोवर्धनको निवेदित अनेकानेक नैवेद्योंका भक्षण किया था। (भाः 10/24/26, 31-33)— “पच्यन्तां विविधाः पाकाः सूपान्ताः पयसादयः। संयावापूपशष्कुल्यः सर्वदोहश्च गृह्यताम्॥26॥ प्रोक्तं निशम्य नन्दाद्याः साध्वगृह्णन्त तद्वचः॥31ख॥ तथा च व्यदधुः सर्वं यथाह मधुसूदनः॥ वाचयित्वा स्वस्त्ययनं तद्द्रव्येण गिरिद्विजान्॥32॥ उपहृत्य बलीन् सम्यगादृता यवसं गवाम्॥"33क॥ अर्थात् “श्रीकृष्णने नन्दबाबा आदि व्रजवासियोंसे कहा,—“खीरसे आरम्भ करके मूँगकी दालतक, हलवा, पुआ, पूरी, पापड़ आदि पकवान बनवाये जाँय और समस्त व्रजवासी गायोंका दोहन करके दूध, दही आदि यहाँ ले आयें।" भगवान् श्रीकृष्णके इन वचनोंको नन्दबाबा आदि गोपोंने बड़ी प्रसन्नतासे स्वीकार कर लिया। तब उन्होंने श्रीकृष्णके कहे अनुसार सभी अनुष्ठान किये। सर्वप्रथम ब्राह्मणोंके द्वारा स्वस्तिवाचन कराया गया। तत्पश्चात् इन्द्रके उद्देश्यसे निर्मित सामग्रियोंको गिरिराज गोवर्धनको अर्पित किया गया और ब्राह्मणोंकी पूजा करके उसी सामग्रीमेंसे उनको भेंटें दी गयीं। गायोंको बड़े आदरके साथ हरी-भरी घासका चारा दिया गया॥"86॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी कृपासे ब्राह्मणोंका वैष्णव होना :- सकल ब्राह्मणे पुरी वैष्णव करिल। सेइ सेइ सेवा-मध्ये सबा नियोजिल॥87॥ अनुवाद-श्रीमाधवेन्द्र पुरीने उपस्थित सभी ब्राह्मणोंको मन्त्र-दीक्षादिके द्वारा वैष्णव बना दिया और सबको यथायोग्य विभिन्न सेवाओंमें लगा दिया॥87॥ पुनः दिन-शेषे प्रभुर कराइल उत्थान। किछु भोग लागाइल कराइल जलपान॥88॥ अनुवाद-फिर दिन ढलनेके समय श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपालको शयनसे उठाया और कुछ भोग लगाकर जलपान करवाया॥88॥ सर्वत्र श्रीगोपालका प्राकट्य-प्रचार और अन्नकूट-भोग :- गोपाल प्रकट हैल,—देशे शब्द हैल। आश-पाश-ग्रामेर लोक देखिते आइल॥89॥ एकेक दिन एकेक ग्रामे लइल मागिञा। अन्नकूट करे सबे हरषित हञा॥90॥ अनुवाद-सारे देशमें यह बात फैल गयी कि गोवर्धनमें श्रीगोपाल प्रकट हुए हैं, तो आस-पासके गाँवोंके लोग उनके दर्शनोंके लिये आने लगे। सभी गाँववाले अन्नकूट-महोत्सव करना चाहते थे, इसलिये एक-एक गाँववालोंने श्रीमाधवेन्द्र पुरीसे एक-एक दिन माँग लिया। इस प्रकार बारी-बारी वे सभी आनन्दित होकर अन्नकूट-महोत्सव करने लगे॥89-90॥ । 123

[ 4/91-102 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला पुरी गोसाईंका रात्रि-आहार :- रात्रिकाले ठाकुरे कराइया शयन। पुरी-गोसाञि कैल किछु गव्य भोजन॥91॥ अनुवाद—रात्रिके समय श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपालको शयन दिया। उन्होंने सारा दिन कुछ भी नहीं खाया था। शयन देनेके बाद उन्होंने थोड़ासा दूध पान किया॥91॥ अनुभाष्य—'गव्य'—दूध॥91॥ अगले दिन प्रातःकालमें भी पहले दिनके जैसी सेवा :- प्रातःकाले पुनः तैछे करिल सेवन। अन्न लञा एक ग्रामेर आइल लोकगण॥92॥ अन्न, घृत, दधि, दुग्ध,—ग्रामे यत छिल। गोपालेर आगे लोक आनिया धरिल॥93॥ पूर्वदिन-प्राय ब्राह्मण करिल रन्धन। तैछे अन्नकूट गोपाल करिल भोजन॥94॥ अनुवाद—अगले दिन प्रातःकालमें पुनः श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपालकी पूर्व-दिनके जैसे सेवा की। तभी एक गाँवके लोग भोग-सामग्री लेकर आ गये। उनके गाँवमें जितना भी अन्न, घी, दही, दूध आदि था, वह सब लाकर उन्होंने श्रीगोपालके आगे रख दिया। पहले दिनकी भाँति आज भी ब्राह्मणोंने रसोई बनायी और वैसा ही अन्नकूट महोत्सव हुआ तथा आज भी श्रीगोपालने सब कुछ ग्रहण किया॥92-94॥ ब्रजवासियों और श्रीकृष्ण, दोनोंकी दोनोंके प्रति स्वाभाविक प्रीति :- व्रजवासी लोकेर कृष्णे सहज-प्रीति। गोपालेर सहजे प्रीति व्रजवासि-प्रति॥95॥ महाप्रसाद खाइल आसिया सब लोक। गोपाल देखिया सबार खण्डे दुःख-शोक॥96॥ प्रतिदिन अनेक उपहार और महोत्सव :- आश-पाश व्रजभूमेर यत लोक सब। एक एक दिन सबे करे महोत्सव॥97॥ अनुवाद—जिस प्रकार व्रजवासियोंकी श्रीकृष्णमें स्वाभाविक प्रीति है, उसी प्रकार श्रीगोपालकी भी व्रजवासियोंके प्रति स्वाभाविक प्रीति है। अन्नकूट महोत्सवमें जितने भी लोग आये थे, उन सबने अन्नकूट-महाप्रसादका सेवन किया तथा श्रीगोपालके दर्शनसे उन सबके दुःख-शोक दूर हो गये। व्रजभूमिमें आस-पासके जितने भी गाँव थे, उन सभी गाँवोंके लोग एक-एक दिन आकर अन्नकूट महोत्सव करने लगे॥95-97॥ गोपाल-प्रकट शुनि' नाना देश हैते। नाना द्रव्य लञा लोक लागिल आसिते॥98॥ मथुरार लोक सब बड़ बड़ धनी। भक्ति करि' नाना द्रव्य भेट देय आनि'॥99॥ स्वर्ण, रौप्य, वस्त्र, गन्ध, भक्ष्य-उपहार। असंख्य आइसे, नित्य बाड़िल भाण्डार॥100॥ अनुवाद—श्रीगोपालके प्राकट्यकी बात सुनकर अनेक प्रदेशोंसे लोग अनेक प्रकारके द्रव्य लाकर उनके दर्शनोंके लिये आने लगे। मथुराके सब बड़े-बड़े धनी व्यक्ति श्रद्धापूर्वक अनेक वस्तुएँ लाकर भेंट चढ़ाने लगे। इस प्रकार असंख्य मात्रामें स्वर्ण, चाँदी, वस्त्र, इत्र और अन्य खानेकी सामग्री आने लगी, जिससे श्रीगोपालका भण्डार प्रतिदिन बढ़ता ही गया॥98-100॥ गोपालके मन्दिरका निर्माण- एक महाधनी क्षत्रिय कराइल मन्दिर। केह पाक-भाण्डार कैल, केह त' प्राचीर॥101॥ एक एक व्रजवासी एक एक गाभी दिल। दशसहस्र गाभी गोपालेर हैल॥102॥ अनुवाद—तब किसी एक बहुत धनी क्षत्रियने श्रीगोपालके लिये मन्दिर बनवा दिया और किसी एकने रसोईघर बनवाया और बर्तन दिये तथा अन्य किसीने चार-दीवारी बनवा दी। एक-एक व्रजवासीने एक-एक 124

