भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 972

[ 4/69-86 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला गोस्वामी प्रभुका विविध प्रकारके पकवान बनानेका नैपुण्य प्रकाशित हो रहा है। 'अन्नकूट'—अन्नका पर्वत; 'कूट'—दुर्ग, गढ़, पर्वत ॥ 69-76 ॥ श्रीगोपालके द्वारा भोगके सभी नैवेद्य खा लिये जानेपर भी हाथोंके स्पर्शसे पुनः पूरण :- यद्यपि गोपाल सब अन्न-व्यञ्जन खाइल। ताँर हस्त-स्पर्शे पुनः तेमनि हइल ॥ 77 ॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीगोपालने सब अन्न-व्यञ्जन खा लिये, तथापि उनके हाथोंके स्पर्शसे पुनः सब कुछ पूर्ववत् हो गया ॥ 77 ॥ भगवद्-लीला भक्तोंके ही गोचर :- इहा अनुभव कैल माधव गोसाञि। ताँर ठाञि गोपालेर लुकान किछु नाइ ॥ 78 ॥ एकदिन-उद्योगे ऐछे महोत्सव कैल। गोपाल-प्रभावे हय, अन्ये ना जानिल ॥ 79 ॥ अनुवाद—श्रीगोपालकी इस भोजन लीलाका अनुभव केवल श्रीमाधवेन्द्र पुरीको ही हुआ, क्योंकि उनके जैसे भक्तोंसे भगवान्‌की कोई बात छिपी नहीं रह सकती। एक दिनके प्रयाससे इतना बड़ा महोत्सव केवल श्रीगोपालके प्रभावसे ही सम्भव हो सका, शुद्धभक्तके अतिरिक्त इसे और कोई भी नहीं जान सकता ॥ 78-79 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला, 3/86-89 संख्या देखें ॥ 78 ॥ श्रीगोपालकी आरती :- आचमन दिया दिल बिड़क-सञ्चय। आरति करिल, लोके करे जय जय ॥ 80 ॥ अनुवाद—तब श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपालको आचमन देकर उन्हें अनेक पानके बीड़े अर्पित किये। उसके बाद जब उन्होंने श्रीगोपालकी आरती की, तब सभी लोग श्रीगोपालकी जय-जयकार करने लगे ॥ 80 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'बिड़क'—पानका बीड़ा; 'सञ्चय'—संग्रह ॥ 80 ॥ ठाकुरके लिये शय्या तथा शयनकी व्यवस्था :- शय्या कराइल, नूतन खाट आनाञा। नववस्त्र आनि' तार उपरे पातिया ॥ 81 ॥ तृण-टाटि दिया चारिदिक् आवरिल। उपरेते एक टाटि दिया आच्छादिल ॥ 82 ॥ अनुवाद—आरती करनेके बाद श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपालके लिये एक नवीन खाट मँगवाकर उसपर नया वस्त्र बिछाकर उनको शयन कराया। फिर चटाईसे उस स्थानके चारों ओर घेरा बना दिया तथा ऊपर भी एक चटाई लगाकर उसको ढक दिया, इस प्रकार वहाँ एक अस्थाई मन्दिर बन गया ॥ 81-82 ॥ सभीके द्वारा अन्नकूट महाप्रसाद-सेवन :- पुरी-गोसाञि आज्ञा दिल सकल ब्राह्मणे। आ-बाल-वृद्ध ग्रामेर लोक कराह भोजने ॥ 83 ॥ सबे बसि' क्रमे क्रमे भोजन करिल। ब्राह्मण-ब्राह्मणीगणे आगे खाओयाइल ॥ 84 ॥ अनुवाद—श्रीपुरी गोसांईने सभी ब्राह्मणोंको बुलाकर आज्ञा दी कि बालकसे वृद्ध तक, गाँवके सभी लोगोंको भरपेट महाप्रसादका भोजन कराया जाय। सभीने बैठकर क्रमसे भोजन किया। सबसे पहले ब्राह्मण- ब्राह्मणियोंको भोजन कराया गया ॥ 83-84 ॥ दर्शन मात्रसे ही प्रसादका सम्मान :- अन्य ग्रामेर लोक यत देखिते आइल। गोपाल देखिया सेह प्रसाद पाइल ॥ 85 ॥ अनुवाद—अन्य गाँवोंसे दर्शनके लिये आये लोगोंने भी श्रीगोपालका दर्शनकर उस महाप्रसादको पाया ॥ 85 ॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके प्रभावको देखकर सभीको आश्चर्य तथा अन्नकूटके दर्शनसे नन्दोत्सवका स्मरण :- देखिया पुरीर प्रभाव लोके चमत्कार। पूर्व अन्नकूट येन हैल साक्षात्कार ॥ 86 ॥ 122 ।