श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 975, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय 4/101-111 ] गाय दी और इस प्रकार श्रीगोपालकी दस हजार गायें हो गयीं ॥ 101-102 ॥ दो वैरागी ब्राह्मणोंपर कृपा और सेवा-समर्पण :- गौड़ हइते आइला दुइ वैरागी ब्राह्मण। पुरी-गोसाञि राखिल तारे करिया यतन ॥ 103 ॥ सेइ दुइ शिष्य करि' सेवा समर्पिल। राज-सेवा हय,-पुरीर आनन्द बाड़िल ॥ 104 ॥ अनुवाद-तभी बङ्गालसे दो वैरागी ब्राह्मण वहाँ आये। श्रीपुरी गोसांईको वे दोनों बहुत अच्छे लगे और उन्होंने उनके वहीं रहनेके लिये अच्छे स्थानकी व्यवस्था कर दी। श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उन्हें दीक्षा प्रदान करके अपने शिष्यके रूपमें स्वीकार किया और उन्हें श्रीगोपालकी सेवा समर्पित कर दी। इस प्रकार श्रीगोपालकी नित्य राजसेवा होने लगी, जिसे देखकर श्रीमाधवेन्द्रपुरीके आनन्दकी सीमा न रही ॥ 103-104 ॥ दो वर्षों तक श्रीमाधवेन्द्रपुरीके द्वारा श्रीगोपालकी सेवा :- एइमत বৎসর दुइ करिल सेवन। एकदिन पुरी-गोसाञि देखिल स्वपन ॥ 105 ॥ स्वप्नमें श्रीमाधवेन्द्रपुरीके समक्ष श्रीगोपालके द्वारा चन्दनकी इच्छा प्रकाशित :- गोपाल कहे,-"पुरी, आमार ताप नाहि याय। मलयज-चन्दन लेप', तबे से जुड़ाय ॥ 106 ॥ मलयज आन याञा नीलाचल हैते। अन्ये हैते নহে, तुमि चलह त्वरिते॥" 107 ॥ अनुवाद-इस प्रकार दो वर्षों तक श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपालकी सेवा की। तब एक दिन श्रीमाधवेन्द्रपुरीने एक स्वप्न देखा। स्वप्नमें श्रीगोपालने कहा,-"पुरी ! मेरे शरीरका ताप नहीं जा रहा है, मलयज चन्दनका लेप होनेसे ही वह ताप दूर होगा। नीलाचल जाकर वहाँसे मलयज चन्दन ले आओ। इस कार्यको कोई और नहीं कर सकता, इसलिये तुम शीघ्र ही चले जाओ॥" 105-107 ॥ अनुभाष्य- 'मलयज' - मलय देशमें उत्पन्न; इसको 'चन्दनगिरि' कहते हैं। मलयदेश अथवा मालावार देश 'पश्चिमघाट' - नामक गिरिपुञ्जके दक्षिण भागमें है। 'नीलगिरि'को कोई-कोई मलय पर्वत कहते हैं। मलयज शब्दका अर्थ चन्दन भी होता है॥ 106 ॥ स्वप्न देखि' पुरी-गोसाञि हैल प्रेमावेश। प्रभु-आज्ञा पालिबारे गेला पूर्वदेश ॥ 108 ॥ श्रीजगन्नाथपुरीके मार्गमें पुरीपादका गौड़देशमें आगमन :- सेवाय नियुक्त लोक करिल स्थापन। आज्ञा मागि' गौड़-देशे करिल गमन ॥ 109 ॥ अनुवाद-स्वप्न देखकर श्रीमाधवेन्द्रपुरी प्रेमाविष्ट हो गये और श्रीगोपालकी आज्ञा पालन करनेके लिये पूर्व-भारतमें नीलाचलकी ओर चलनेके लिये तैयार हुए। उन्होंने श्रीगोपालकी सुचारुरूपसे सेवाके लिये लोगोंको नियुक्त किया और फिर श्रीगोपालसे आज्ञा लेकर गौड़देशके लिये चल दिये ॥ 108-109 ॥ शान्तिपुरमें श्रीअद्वैतके घरपर आगमन और उनको दीक्षा प्रदान :- शान्तिपुर आइला अद्वैताचार्येर घरे। पुरीर प्रेम देखि' आचार्य आनन्द अन्तरे ॥ 110 ॥ ताँर ठाञि मन्त्र लैल यत्न करिया। चलिला दक्षिणे पुरी ताँरे दीक्षा दिञा ॥ 111 ॥ अनुवाद-श्रीमाधवेन्द्रपुरी जब शान्तिपुर पहुँचे, तब वे श्रीअद्वैताचार्यके घरमें रहे। श्रीमाधवेन्द्रपुरीके श्रीकृष्णप्रेमको देखकर श्रीअद्वैताचार्यके हृदयमें बहुत आनन्द हुआ। उन्होंने श्रीमाधवेन्द्रपुरीसे प्रार्थना करके दीक्षामन्त्र ग्रहण किया। उनको दीक्षा प्रदान करके श्रीमाधवेन्द्रपुरी दक्षिण दिशामें नीलाचलकी ओर चल दिये॥ 110-111 ॥ अनुभाष्य-श्रीअद्वैताचार्यने श्रीमाध्वसम्प्रदायके गुरु संन्यासीवर श्रीमाधवेन्द्रपुरीसे दीक्षा मन्त्र ग्रहण किया था। श्रीमहाप्रभुने भी श्रीमाधवेन्द्र पुरीके अभिप्रायके अनुसार । 125