चौथा अध्याय 4/101-111 ] गाय दी और इस प्रकार श्रीगोपालकी दस हजार गायें हो गयीं ॥ 101-102 ॥ दो वैरागी ब्राह्मणोंपर कृपा और सेवा-समर्पण :- गौड़ हइते आइला दुइ वैरागी ब्राह्मण। पुरी-गोसाञि राखिल तारे करिया यतन ॥ 103 ॥ सेइ दुइ शिष्य करि' सेवा समर्पिल। राज-सेवा हय,-पुरीर आनन्द बाड़िल ॥ 104 ॥ अनुवाद-तभी बङ्गालसे दो वैरागी ब्राह्मण वहाँ आये। श्रीपुरी गोसांईको वे दोनों बहुत अच्छे लगे और उन्होंने उनके वहीं रहनेके लिये अच्छे स्थानकी व्यवस्था कर दी। श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उन्हें दीक्षा प्रदान करके अपने शिष्यके रूपमें स्वीकार किया और उन्हें श्रीगोपालकी सेवा समर्पित कर दी। इस प्रकार श्रीगोपालकी नित्य राजसेवा होने लगी, जिसे देखकर श्रीमाधवेन्द्रपुरीके आनन्दकी सीमा न रही ॥ 103-104 ॥ दो वर्षों तक श्रीमाधवेन्द्रपुरीके द्वारा श्रीगोपालकी सेवा :- एइमत বৎসর दुइ करिल सेवन। एकदिन पुरी-गोसाञि देखिल स्वपन ॥ 105 ॥ स्वप्नमें श्रीमाधवेन्द्रपुरीके समक्ष श्रीगोपालके द्वारा चन्दनकी इच्छा प्रकाशित :- गोपाल कहे,-"पुरी, आमार ताप नाहि याय। मलयज-चन्दन लेप', तबे से जुड़ाय ॥ 106 ॥ मलयज आन याञा नीलाचल हैते। अन्ये हैते নহে, तुमि चलह त्वरिते॥" 107 ॥ अनुवाद-इस प्रकार दो वर्षों तक श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपालकी सेवा की। तब एक दिन श्रीमाधवेन्द्रपुरीने एक स्वप्न देखा। स्वप्नमें श्रीगोपालने कहा,-"पुरी ! मेरे शरीरका ताप नहीं जा रहा है, मलयज चन्दनका लेप होनेसे ही वह ताप दूर होगा। नीलाचल जाकर वहाँसे मलयज चन्दन ले आओ। इस कार्यको कोई और नहीं कर सकता, इसलिये तुम शीघ्र ही चले जाओ॥" 105-107 ॥ अनुभाष्य- 'मलयज' - मलय देशमें उत्पन्न; इसको 'चन्दनगिरि' कहते हैं। मलयदेश अथवा मालावार देश 'पश्चिमघाट' - नामक गिरिपुञ्जके दक्षिण भागमें है। 'नीलगिरि'को कोई-कोई मलय पर्वत कहते हैं। मलयज शब्दका अर्थ चन्दन भी होता है॥ 106 ॥ स्वप्न देखि' पुरी-गोसाञि हैल प्रेमावेश। प्रभु-आज्ञा पालिबारे गेला पूर्वदेश ॥ 108 ॥ श्रीजगन्नाथपुरीके मार्गमें पुरीपादका गौड़देशमें आगमन :- सेवाय नियुक्त लोक करिल स्थापन। आज्ञा मागि' गौड़-देशे करिल गमन ॥ 109 ॥ अनुवाद-स्वप्न देखकर श्रीमाधवेन्द्रपुरी प्रेमाविष्ट हो गये और श्रीगोपालकी आज्ञा पालन करनेके लिये पूर्व-भारतमें नीलाचलकी ओर चलनेके लिये तैयार हुए। उन्होंने श्रीगोपालकी सुचारुरूपसे सेवाके लिये लोगोंको नियुक्त किया और फिर श्रीगोपालसे आज्ञा लेकर गौड़देशके लिये चल दिये ॥ 108-109 ॥ शान्तिपुरमें श्रीअद्वैतके घरपर आगमन और उनको दीक्षा प्रदान :- शान्तिपुर आइला अद्वैताचार्येर घरे। पुरीर प्रेम देखि' आचार्य आनन्द अन्तरे ॥ 110 ॥ ताँर ठाञि मन्त्र लैल यत्न करिया। चलिला दक्षिणे पुरी ताँरे दीक्षा दिञा ॥ 111 ॥ अनुवाद-श्रीमाधवेन्द्रपुरी जब शान्तिपुर पहुँचे, तब वे श्रीअद्वैताचार्यके घरमें रहे। श्रीमाधवेन्द्रपुरीके श्रीकृष्णप्रेमको देखकर श्रीअद्वैताचार्यके हृदयमें बहुत आनन्द हुआ। उन्होंने श्रीमाधवेन्द्रपुरीसे प्रार्थना करके दीक्षामन्त्र ग्रहण किया। उनको दीक्षा प्रदान करके श्रीमाधवेन्द्रपुरी दक्षिण दिशामें नीलाचलकी ओर चल दिये॥ 110-111 ॥ अनुभाष्य-श्रीअद्वैताचार्यने श्रीमाध्वसम्प्रदायके गुरु संन्यासीवर श्रीमाधवेन्द्रपुरीसे दीक्षा मन्त्र ग्रहण किया था। श्रीमहाप्रभुने भी श्रीमाधवेन्द्र पुरीके अभिप्रायके अनुसार । 125

