श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 974, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 4/91-102 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला पुरी गोसाईंका रात्रि-आहार :- रात्रिकाले ठाकुरे कराइया शयन। पुरी-गोसाञि कैल किछु गव्य भोजन॥91॥ अनुवाद—रात्रिके समय श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपालको शयन दिया। उन्होंने सारा दिन कुछ भी नहीं खाया था। शयन देनेके बाद उन्होंने थोड़ासा दूध पान किया॥91॥ अनुभाष्य—'गव्य'—दूध॥91॥ अगले दिन प्रातःकालमें भी पहले दिनके जैसी सेवा :- प्रातःकाले पुनः तैछे करिल सेवन। अन्न लञा एक ग्रामेर आइल लोकगण॥92॥ अन्न, घृत, दधि, दुग्ध,—ग्रामे यत छिल। गोपालेर आगे लोक आनिया धरिल॥93॥ पूर्वदिन-प्राय ब्राह्मण करिल रन्धन। तैछे अन्नकूट गोपाल करिल भोजन॥94॥ अनुवाद—अगले दिन प्रातःकालमें पुनः श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपालकी पूर्व-दिनके जैसे सेवा की। तभी एक गाँवके लोग भोग-सामग्री लेकर आ गये। उनके गाँवमें जितना भी अन्न, घी, दही, दूध आदि था, वह सब लाकर उन्होंने श्रीगोपालके आगे रख दिया। पहले दिनकी भाँति आज भी ब्राह्मणोंने रसोई बनायी और वैसा ही अन्नकूट महोत्सव हुआ तथा आज भी श्रीगोपालने सब कुछ ग्रहण किया॥92-94॥ ब्रजवासियों और श्रीकृष्ण, दोनोंकी दोनोंके प्रति स्वाभाविक प्रीति :- व्रजवासी लोकेर कृष्णे सहज-प्रीति। गोपालेर सहजे प्रीति व्रजवासि-प्रति॥95॥ महाप्रसाद खाइल आसिया सब लोक। गोपाल देखिया सबार खण्डे दुःख-शोक॥96॥ प्रतिदिन अनेक उपहार और महोत्सव :- आश-पाश व्रजभूमेर यत लोक सब। एक एक दिन सबे करे महोत्सव॥97॥ अनुवाद—जिस प्रकार व्रजवासियोंकी श्रीकृष्णमें स्वाभाविक प्रीति है, उसी प्रकार श्रीगोपालकी भी व्रजवासियोंके प्रति स्वाभाविक प्रीति है। अन्नकूट महोत्सवमें जितने भी लोग आये थे, उन सबने अन्नकूट-महाप्रसादका सेवन किया तथा श्रीगोपालके दर्शनसे उन सबके दुःख-शोक दूर हो गये। व्रजभूमिमें आस-पासके जितने भी गाँव थे, उन सभी गाँवोंके लोग एक-एक दिन आकर अन्नकूट महोत्सव करने लगे॥95-97॥ गोपाल-प्रकट शुनि' नाना देश हैते। नाना द्रव्य लञा लोक लागिल आसिते॥98॥ मथुरार लोक सब बड़ बड़ धनी। भक्ति करि' नाना द्रव्य भेट देय आनि'॥99॥ स्वर्ण, रौप्य, वस्त्र, गन्ध, भक्ष्य-उपहार। असंख्य आइसे, नित्य बाड़िल भाण्डार॥100॥ अनुवाद—श्रीगोपालके प्राकट्यकी बात सुनकर अनेक प्रदेशोंसे लोग अनेक प्रकारके द्रव्य लाकर उनके दर्शनोंके लिये आने लगे। मथुराके सब बड़े-बड़े धनी व्यक्ति श्रद्धापूर्वक अनेक वस्तुएँ लाकर भेंट चढ़ाने लगे। इस प्रकार असंख्य मात्रामें स्वर्ण, चाँदी, वस्त्र, इत्र और अन्य खानेकी सामग्री आने लगी, जिससे श्रीगोपालका भण्डार प्रतिदिन बढ़ता ही गया॥98-100॥ गोपालके मन्दिरका निर्माण- एक महाधनी क्षत्रिय कराइल मन्दिर। केह पाक-भाण्डार कैल, केह त' प्राचीर॥101॥ एक एक व्रजवासी एक एक गाभी दिल। दशसहस्र गाभी गोपालेर हैल॥102॥ अनुवाद—तब किसी एक बहुत धनी क्षत्रियने श्रीगोपालके लिये मन्दिर बनवा दिया और किसी एकने रसोईघर बनवाया और बर्तन दिये तथा अन्य किसीने चार-दीवारी बनवा दी। एक-एक व्रजवासीने एक-एक 124