श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 4/111-114 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला “किवा विप्र, किवा न्यासी,, शूद्र केने नय। येइ कृष्णतत्त्ववेत्ता सेई गुरु हय॥”—उपदेश दिया है। पञ्चरात्रके मतानुसार, —गृहस्थ ब्राह्मणके अतिरिक्त दीक्षा देनेका अधिकार और किसीको नहीं है, क्योंकि दीक्षित व्यक्ति दीक्षा प्राप्त करके दैक्ष-ब्राह्मणता [दीक्षाके प्रभावसे ब्राह्मणके पदको] प्राप्त करता है। जो ब्राह्मण नहीं है, उसमें दूसरेमें ब्राह्मणता सञ्चार करनेकी क्षमता नहीं होती। इसलिये दीक्षा देनेवालेमें ब्राह्मणत्व होनेका विशेष गुण स्वतः ही अनिवार्य है। वैष्णवाचार्यमें ब्राह्मणत्व स्वतः ही ग्रथित है। वर्णाश्रममें स्थित गृहस्थ ब्राह्मण शास्त्र विहित उपायसे अपने द्वारा अर्जित धनके द्वारा अनेक प्रकारकी सेवायोग्य वस्तुओंको संग्रह करके मन्त्रोंके द्वारा भगवद्-अर्चन करनेमें समर्थ होते हैं। भौतिक संसारमें फंसे लोग वैसे अभिज्ञ गृहस्थ-ब्राह्मण गुरुसे यह जानकर कि भगवद्-सेवा ही वर्णाश्रमका एकमात्र लक्ष्य है, अपनी गृहवासनासे मुक्त होनेके लिये उनसे मन्त्र-दीक्षाकी प्रार्थना करते हैं। इसलिये गृहस्थ- ब्राह्मण गुरुको वास्तविक वैष्णव होना आवश्यक है। यद्यपि संन्यासी गुरुके पास अर्चा-विग्रहके अर्चनमें वैसी सुविधाएँ नहीं होतीं, तथापि कोई पारमार्थिक संन्यासी गुरुका आश्रय ग्रहण करता है, तो अर्चन विधि उपेक्षित जैसी प्रतीत होनेपर भी वास्तवमें उपेक्षित नहीं होती। गुरुके विषयमें जिस ब्राह्मणताकी योग्यताको लक्ष्य किया गया है, वह शौक्र-विप्रत्व (जन्मके द्वारा ब्राह्मण) अथवा शौक्र शूद्रत्व (जन्मके द्वारा शूद्र) का भेद नहीं है। वास्तवमें सावित्र (जनेऊ संस्कारसे) और दीक्षाके द्वारा ब्राह्मणता ही उसका उद्देश्य है। जन साधारणकी शौक्र-जन्ममें ही एकमात्र जाति-विषयक अशुद्ध धारणाको दृढ़ जानकर श्रीमन्महाप्रभुने जीवके हृदयकी और समाजकी दुर्बलताको लक्ष्य करके ही “किवा विप्र” पद्यमें ऐसा कहा। इस पद्यके द्वारा उन्होंने शास्त्रीय तात्पर्यको समझा दिया; क्योंकि कृष्णतत्त्ववेत्ता ही सावित्र अथवा दैक्ष-ब्राह्मण हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं है। “दिव्यं ज्ञानं यतो दद्यात् कुर्यात् पापस्य संक्षयम्। तस्माद्दीक्षेति सा प्रोक्ता देशिकैस्तत्त्वकोविदैः॥” अर्थात् “क्योंकि यह दिव्यज्ञान (सम्बन्धज्ञान) प्रदान करता है और पापका (पाप, पापबीज और अविद्या) जड़ सहित विनाश करता है, इसलिये भगवत्तत्त्वविद् पण्डितगण इस अनुष्ठानको 'दीक्षा'के नामसे पुकारते हैं॥” 'गृहस्थ-गुरु' शब्दका अर्थ जिस प्रकार गृहव्रतधारी इन्द्रियोंका दास नहीं होता, उसी प्रकार 'वैष्णव-संन्यासी' कहनेसे वर्णाश्रमाभिमान परायण व्यक्तिको नहीं समझना चाहिये॥111॥ रेमुणामें श्रीगोपीनाथका दर्शन और नृत्य-गीत :- रेमुणाते कैल गोपीनाथ-दरशन। ताँर रूप देखिञा हैल विह्वल-मन॥112॥ अनुवाद—मार्गममें रेमुणामें उन्होंने श्रीगोपीनाथके दर्शन किये। उनके मनोहर रूपको देखकर श्रीपुरी गोसाईंका मन विह्वल हो गया॥112॥ भोगकी परिपाटीको सुननेसे सुख :- 'नृत्यगीत करि' जगमोहने बसिला। 'क्या क्या भोग लागे?' वैरागी ब्राह्मणे पुछिला॥113॥ सेवार सौष्ठव देखि' आनन्दित मने। 'उत्तम भोग लागे'-इहा कैलुँ अनुमाने॥114॥ अनुवाद—फिर श्रीमाधवेन्द्रपुरी नृत्य-गीत करके बरामदेमें बैठ गये। श्रीगोपीनाथकी सेवाके सौन्दर्यको देखकर श्रीमाधवेन्द्रपुरी बहुत आनन्दित हुए और उन्होंने मनमें अनुमान लगाया कि अवश्य ही गोपीनाथजीको उत्तम भोग लगाये जाते होंगे। इसलिये उन्होंने एक वैरागी ब्राह्मणसे पूछा, —'श्रीगोपीनाथको क्या-क्या भोग लगता है?'॥113-114॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'जगमोहन'—मन्दिरके सामने बने जिस बरामदेसे भगवान्के दर्शन होते हैं, वह 'जगमोहन' कहलाता है। 'वैरागी ब्राह्मण'—जो ब्राह्मण संसारसे विरक्त होकर उसकी कोई आशा नहीं रखते, परन्तु उन्होंने अपने 126 ।