[ 4/111-114 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला “किवा विप्र, किवा न्यासी,, शूद्र केने नय। येइ कृष्णतत्त्ववेत्ता सेई गुरु हय॥”—उपदेश दिया है। पञ्चरात्रके मतानुसार, —गृहस्थ ब्राह्मणके अतिरिक्त दीक्षा देनेका अधिकार और किसीको नहीं है, क्योंकि दीक्षित व्यक्ति दीक्षा प्राप्त करके दैक्ष-ब्राह्मणता [दीक्षाके प्रभावसे ब्राह्मणके पदको] प्राप्त करता है। जो ब्राह्मण नहीं है, उसमें दूसरेमें ब्राह्मणता सञ्चार करनेकी क्षमता नहीं होती। इसलिये दीक्षा देनेवालेमें ब्राह्मणत्व होनेका विशेष गुण स्वतः ही अनिवार्य है। वैष्णवाचार्यमें ब्राह्मणत्व स्वतः ही ग्रथित है। वर्णाश्रममें स्थित गृहस्थ ब्राह्मण शास्त्र विहित उपायसे अपने द्वारा अर्जित धनके द्वारा अनेक प्रकारकी सेवायोग्य वस्तुओंको संग्रह करके मन्त्रोंके द्वारा भगवद्-अर्चन करनेमें समर्थ होते हैं। भौतिक संसारमें फंसे लोग वैसे अभिज्ञ गृहस्थ-ब्राह्मण गुरुसे यह जानकर कि भगवद्-सेवा ही वर्णाश्रमका एकमात्र लक्ष्य है, अपनी गृहवासनासे मुक्त होनेके लिये उनसे मन्त्र-दीक्षाकी प्रार्थना करते हैं। इसलिये गृहस्थ- ब्राह्मण गुरुको वास्तविक वैष्णव होना आवश्यक है। यद्यपि संन्यासी गुरुके पास अर्चा-विग्रहके अर्चनमें वैसी सुविधाएँ नहीं होतीं, तथापि कोई पारमार्थिक संन्यासी गुरुका आश्रय ग्रहण करता है, तो अर्चन विधि उपेक्षित जैसी प्रतीत होनेपर भी वास्तवमें उपेक्षित नहीं होती। गुरुके विषयमें जिस ब्राह्मणताकी योग्यताको लक्ष्य किया गया है, वह शौक्र-विप्रत्व (जन्मके द्वारा ब्राह्मण) अथवा शौक्र शूद्रत्व (जन्मके द्वारा शूद्र) का भेद नहीं है। वास्तवमें सावित्र (जनेऊ संस्कारसे) और दीक्षाके द्वारा ब्राह्मणता ही उसका उद्देश्य है। जन साधारणकी शौक्र-जन्ममें ही एकमात्र जाति-विषयक अशुद्ध धारणाको दृढ़ जानकर श्रीमन्महाप्रभुने जीवके हृदयकी और समाजकी दुर्बलताको लक्ष्य करके ही “किवा विप्र” पद्यमें ऐसा कहा। इस पद्यके द्वारा उन्होंने शास्त्रीय तात्पर्यको समझा दिया; क्योंकि कृष्णतत्त्ववेत्ता ही सावित्र अथवा दैक्ष-ब्राह्मण हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं है। “दिव्यं ज्ञानं यतो दद्यात् कुर्यात् पापस्य संक्षयम्। तस्माद्दीक्षेति सा प्रोक्ता देशिकैस्तत्त्वकोविदैः॥” अर्थात् “क्योंकि यह दिव्यज्ञान (सम्बन्धज्ञान) प्रदान करता है और पापका (पाप, पापबीज और अविद्या) जड़ सहित विनाश करता है, इसलिये भगवत्तत्त्वविद् पण्डितगण इस अनुष्ठानको 'दीक्षा'के नामसे पुकारते हैं॥” 'गृहस्थ-गुरु' शब्दका अर्थ जिस प्रकार गृहव्रतधारी इन्द्रियोंका दास नहीं होता, उसी प्रकार 'वैष्णव-संन्यासी' कहनेसे वर्णाश्रमाभिमान परायण व्यक्तिको नहीं समझना चाहिये॥111॥ रेमुणामें श्रीगोपीनाथका दर्शन और नृत्य-गीत :- रेमुणाते कैल गोपीनाथ-दरशन। ताँर रूप देखिञा हैल विह्वल-मन॥112॥ अनुवाद—मार्गममें रेमुणामें उन्होंने श्रीगोपीनाथके दर्शन किये। उनके मनोहर रूपको देखकर श्रीपुरी गोसाईंका मन विह्वल हो गया॥112॥ भोगकी परिपाटीको सुननेसे सुख :- 'नृत्यगीत करि' जगमोहने बसिला। 'क्या क्या भोग लागे?' वैरागी ब्राह्मणे पुछिला॥113॥ सेवार सौष्ठव देखि' आनन्दित मने। 'उत्तम भोग लागे'-इहा कैलुँ अनुमाने॥114॥ अनुवाद—फिर श्रीमाधवेन्द्रपुरी नृत्य-गीत करके बरामदेमें बैठ गये। श्रीगोपीनाथकी सेवाके सौन्दर्यको देखकर श्रीमाधवेन्द्रपुरी बहुत आनन्दित हुए और उन्होंने मनमें अनुमान लगाया कि अवश्य ही गोपीनाथजीको उत्तम भोग लगाये जाते होंगे। इसलिये उन्होंने एक वैरागी ब्राह्मणसे पूछा, —'श्रीगोपीनाथको क्या-क्या भोग लगता है?'॥113-114॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'जगमोहन'—मन्दिरके सामने बने जिस बरामदेसे भगवान्‌के दर्शन होते हैं, वह 'जगमोहन' कहलाता है। 'वैरागी ब्राह्मण'—जो ब्राह्मण संसारसे विरक्त होकर उसकी कोई आशा नहीं रखते, परन्तु उन्होंने अपने 126 ।

