भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 973, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 973

चौथा अध्याय 4/86-90 ] अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीके प्रभावको देखकर सभी लोग चमत्कृत हो गये। सभीको ऐसा लगा, मानो वे द्वापर युगमें भगवान् श्रीकृष्णके कहनेपर व्रजवासियोंके द्वारा आयोजित किये गये अन्नकूट महोत्सवको ही साक्षात् देख रहे हैं॥86॥ अमृतप्रवाह भाष्य-द्वापर युगमें व्रजवासी सभी गोप इन्द्रकी पूजा करते थे। श्रीकृष्णने इन्द्रकी पूजाको छुड़वाकर गिरिगोवर्धनकी पूजा और उन्हें (गिरिराजको) अन्नकूट भोजन करानेकी व्यवस्था कर दी। उससे इन्द्रने क्रोधित होकर सात दिनतक वर्षा करके गोकुलको विनष्ट करनेकी चेष्टा की। श्रीकृष्णने गोवर्धन पर्वतको अपनी कनिष्ठ (सबसे छोटी) अंगुलीपर छतरीके रूपमें धारण करके गोकुलकी रक्षा की थी। उस गोवर्धन-पूजामें जैसा बड़ा अन्नकूट हुआ था, श्रीमाधवेन्द्रपुरीने भी उसी प्रकारसे अन्नकूट किया था॥86॥ अनुभाष्य—'पूर्व अन्नकूट'—श्रीकृष्णके परामर्श अनुसार गोपोंने द्वापरके अन्तमें इन्द्रपूजाको त्यागकर गो, ब्राह्मण और गोवर्धनगिरिकी पूजा की थी। श्रीकृष्णने और एक रूप धारण करके 'मैं ही पर्वत हूँ'-ऐसा कहकर उन्होंने गोवर्धनको निवेदित अनेकानेक नैवेद्योंका भक्षण किया था। (भाः 10/24/26, 31-33)— “पच्यन्तां विविधाः पाकाः सूपान्ताः पयसादयः। संयावापूपशष्कुल्यः सर्वदोहश्च गृह्यताम्॥26॥ प्रोक्तं निशम्य नन्दाद्याः साध्वगृह्णन्त तद्वचः॥31ख॥ तथा च व्यदधुः सर्वं यथाह मधुसूदनः॥ वाचयित्वा स्वस्त्ययनं तद्द्रव्येण गिरिद्विजान्॥32॥ उपहृत्य बलीन् सम्यगादृता यवसं गवाम्॥"33क॥ अर्थात् “श्रीकृष्णने नन्दबाबा आदि व्रजवासियोंसे कहा,—“खीरसे आरम्भ करके मूँगकी दालतक, हलवा, पुआ, पूरी, पापड़ आदि पकवान बनवाये जाँय और समस्त व्रजवासी गायोंका दोहन करके दूध, दही आदि यहाँ ले आयें।" भगवान् श्रीकृष्णके इन वचनोंको नन्दबाबा आदि गोपोंने बड़ी प्रसन्नतासे स्वीकार कर लिया। तब उन्होंने श्रीकृष्णके कहे अनुसार सभी अनुष्ठान किये। सर्वप्रथम ब्राह्मणोंके द्वारा स्वस्तिवाचन कराया गया। तत्पश्चात् इन्द्रके उद्देश्यसे निर्मित सामग्रियोंको गिरिराज गोवर्धनको अर्पित किया गया और ब्राह्मणोंकी पूजा करके उसी सामग्रीमेंसे उनको भेंटें दी गयीं। गायोंको बड़े आदरके साथ हरी-भरी घासका चारा दिया गया॥"86॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी कृपासे ब्राह्मणोंका वैष्णव होना :- सकल ब्राह्मणे पुरी वैष्णव करिल। सेइ सेइ सेवा-मध्ये सबा नियोजिल॥87॥ अनुवाद-श्रीमाधवेन्द्र पुरीने उपस्थित सभी ब्राह्मणोंको मन्त्र-दीक्षादिके द्वारा वैष्णव बना दिया और सबको यथायोग्य विभिन्न सेवाओंमें लगा दिया॥87॥ पुनः दिन-शेषे प्रभुर कराइल उत्थान। किछु भोग लागाइल कराइल जलपान॥88॥ अनुवाद-फिर दिन ढलनेके समय श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपालको शयनसे उठाया और कुछ भोग लगाकर जलपान करवाया॥88॥ सर्वत्र श्रीगोपालका प्राकट्य-प्रचार और अन्नकूट-भोग :- गोपाल प्रकट हैल,—देशे शब्द हैल। आश-पाश-ग्रामेर लोक देखिते आइल॥89॥ एकेक दिन एकेक ग्रामे लइल मागिञा। अन्नकूट करे सबे हरषित हञा॥90॥ अनुवाद-सारे देशमें यह बात फैल गयी कि गोवर्धनमें श्रीगोपाल प्रकट हुए हैं, तो आस-पासके गाँवोंके लोग उनके दर्शनोंके लिये आने लगे। सभी गाँववाले अन्नकूट-महोत्सव करना चाहते थे, इसलिये एक-एक गाँववालोंने श्रीमाधवेन्द्र पुरीसे एक-एक दिन माँग लिया। इस प्रकार बारी-बारी वे सभी आनन्दित होकर अन्नकूट-महोत्सव करने लगे॥89-90॥ । 123