श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 977, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय 4/113-125 ] आश्रमका त्याग नहीं किया है, वे ही 'वैरागी ब्राह्मण' हैं। 'क्या क्या' - पाठान्तरमें 'काँहा काँहा'; इसका अर्थ है-क्या क्या भोग लगता है॥ 113 ॥ श्रीगोपालको वैसा भोग देनेकी इच्छासे पुजारीसे पूछना और पुजारीके द्वारा गोपीनाथके खीरभोगकी प्रशंसा :- 'येमन इहा भोग लागे, सकल शुनिब। तेमन अनुमाने भोग गोपाले लागाइब ॥ '115 ॥ एइ लागि' पुछिलेन ब्राह्मणेर स्थाने। ब्राह्मण कहिल सब भोग-विवरणे ॥ 116 ॥ अनुवाद- 'यहाँ जिस प्रकारके भोग लगाये जाते हैं, -उन सबके विषयमें सुनकर उसीके अनुसार अनुमानसे अपने श्रीगोपालको भोग लगाऊँगा'-इसी उद्देश्यसे श्रीमाधवेन्द्रपुरीने ब्राह्मणसे प्रश्न किया। तब ब्राह्मणने जो-जो भोग लगता है, उसका सारा विवरण उन्हें बतलाया ॥ 115-116 ॥ “सन्ध्याय भोग लागे क्षीर- 'अमृतकेलि' -नाम। द्वादश मृत्पात्रे भरि' अमृत-समान ॥ 117 ॥ 'गोपीनाथेर क्षीर' बलि' प्रसिद्ध नाम यार। पृथिवीते ऐछे भोग काँहा नाहि आर ॥ "118 ॥ अनुवाद-ब्राह्मणने भोगकी एक विशेषता बतलाते हुए कहा, - “संध्यामें श्रीगोपीनाथको बारह मिट्टीके कुल्हड़ोंमें 'अमृतकेलि' नामके खीरका भोग लगता है और यह अमृतके समान स्वादिष्ट है। यह 'श्रीगोपीनाथकी खीर' के नामसे सारे जगत्में प्रसिद्ध है। ऐसा भोग पृथ्वीमें और कहीं भी नहीं लगाया जाता ॥ "117-118 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'क्षीर' - खीर ॥ 117 ॥ श्रीगोपीनाथके खीरभोगके अनुरूप श्रीगोपालको खीर देनेकी इच्छा :- हेनकाले सेइ भोग ठाकुरे लागिल। शुनि' पुरी-गोसाञि किछु मने विचारिल ॥ 119 ॥ 'अयाचित क्षीर-प्रसाद अल्प यदि पाइ। स्वाद जानि' तैछे क्षीर गोपाले लागाइ ॥ '120 ॥ अनुवाद-उसी समय श्रीमाधवेन्द्रपुरीने सुना कि श्रीगोपीनाथको उसी अमृतकेलि खीरका भोग लगाया जा रहा है। तब वे मनमें विचार करने लगे,-'बिना माँगे यदि थोड़ा-सा वह खीर-प्रसाद मुझे मिल जाय, तो उसका स्वाद जानकर मैं भी वैसा ही खीरका भोग श्रीगोपालको लगाऊँगा ॥ '119-120 ॥ अनुभाष्य - 'अयाचित' - बिना माँगे ॥ 120 ॥ उसे जिह्वाका लोभ समझकर पुरी गोस्वामीका लज्जित होना और आरती-दर्शनके बाद उस स्थानका त्याग :- एइ इच्छाय लज्जा पाञा विष्णुस्मरण कैल। हेनकाले भोग सरि' आरति बाजिल ॥ 121 ॥ आरति देखिया पुरी कैल नमस्कार। बाहर हैला, कारे किछु ना कहिल आर ॥ 122 ॥ अनुवाद-ऐसी इच्छाको अपनी जिह्वाका लोभ समझकर श्रीमाधवेन्द्रपुरी लज्जित होकर भगवान् विष्णुका स्मरण करने लगे जिससे उनका मन खीरकी ओर न जाय। उसी समय भोग समाप्त हुआ तथा आरतीके लिये घण्टा बजने लगा। आरतीका दर्शन करके श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपीनाथको प्रणाम किया। खीरके विषयमें किसीसे कुछ कहे बिना वे मन्दिरसे बाहर आ गये ॥ 121-122 ॥ अनुभाष्य- 'सरि' '- सम्पादित होकर ॥ 121 ॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीका आचरण :- अयाचित-वृत्ति पुरी-विरक्त, उदास। अयाचित पाइले खां'न, नहे उपवास ॥ 123 ॥ प्रेमामृते तृप्ति, नाहि क्षुधा-तृष्णा बाधे। क्षीर-इच्छा हैल, ताहे माने अपराधे ॥ 124 ॥ ग्रामेर शून्य हट्टे बसि' करेन कीर्त्तन। एथा पूजारी कराइल ठाकुरे शयन ॥ 125 ॥ । 127