चौथा अध्याय 4/113-125 ] आश्रमका त्याग नहीं किया है, वे ही 'वैरागी ब्राह्मण' हैं। 'क्या क्या' - पाठान्तरमें 'काँहा काँहा'; इसका अर्थ है-क्या क्या भोग लगता है॥ 113 ॥ श्रीगोपालको वैसा भोग देनेकी इच्छासे पुजारीसे पूछना और पुजारीके द्वारा गोपीनाथके खीरभोगकी प्रशंसा :- 'येमन इहा भोग लागे, सकल शुनिब। तेमन अनुमाने भोग गोपाले लागाइब ॥ '115 ॥ एइ लागि' पुछिलेन ब्राह्मणेर स्थाने। ब्राह्मण कहिल सब भोग-विवरणे ॥ 116 ॥ अनुवाद- 'यहाँ जिस प्रकारके भोग लगाये जाते हैं, -उन सबके विषयमें सुनकर उसीके अनुसार अनुमानसे अपने श्रीगोपालको भोग लगाऊँगा'-इसी उद्देश्यसे श्रीमाधवेन्द्रपुरीने ब्राह्मणसे प्रश्न किया। तब ब्राह्मणने जो-जो भोग लगता है, उसका सारा विवरण उन्हें बतलाया ॥ 115-116 ॥ “सन्ध्याय भोग लागे क्षीर- 'अमृतकेलि' -नाम। द्वादश मृत्पात्रे भरि' अमृत-समान ॥ 117 ॥ 'गोपीनाथेर क्षीर' बलि' प्रसिद्ध नाम यार। पृथिवीते ऐछे भोग काँहा नाहि आर ॥ "118 ॥ अनुवाद-ब्राह्मणने भोगकी एक विशेषता बतलाते हुए कहा, - “संध्यामें श्रीगोपीनाथको बारह मिट्टीके कुल्हड़ोंमें 'अमृतकेलि' नामके खीरका भोग लगता है और यह अमृतके समान स्वादिष्ट है। यह 'श्रीगोपीनाथकी खीर' के नामसे सारे जगत्में प्रसिद्ध है। ऐसा भोग पृथ्वीमें और कहीं भी नहीं लगाया जाता ॥ "117-118 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'क्षीर' - खीर ॥ 117 ॥ श्रीगोपीनाथके खीरभोगके अनुरूप श्रीगोपालको खीर देनेकी इच्छा :- हेनकाले सेइ भोग ठाकुरे लागिल। शुनि' पुरी-गोसाञि किछु मने विचारिल ॥ 119 ॥ 'अयाचित क्षीर-प्रसाद अल्प यदि पाइ। स्वाद जानि' तैछे क्षीर गोपाले लागाइ ॥ '120 ॥ अनुवाद-उसी समय श्रीमाधवेन्द्रपुरीने सुना कि श्रीगोपीनाथको उसी अमृतकेलि खीरका भोग लगाया जा रहा है। तब वे मनमें विचार करने लगे,-'बिना माँगे यदि थोड़ा-सा वह खीर-प्रसाद मुझे मिल जाय, तो उसका स्वाद जानकर मैं भी वैसा ही खीरका भोग श्रीगोपालको लगाऊँगा ॥ '119-120 ॥ अनुभाष्य - 'अयाचित' - बिना माँगे ॥ 120 ॥ उसे जिह्वाका लोभ समझकर पुरी गोस्वामीका लज्जित होना और आरती-दर्शनके बाद उस स्थानका त्याग :- एइ इच्छाय लज्जा पाञा विष्णुस्मरण कैल। हेनकाले भोग सरि' आरति बाजिल ॥ 121 ॥ आरति देखिया पुरी कैल नमस्कार। बाहर हैला, कारे किछु ना कहिल आर ॥ 122 ॥ अनुवाद-ऐसी इच्छाको अपनी जिह्वाका लोभ समझकर श्रीमाधवेन्द्रपुरी लज्जित होकर भगवान् विष्णुका स्मरण करने लगे जिससे उनका मन खीरकी ओर न जाय। उसी समय भोग समाप्त हुआ तथा आरतीके लिये घण्टा बजने लगा। आरतीका दर्शन करके श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपीनाथको प्रणाम किया। खीरके विषयमें किसीसे कुछ कहे बिना वे मन्दिरसे बाहर आ गये ॥ 121-122 ॥ अनुभाष्य- 'सरि' '- सम्पादित होकर ॥ 121 ॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीका आचरण :- अयाचित-वृत्ति पुरी-विरक्त, उदास। अयाचित पाइले खां'न, नहे उपवास ॥ 123 ॥ प्रेमामृते तृप्ति, नाहि क्षुधा-तृष्णा बाधे। क्षीर-इच्छा हैल, ताहे माने अपराधे ॥ 124 ॥ ग्रामेर शून्य हट्टे बसि' करेन कीर्त्तन। एथा पूजारी कराइल ठाकुरे शयन ॥ 125 ॥ । 127

[ 4/123-134 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद - श्रीमाधवेन्द्रपुरी किसीसे कुछ नहीं माँगते थे। यदि अपने आप कोई कुछ खानेके लिये दे देता, तो उसीको खाते थे, नहीं तो उपवास करते थे। वे प्रेमामृतके पानमें ही तृप्त रहते थे, उन्हें कभी भी भूख-प्यास नहीं सताती थी। इसलिये जब उन्हें खीरको चखनेकी इच्छा हुई, तो उसे वे अपराध मानने लगे। वे मन्दिरसे बाहर आकर गाँवके एक निर्जन हाटमें बैठकर कीर्तन करने लगे। इधर पुजारीने श्रीगोपीनाथको शयन करा दिया ॥ 123-125॥ अनुभाष्य - श्रीमाधवेन्द्रपुरी प्रभुकी स्वाभाविकी परमहंसकी अवस्था थी, - उनकी श्रीकृष्णनाममें प्रीति थी और वे जड़ीय वस्तुओंके प्रति उदासीन थे। 'नाहि क्षुधा-तृष्णा बाधे'-वे भूख और प्याससे अतीत, विजित-षड्गुण अर्थात् जितेन्द्रिय थे॥ 123-124 ॥ पुजारीको स्वप्नमें श्रीगोपीनाथका आदेश :- निज-कृत्य करि' पूजारी करिल शयन। स्वप्नकाले ठाकुर आसि' बलिला वचन ॥ 126 ॥ “उठह पूजारी, कर द्वार विमोचन। क्षीर एक राखियाछि संन्यासि-कारण ॥ 127 ॥ धड़ार अञ्चले ढाका क्षीर एक हय। तोमरा ना जानिला ताहा, आमार मायाय ॥ 128 ॥ माधवपुरी संन्यासी आछे हाटेते बसिञा। ताहाके त' एइ क्षीर शीघ्र देह लञा ॥ " 129 ॥ अनुवाद - अपने सेवाकार्यको समाप्तकर पुजारी सो गया। अर्द्धरात्रिमें उसके स्वप्नमें आकर श्रीगोपीनाथ कहने लगे, - "पुजारी उठो! मन्दिरका द्वार खोलो। मैंने एक संन्यासीके लिये खीरका एक कुल्हड़ रखा है। उसे मैंने अपने वस्त्रकी ओटमें छिपा रखा है। मेरी मायाके कारण तुम्हें उसका पता नहीं चला। माधवेन्द्रपुरी नामक वह संन्यासी बाजारमें बैठा हुआ है, तुम यह खीर ले जाकर शीघ्र ही उसे दे आओ॥ "126-129 ॥ अनुभाष्य - 'कारण' - निमित्त। 'धड़ा' - वस्त्र । 'एक' - खीरसे भरा हुआ एक पात्र ॥ 127-128 ॥ पुजारीकी निद्रा-भङ्ग और श्रीगोपीनाथके द्वारा चोरी की गयी खीरकी प्राप्ति :- स्वप्न देखि' पूजारी उठि' करिला विचार। स्नान करि' कपाट खुलि' मुक्त कैल द्वार ॥ 130 ॥ धड़ार आँचलतले पाइल सेइ क्षीर। स्थान लेपि' क्षीर लञा हइल बाहिर ॥ 131 ॥ अनुवाद - स्वप्न देखकर पुजारीने उठकर श्रीगोपीनाथके आदेशपर विचार किया। तब उसने स्नान करके मन्दिरका द्वार खोला। पुजारीको श्रीगोपीनाथके वस्त्रके नीचे एक खीरका कुल्हड़ मिला। उस खीरके कुल्हड़को उठाकर उसने स्थानको लेपकर साफ कर दिया और वह खीर लेकर बाहर आ गया ॥ 130-131 ॥ खीरको हाथमें लेकर पुजारीके द्वारा श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी खोज :- द्वार दिया ग्रामे गेला सेइ क्षीर लञा। हाटे हाटे बुले माधवपुरीके चाहिञा ॥ 132 ॥ “क्षीर लह एइ, यार नाम 'माधवपुरी' । तोमा लागि' गोपीनाथ क्षीर कैल चुरि ॥ 133 ॥ क्षीर लञा सुखे तुमि करह भक्षणे। तोमा-सम भाग्यवान् नाहि त्रिभुवने ॥ " 134 ॥ अनुवाद - मन्दिरका द्वार बन्द करके पुजारी उस खीरको लेकर गाँवमें गया और हाट-हाटमें घूमते हुए श्रीमाधवेन्द्रपुरीको खोजते हुए पुकारने लगा, - " जिनका नाम 'माधवपुरी' है, वे कृपा करके इस खीरको ग्रहण करें। आपके लिये श्रीगोपीनाथने यह खीर चोरी की है। आप इस खीरको लेकर आनन्दसे खाओ। आपके समान भाग्यवान् तीनों लोकोंमें और कोई नहीं है॥" 132-134 ॥ अनुभाष्य - 'बुले'- घूमना-फिरना ॥ 132 ॥ 128

चौथा अध्याय 4/135-144 ] एत शुनि' पुरी-गोसाञि परिचय दिल। क्षीर दिया पूजारी ताँरे दण्डवत् कैल॥ 135॥ अनुवाद—पुजारीकी पुकारको सुनकर श्रीपुरी गोसांईने उसको अपना परिचय दिया। पुजारीने उन्हें खीरका पात्र देकर दण्डवत् प्रणाम किया॥ 135॥ अनुभाष्य—'दण्डवत्'—दण्डकी भाँति प्रणत् अर्थात् चरणोंमें गिरकर॥ 135॥ पुजारीके मुखसे श्रीगोपीनाथकी चोरीकी बातको सुनकर श्रीमाधवेन्द्रपुरीका प्रेम :- क्षीरेर वृत्तान्त ताँरे कहिल पूजारी। शुनि' प्रेमाविष्ट हैला श्रीमाधवपुरी॥ 136॥ पुजारीके द्वारा श्रीमाधवेन्द्रपुरीको श्रीकृष्णको वशीभूत करनेवाले भक्तके रूपमें अनुमान :- प्रेम देखि' सेवक कहे हइया विस्मित। 'कृष्ण से इँहार वश,—हय यथोचित॥' 137॥ अनुवाद—पुजारीने जब उन्हें खीरकी चोरीका पूरा वृत्तान्त सुनाया, तब उसे सुनकर श्रीमाधवेन्द्रपुरी प्रेममें आविष्ट हो गये। उनके श्रीकृष्णप्रेमको देखकर पुजारी आश्चर्यचकित हो गया। वह मनमें सोचने लगा,—'यह उपयुक्त ही है कि श्रीगोपीनाथ इनके वशीभूत हैं'॥136-137॥ अनुभाष्य—'यथोचित'—उपयुक्त अथवा योग्य॥ 137॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके द्वारा खीर-प्रसादका सम्मान करना आत्मेन्द्रिय-तर्पण नहीं :- एत बलि' नमस्करि' करिला गमन। आवेशे करिला पुरी से क्षीर भक्षण॥ 138॥ पात्र प्रक्षालन करि' खण्ड खण्ड कैल। बहिर्वासे बान्धि' सेइ ठिकारि राखिल॥ 139॥ प्रतिदिन एकखानि करेन भक्षण। खाइले प्रेमावेश हय,—अद्भुत-कथन॥ 140॥ अनुवाद—यह कहकर पुजारी उनको प्रणाम करके अपने घर लौट गया। श्रीमाधवेन्द्रपुरीने प्रेमाविष्ट होकर उस खीर-प्रसादका सेवन किया। खीर खानेके बाद उन्होंने उस खीर प्रसादके कुल्हड़को धोकर उसके छोटे-छोटे टुकड़े कर लिये। उन्होंने उन ठीकरोंको अपने बहिर्वासमें बाँधकर रख लिया। वहाँसे नीलाचल जाते हुए श्रीमाधवेन्द्रपुरी प्रतिदिन एक ठीकरेको खाते और उसे खानेके साथ-ही-साथ प्रेममें आविष्ट हो जाते,—यह कथा बहुत ही अद्भुत है॥138-140॥ अनुभाष्य—'ठिकारि'—बर्तनका टूटा हुआ टुकड़ा॥ 139॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीको प्रतिष्ठाका भय और पुरीधाम यात्रा :- 'ठाकुर आमाके क्षीर दिल'—लोक सब शुनि'। दिने लोक-भिड़ हबे मोर प्रतिष्ठा जानि'॥ 141॥ सेइ भये रात्रि शेषे चलिला श्रीपुरी। सेइखाने गोपीनाथे दण्डवत् करि'॥ 142॥ अनुवाद—'गोपीनाथजीने चोरी करके मुझे खीर दीं',—प्रातःकाल जब लोग ऐसा सुनेंगे, तो लोगोंकी भीड़ मेरे पास आयेगी और मुझे बड़ा भक्त मानकर बहुत सम्मान देंगे। इस प्रतिष्ठाके भयसे श्रीमाधवेन्द्रपुरी प्रातःकाल होनेसे पहले ही श्रीगोपीनाथको वहींसे दण्डवत् प्रणाम करके नीलाचलकी ओर चल दिये॥ 141-142॥ पुरी धाममें श्रीजगन्नाथके दर्शनसे प्रेममें विह्वल :- चलि' चलि' आइला पुरी श्रीनीलाचल। जगन्नाथ देखि' हैला प्रेमेते विह्वल॥ 143॥ प्रेमावेशे उठे, पड़े, हासे, नाचे, गाय। जगन्नाथ-दरशने महासुख पाय॥ 144॥ अनुवाद—वहाँसे चलते-चलते श्रीमाधवेन्द्रपुरी श्रीनीलाचलमें आ पहुँचे और श्रीजगन्नाथके दर्शनकर प्रेममें विह्वल हो गये। श्रीजगन्नाथजीके दर्शनसे उन्होंने महासुख प्राप्त किया, इसलिये प्रेमके आवेशमें वे कभी उठते और कभी गिर पड़ते। कभी वे हँसने लगते, तो कभी नाचने और कभी गाने लगते॥ 143-144॥ 129

[ 4/145-151 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला प्रतिष्ठाकी चाह न होनेपर भी श्रीमाधवेन्द्रपुरीको प्रतिष्ठाकी प्राप्ति :- 'माधवपुरी श्रीपाद आइल', - लोके हैल ख्याति। सब लोक आसि' ताँरे करे बहु भक्ति ॥ 145 ॥ अनुवाद - 'श्रीपाद माधवेन्द्रपुरी आये हैं'- श्रीजगन्नाथ पुरीमें यह बात विख्यात हो गयी। उनकी महिमाके विषयमें वे सुन चुके थे, इसलिये सब लोग आकर भक्तिपूर्वक उनका बहुत अधिक आदर-सम्मान करने लगे॥ 145 ॥ प्रतिष्ठार स्वभाव एइ जगते विदित। ये ना वाञ्छे, तार हय विधाता-निर्मित ॥ 146 ॥ प्रतिष्ठार भये पुरी रहे पलाञा। कृष्ण-प्रेमे प्रतिष्ठा चले सङ्गे गड़ाञा ॥ 147 ॥ अनुवाद- प्रतिष्ठाका यह स्वभाव जगत्में सब जानते हैं कि जो इसे नहीं चाहता, विधाताके द्वारा उसे ही प्रतिष्ठा मिलती है। श्रीमाधवेन्द्रपुरी प्रतिष्ठाके भयसे रेमुणासे भागकर आये थे, परन्तु श्रीकृष्णसे प्रेम होनेपर प्रतिष्ठा भक्तके साथ-साथ ही चलती है ॥ 146-147 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - जो प्रतिष्ठाकी इच्छा न रखकर सत्कार्य करते हैं, उनके लिये ही विधाताने प्रतिष्ठाका निर्माण किया है; अर्थात् जो प्रतिष्ठाकी आशासे सत्कर्म करते हैं, उनको प्रतिष्ठाकी प्राप्ति नहीं होती - यही प्रतिष्ठाका रहस्य है ॥ 146 ॥ अनुभाष्य - बद्धजीवोंमेंसे बहुतसे जीव ईर्ष्यालु होते हैं। जिनकी बहुत ख्याति होती है, उनके विरुद्ध आचरण करनेकी ईर्ष्यालु व्यक्तियोंमें स्वाभाविक रूपसे प्रवृत्ति होती है। इसलिये प्रतिष्ठाकामी व्यक्तिको ईर्ष्यालु व्यक्तियोंसे प्रतिष्ठाके बदले ईर्ष्या मिलना स्वाभाविक ही है। यद्यपि जो दीनतावश प्रतिष्ठाकी आकाङ्क्षा नहीं करते, उन्हें ईर्ष्यालु लोग बिल्कुल असमर्थ और दीन समझकर दया करके प्रतिष्ठा देकर उत्साह प्रदान करते हैं, तथापि वैष्णव लोग इस संसारमें वैसी प्रतिष्ठाके भिक्षुक नहीं है। बादमें लौकिक प्रतिष्ठा मिलेगी, इसलिये वैष्णवराज श्रीमाधवेन्द्रपुरीने लोगोंकी दृष्टिसे अपने भगवद्-प्रिय होनेकी घटनाको छिपानेका प्रयत्न किया था। किन्तु उनकी अन्यान्य श्रीकृष्णप्रेममयी चेष्टाओंको देखकर जगत्के सभी लोगोंने उनको श्रीभगवान्की अपने भक्तके निमित्त उत्कण्ठा और चेष्टाका प्रमाण माना। वास्तविक रूपमें श्रीमाधवेन्द्र पुरीको सर्वश्रेष्ठ प्रतिष्ठा ही स्वाभाविक रूपसे प्राप्त होने योग्य है। किन्तु जो लोग प्रतिष्ठा पानेके लिये उनका अनुकरण करके अपने हृदयमें छिपे हुए कपट दैन्यका सहारा लेकर अपने आपको प्रतिष्ठाकी लालसा-रहित कहकर छल करते हैं, उनके लिये वैष्णवोचित दैन्यतामें प्रतिष्ठित होना असम्भव है ॥ 146-147 ॥ अनिच्छा होनेपर भी प्रतिष्ठाके स्थानपर प्रभुकी सेवा हेतु अवस्थान :- यद्यपि उद्वेग हैल पलाइते मन। ठाकुरेर चन्दन-साधन हइल बन्धन ॥ 148 ॥ अनुवाद - अनुभाष्य देखें ॥ 148 ॥ अनुभाष्य - यद्यपि श्रीमाधवेन्द्रपुरी प्रतिष्ठाके चङ्गलसे मुक्त होनेके उद्देश्यसे पुरीसे भाग निकलनेके उपायका विचार करने लगे, तथापि श्रीगोपालके लिये चन्दन-संग्रहरूपी सेवाने उनको बाँधकर प्रतिष्ठासे भरे नीलाचलमें रहनेके लिये बाध्य किया ॥ 148 ॥ श्रीजगन्नाथके सेवकोंको गोपालकी इच्छा व्यक्त करना :- जगन्नाथेर सेवक यत, यतेक महान्त। सबाके कहिल सब गोपाल-वृत्तान्त ॥ 149 ॥ भक्तोंका अनेक प्रकारसे चन्दन संग्रह करनेका यत्न :- गोपाल चन्दन मागे, - शुनि' भक्तगण। आनन्दे चन्दन लागि' करिल यतन ॥ 150 ॥ राजपात्र-सने यार यार परिचय। तारे मागि' कर्पूर-चन्दन करिला सञ्चय ॥ 151 ॥ 130 ।

लोगों सहित चन्दन देकर श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी विदायी :- एक विप्र, एक सेवक, चन्दन वहिते। पुरी-गोसाञिर सङ्गे दिल सम्बल-सहिते ॥ 152 ॥

**अनुवाद—**श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीजगन्नाथदेवके सभी सेवकों और महन्तोंको श्रीगोपालका (प्रकट होने और चन्दन मँगवानेका) सब वृत्तान्त कह सुनाया। 'श्रीगोपालने चन्दन मँगवाया है'—यह सुनकर श्रीजगन्नाथदेवके सभी भक्त आनन्दपूर्वक चन्दन संग्रह करनेका प्रयास करने लगे। राज-कर्मचारियोंके साथ जिन-जिनका परिचय था, उन्होंने उनसे माँगकर कर्पूर-चन्दन इकट्ठा किया। उन्होंने एकत्रित चन्दन-कर्पूर श्रीमाधवेन्द्रपुरीको दिया और उसे उठाकर ले जानेके लिये साथमें एक ब्राह्मण और एक सेवकको दिया। मार्गमें सबके व्ययके लिये उन्होंने कुछ धन भी भेंट दिया ॥ 149-152 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'कर्पूर'—श्रीकर्पूर, जिससे श्रीजगन्नाथदेवकी आरती होती है। श्रीजगन्नाथके सेवकोंने राजकर्मचारियोंसे उस श्रीकर्पूर और मलयज चन्दनको संग्रह करके पुरी गोसाईंके साथ एक ब्राह्मण और एक सेवकको भेजा और सबके लिये रास्तेका खर्चा भी दिया ॥ 152 ॥

अनुभाष्य—'सम्बल'—मार्गमें होने वाला खर्चा ॥ 152 ॥

**अमृतानुकणिका—**उस समय श्रीकर्पूर श्रीजगन्नाथकी आरती और चन्दन उनके श्रीअङ्गोंमें लेपन करनेके लिये प्रयोग किये जाते थे। ये दोनों वस्तुएँ राजाके अधिकारमें होती थीं और सर्व-साधारणको उपलब्ध नहीं थीं। इसलिये सब भक्त और श्रीजगन्नाथके सेवक राजकर्मचारियोंसे मिले और उन्हें सब बात बतलायी कि ये दोनों वस्तुएँ श्रीगोपालकी सेवाके लिये चाहिये। इस प्रकार उन्होंने श्रीकर्पूर और चन्दनको नीलाचलसे बाहर ले जानेकी अनुमति प्राप्त की ॥ 150-152 ॥

विघ्नरहित जानेके लिये अनुमति-पत्र देना :- घाटी-दानी छाड़ाइते राजपात्र-द्वारे। राजलेखा करि' दिल पुरी-गोसाञिर करे ॥ 153 ॥

**अनुवाद—**मार्गमें घाटी-दानी उनसे कर न माँगे, इस उद्देश्यसे राजकर्मचारियोंने राजाका अनुमति-पत्र भी श्रीमाधवेन्द्रपुरीके हाथमें दिया ॥ 153 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'घाटी'—जो पथका शुल्क (कर) लेता है। 'दानी'—जो पार करानेका पैसा लेता है। उन सभीको छुड़ानेके लिये अर्थात् उनको पैसा दिये बिना ही जानेके लिये राजकर्मचारियोंके द्वारा लिखे गये राजपत्रको अर्थात् फरमानको पुरी गोसाईंके हाथमें दे दिया ॥ 153 ॥

रेमुणामें पहुँचना और गोपीनाथके दर्शनसे नृत्य-गीत :- चलिल माधवपुरी चन्दन लञा। कतदिने रेमुणाते उत्तरिल गिया ॥ 154 ॥ गोपीनाथ-चरणे कैल बहु नमस्कार। प्रेमावेशे नृत्य-गीत करिला अपार ॥ 155 ॥ पुरी देखि' सेवक सब सम्मान करिल। क्षीरप्रसाद दिया ताँरे भिक्षा कराइल ॥ 156 ॥

**अनुवाद—**चन्दन लेकर श्रीमाधवेन्द्रपुरीने नीलाचलसे गोवर्धनकी ओर प्रस्थान किया। कुछ दिन बाद वे रेमुणा पहुँचे। वहाँ श्रीगोपीनाथके श्रीचरणोंमें उन्होंने अनेक बार प्रणाम किया और प्रेममें आविष्ट होकर उन्होंने बहुत देर तक नृत्य-गान किया। उन्हें देखकर श्रीगोपीनाथके सभी सेवकोंने उनका बहुत सम्मान किया तथा श्रीगोपीनाथजीका खीर प्रसाद देकर उन्हें भोजन कराया ॥ 154-156 ॥

स्वप्नमें श्रीमाधवेन्द्रपुरीको श्रीगोपालके द्वारा श्रीगोपीनाथके श्रीअङ्गमें चन्दन लेपन करनेका आदेश :- सेइ रात्रे देवालये करिल शयन। शेषरात्रि हैले पुरी देखिल स्वपन ॥ 157 ॥ गोपाल आसिया कहे,—"शुनह, माधव। कर्पूर-चन्दन आमि पाइलाम सब ॥ 158 ॥

[ 4/157-167 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला कर्पूर-सहित घषि' एसब चन्दन। गोपीनाथेर अङ्गे सब करह लेपन॥159॥ गोपीनाथ आमार से एकइ अङ्ग हय। इँहाके चन्दन दिले, आमार ताप-क्षय॥160॥ द्विधा ना भाविह, ना करिह किछु मने। विश्वास करि' चन्दन देह आमार वचने॥"161॥ प्रभुर आज्ञा हैल,–"एइ कर्पूर-चन्दन। गोपीनाथेर अङ्गे नित्य करह लेपन॥163॥ इँहाके चन्दन दिले, गोपाल हइबेन शीतल। स्वतन्त्र ईश्वर,-ताँर आज्ञा से प्रबल॥164॥ ग्रीष्मकाले गोपीनाथ परिबे चन्दन।" शुनि' आनन्दित हैल सेवकेर मन॥165॥ अनुवाद-उस रात श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपीनाथजीके मन्दिरमें ही शयन किया और रातके अन्तमें उन्होंने एक स्वप्न देखा। श्रीगोपालने स्वप्नमें आकर उनसे कहा,-"सुनो माधवेन्द्र ! मैंने यह सब कर्पूर-चन्दन प्राप्त कर लिया है। अब तुम कर्पूरके साथ इस सब चन्दनको घिसकर गोपीनाथके सभी अङ्गोंपर नित्य लेप करो जब तक वह पूरा समाप्त न हो जाय। मेरा और गोपीनाथका एक ही शरीर है। इनको चन्दन लेप करनेसे मेरे अङ्गोंका ताप दूर हो जायेगा। किसी दुविधामें नहीं पड़ो और मनमें कुछ भी संशय मत रखो, मेरी बातपर विश्वास करके गोपीनाथके अङ्गोंमें चन्दनका लेपन कर दो॥"157-161॥ अनुभाष्य-श्रीगोपालको न लगाकर श्रीगोपीनाथको चन्दन लगानेका तात्पर्य यह है, - श्रीगोपालकी भूमि वृन्दावन है, जो रेमुणासे बहुत योजन दूरीपर है। विशेषतः वहाँ जानेके लिये विधर्मी म्लेच्छोंके द्वारा शासित प्रदेशको पार करके जाना होता है; उसमें बहुत विघ्न-बाधाएँ हैं। इसलिये प्रियतम भक्तश्रेष्ठ पुरी गोस्वामीको कष्ट होगा, ऐसा जानकर भक्तवत्सल भक्तप्रेमके वशीभूत श्रीगोपालने अपनेसे अभिन्न-विग्रह श्रीगोपीनाथके श्रीअङ्गोंमें ही चन्दनका लेपन करनेके लिये कहकर भक्तके श्रमको सफल और कम किया। परवर्ती 176-177 संख्या देखें॥159-160॥ सेवकोंको श्रीगोपालकी आज्ञा बताना :- एत बलि' गोपाल गेल, गोसाञि जागिला। गोपीनाथेर सेवकगणे डाकिया आनिला॥162॥ अनुवाद-इतना कहकर श्रीगोपाल अन्तर्धान हो गये। श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उठकर श्रीगोपीनाथके सेवकोंको बुलाया और कहा कि श्रीगोपालकी आज्ञा हुई है,-"इस कर्पूर-चन्दनको घिसकर श्रीगोपीनाथजीके श्रीअङ्गोंपर नित्य लेपन करो। इनको चन्दन लगानेसे श्रीगोपालके अङ्ग स्वतः ही शीतल हो जायेंगे। वे स्वतन्त्र ईश्वर हैं, उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये। ग्रीष्मकालमें श्रीगोपीनाथके श्रीअङ्गोंपर चन्दन लगेगा।" यह सुनकर सभी सेवकोंके मनमें आनन्द हो गया॥162-165॥ अनुभाष्य-'स्वतन्त्र'-स्वेच्छामय॥164॥ साथमें आये दोनों सेवकोंको चन्दन-घिसनेमें लगाना :- पुरी कहे,-"एइ दुइ घषिबे चन्दन। आर जना-दुइ देह, दिब ये वेतन॥"166॥ अनुवाद-श्रीमाधवेन्द्रपुरीने कहा,–“(मेरे साथ नीलाचलसे आये) ये दोनों व्यक्ति चन्दन घिसेंगे। आप चन्दन घिसनेके लिये मुझे दो लोग और दे दीजिये, उनका वेतन मैं दूँगा॥”166॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'एइ दुइ'-पुरी गोस्वामीके साथ जो दो लोग आये हैं॥166॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके वचन अनुसार सेवकोंके द्वारा आनन्दित होकर चन्दन लगाना :- एइ मत चन्दन देय प्रत्यह घषिया। पराय सेवक सब आनन्द करिया॥167॥ 132 ।

चौथा अध्याय 4/47-177 ] अनुवाद-इस प्रकार वे चारों लोग प्रतिदिन चन्दन घिसकर देने लगे और श्रीगोपीनाथके सेवक उनके श्रीअङ्गोंमें बड़े आनन्दसे प्रतिदिन चन्दनका लेप करते ॥ 167 ॥ सम्पूर्ण ग्रीष्मकालमें चन्दन समाप्त होनेके तक श्रीमाधवेन्द्रपुरीका रेमुणामें ठहरना :- प्रत्यह चन्दन पराय, यावत् हैल अन्त। तथाय रहिल पुरी तावत् पर्यन्त ॥ 168 ॥ अनुवाद-प्रतिदिन श्रीगोपीनाथके अङ्गों पर चन्दनका लेप किया जाता रहा जब तक वह समाप्त नहीं हो गया। श्रीमाधवेन्द्रपुरी तब तक रेमुणामें ही रहे ॥ 168 ॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके द्वारा नीलाचलमें चातुर्मास्य-पालन :- ग्रीष्मकाल-अन्ते पुनः नीलाचले गेला। नीलाचले चातुर्मास्य आनन्दे रहिला ॥ 169 ॥ अनुवाद-ग्रीष्मकालके अन्तमें श्रीमाधवेन्द्रपुरी पुनः नीलाचल चले गये और चातुर्मास्यमें वे आनन्दपूर्वक नीलाचलमें रहे ॥ 169 ॥ अनुभाष्य- 'चातुर्मास्य' - आषाढ़ मासके शुक्लपक्षमें शयन एकादशीसे आरम्भ करके कार्तिक शुक्लपक्षकी उत्थान-एकादशी तक चार चन्द्रमास; अथवा आषाढ़ी पूर्णिमासे कार्तिकी पूर्णिमा तक चार चन्द्रमास; अथवा श्रावणसे कार्तिक तक चार सौरमासका समय-चातुर्मास्य-वर्षाकाल है। इन चार मासोंका व्रत चारों आश्रमोंके सभी व्यक्तियोंके लिये पालनीय है। इसका उद्देश्य सभी प्रकारके भोगोंका त्याग है। श्रावणमें साग, भाद्रमें दही, आश्विनमें दूध और कार्तिकमें आमिष (और आमिष-जातीय वस्तुओं) का त्याग करना चाहिये। जड़-भोगयोग्य विषयोंका त्याग ही इस चातुर्मास्यकी शिक्षाका तात्पर्य है। श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये श्रीमाधवेन्द्रपुरीने जो यत्न किये, वे कोई सांसारिक विषय भोग नहीं है ॥ 47-169 ॥ महाप्रभुको श्रीमाधवेन्द्रपुरीके चरित्र-वर्णनमें आनन्द :- श्रीमुखे माधवपुरीर अमृत-चरित। भक्तगणे शुनाञा प्रभु करे आस्वादित ॥ 170 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीनिताइको श्रीमाधवेन्द्रपुरीके प्रेमकी महिमाका वर्णन :- प्रभु कहे, - "नित्यानन्द, करह विचार। पुरी-सम भाग्यवान् जगते नाहि आर ॥ 171 ॥ दुग्धदान-छले कृष्ण याँरे देखा दिल। तिनबारे स्वप्ने आसि' याँरे आज्ञा कैल ॥ 172 ॥ याँर प्रेमे वश हञा प्रकट हइल। सेवा अङ्गीकार करि' जगत तारिल ॥ 173 ॥ याँर लागि' गोपीनाथ क्षीर कैल चुरि। अतएव नाम हैल 'क्षीरचोरा' करि' ॥ 174 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु अपने श्रीमुखसे भक्तोंको श्रीमाधवेन्द्रपुरीका अमृतमय चरित सुना रहे थे और स्वयं भी उसका आस्वादन कर रहे थे। महाप्रभुने आगे कहा, - "नित्यानन्द ! विचार करो। श्रीमाधवेन्द्रपुरीके समान भाग्यवान् जगत्में और कोई नहीं है। दूध देनेके छलसे श्रीकृष्णने जिन्हें साक्षात् दर्शन दिया। तीन बार स्वप्नमें आकर जिन्हें आदेश दिया। जिनके प्रेमके वशीभूत होकर श्रीगोपाल प्रकट हुए और जिनकी सेवा स्वीकार की तथा समस्त जगत्वासियोंका उद्धार किया। जिनके लिये श्रीगोपीनाथने खीरकी चोरी की, जिस कारण उनका नाम 'क्षीरचोरा' हो गया ॥ 170-174 ॥ कर्पूर चन्दन याँर अङ्गे चढ़ाइल। आनन्दे पुरी-गोसाञिर प्रेम उथलिल ॥ 175 ॥ श्रीगोपालके स्थानपर श्रीगोपीनाथको चन्दन लगवानेका तात्पर्य :- म्लेच्छदेशे कर्पूर-चन्दन आनिते जञ्जल। पुरी दुःख पाबे, इहा जानिया गोपाल ॥ 176 ॥ महा-दयामय प्रभु-भकतवत्सल। चन्दन परि' भक्तश्रम करिल सफल ॥ 177 ॥ । 133